आज भी नहीं छोड़ा रेडियो का साथ, जहानाबाद के सत्येंद्र नारायण सुबह से रात तक सुनते हैं हर प्रोग्राम, रटा है हर कार्यक्रम का नाम

आज भी नहीं छोड़ा रेडियो का साथ, जहानाबाद के सत्येंद्र नारायण सुबह से रात तक सुनते हैं हर प्रोग्राम, रटा है हर कार्यक्रम का नाम


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आज की तारीख में अब रेडियो सुनने वाले लोग बहुत गिनती के हैं. टीवी और मोबाइल ने रेडियो को खत्म कर दिया. हालांकि, रेडियो के कुछ शौकीन लोग आज भई हैं. इनमें से एक हैं जहानाबाद जिला मुख्यालय के रहने वाले सत्येंद्र नारायण. रेडियो उनका पक्का साथी है. सत्येंद्र नारायण की सुबह रेडियो के साथ होती है और रात भी रेडियो के साथ होती है.

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जहानाबाद: तेजी से बदलती इस दुनिया में हमारे आपके आसपास आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो नहीं बदले हैं. बहुत से लोगों का पहनावा, खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा से लेकर सोच-विचार तक बदल गया. इस बदलती दुनिया में कई लोगों ने बदलाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया. आधुनिकता के नाम पर उन्होंने सिर्फ उन्हीं आधुनिक चीजों को अपनाया जो उन्हें बहुत जरूरी लगी. एक तरफ जहां लोग हजारों से लेकर लाखों रुपये के बेड और बेडरूम बनवा रहे हैं वहीं कई लोग आज भी अपनी पुरानी खटिया और तखत पर सुकून की नींद ले रहे हैं. ऐसे ही हैं जहानाबाद के सत्येंद्र नारायण जो आज भी रेडियो को ही अपना सहारा बनाए हुए हैं.

रेडियो के शौकीन सत्येंद्र नारायण की उम्र 62 साल हो रही है. इस उम्र में भी वह परिवार से दूर रहकर दिन भर नर्सरी का व्यापार संभालते हैं. परिवार से वो दिन भर दूर रहते हैं लेकिन उनका पक्का साथी रेडियो उनके साथ ही रहता है. सुबह से रात तक सत्येंद्र का सफर रेडियो की आवाज के साथ ही गुजरता है. यही कारण है कि उनको आज भी रेडियो का एक एक कार्यक्रम याद रहता है और समाचार याद रहता है.

44 साल से रेडियो के शौकीन
लोकल 18 की टीम से सत्येंद्र कहते हैं, “हमारी उम्र 62 साल हो रही है. 18 साल की उम्र से ही रेडियो का आनंद उठा रहे हैं और यह यात्रा निरंतर जारी है. मरते दम तक उनका रेडियो का साथ नहीं छूटने वाला है. सुबह उठते ही समाचार के साथ रेडियो और हमारा सफर शुरू होता है और रात में विविध भारती पर 8.45 बजे का हिंदी बुलेटिन सुनकर ही नींद आती है. इस दौरान दिनभर कई कार्यक्रम का आनंद उठाते हैं. इसमें सखी सहेली, सदाबहार नगमे, हवा महल के साथ कई अन्य कार्यकम का आनंद उठाते हैं. हमें आज के समय का गाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है. पुराने दौर का जो गाना होता था उसमें अर्थ स्पष्ट होता था.

500 रुपए में खरीदा था फिलिप्स का रेडियो
इस सफर का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हमारे घर में हर तरह की आधुनिक सुख सुविधाएं हैं, लेकिन हमारा दिल रेडियो में ही बसता है. अभी हमारे पास फिलिप्स कंपनी का रेडियो है और उसे हमने 500 रुपए में 7 साल पहले खरीदा था. बैटरी में 50 रुपए खर्च होता था तो हमने इसे इलेक्ट्राॅनिक करवा दिया और बिजली से अब यह रेडियो संचालित होता है, जिसमें पैसे की बचत होती है. जब कभी भी रेडियो बिगड़ता है और दुकान में बनवाने को ले जाते हैं तो कई बार लोग चुटकी ले लेते हैं और कहते हैं कि क्या रखे हैं चाचा? मुस्कुरा कर कहते हैं कि हमारा इसमें जान बसता है.



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