नई दिल्ली. रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी जंग ने दुनिया के कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया. कहीं सप्लाई चेन टूटी, कहीं माल फंसा और कहीं कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया. लेकिन इसी जंग के बीच पोलैंड में रह रहे एक भारतीय के लिए मुश्किल हालात नए बिजनेस की शुरुआत बन गए. दिलचस्प बात यह है कि वह खुद शराब नहीं पीते, लेकिन उनकी बीयर आज 30 देशों तक पहुंच चुकी है. इस भारतीय का नाम है चंद्रमोहन नल्लूर, जो केरल के पलक्कड़ से निकलकर पोलैंड पहुंचे और अब अपने ब्रांड ‘मलयाली’ के जरिये दुनिया के बीयर बाजार में पहचान बना रहे हैं.
News18 India से खास बातचीत में चंद्रमोहन ने अपनी इस अनोखी कारोबारी कहानी के साथ-साथ भारत के पासपोर्ट, ऑपरेशन गंगा और भारत-पोलैंड के बढ़ते व्यापारिक रिश्तों पर भी खुलकर बात की. चंद्रमोहन की कहानी किसी आम कारोबारी की कहानी नहीं है. इसकी शुरुआत न तो बीयर बनाने की योजना से हुई और न ही शराब के कारोबार में उतरने के इरादे से. इसकी शुरुआत हुई पांच टन पोहे से. चंद्रमोहन बताते हैं कि वह इंडो-पोलिश चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज से जुड़े हैं. उनका काम भारतीय कारोबारियों को पोलैंड में और पोलिश कंपनियों को भारत में कारोबार बढ़ाने में मदद करना है.
पोहे ने शुरू कराया बीयर का बिजनेस
चंद्रमोहन बताते हैं कि वाराणसी के एक कारोबारी ने पोलैंड में रहने वाले अफ्रीकी समुदाय के लिए पांच टन पोहा मंगवाया था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से ठीक चार दिन पहले यह कारोबारी सौदा संकट में पड़ गया. डॉलर और पोलिश मुद्रा की कीमतों में उतार-चढ़ाव के चलते डील टूट गई. अब सवाल था कि पांच टन पोहे का क्या किया जाए? इसी मुश्किल से एक नया आइडिया निकला. चंद्रमोहन और उनकी टीम ने पोहे से बीयर बनाने का फैसला किया और ब्रांड का नाम रखा ‘मलयाली’. देखते ही देखते यह प्रयोग कारोबार में बदल गया. आज इस ब्रांड की मौजूदगी 30 देशों में है.
कारोबार के लिए बाजार को समझना जरूरी
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि चंद्रमोहन खुद शराब नहीं पीते. इसके बावजूद उन्होंने बीयर के कारोबार में अपनी जगह बनाई. उनकी कहानी दिखाती है कि कारोबार में हमेशा किसी उत्पाद का उपभोक्ता होना जरूरी नहीं, बल्कि बाजार को समझना, सही टीम बनाना और मुश्किल में अवसर तलाशना भी अहम है. हालांकि, युद्ध के कारण पैदा हुए संकट का असर उनके कारोबार पर आज भी पड़ता है. चंद्रमोहन के मुताबिक, ईंधन की बढ़ती कीमतों और महंगे ट्रांसपोर्ट का सीधा असर लागत पर पड़ता है. खासकर मिडिल ईस्ट में हालात बिगड़ने से माल ढुलाई और कारोबार की चुनौतियां बढ़ जाती हैं.
आज भारतीय पासपोर्ट सबसे सुरक्षित
जब चंद्रमोहन से पूछा गया कि क्या वह कभी पोलैंड की नागरिकता लेना चाहेंगे, तो उनका जवाब साफ था. उन्होंने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में किसी दूसरे पासपोर्ट के मुकाबले भारतीय पासपोर्ट रखना बेहतर है. उनका कहना था कि आज के हालात में भारतीय पासपोर्ट सबसे सुरक्षित है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध और तनाव के बीच उनका यह बयान भारत की नागरिकता और देश से जुड़े उनके भरोसे को दिखाता है.
ऑपरेशन गंगा में निभाई अहम भूमिका
चंद्रमोहन की कहानी सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं है. रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जब भारतीय छात्र और नागरिक यूक्रेन से निकलकर पोलैंड की सीमा पर पहुंच रहे थे, तब उन्होंने राहत कार्यों में भी हिस्सा लिया. उन्होंने बताया कि युद्ध के शुरुआती दिनों में सीमा पर पहुंचे कई माता-पिता और छात्र घबराए हुए थे. एक देश से दूसरे देश में प्रवेश करते ही मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्या भी सामने आ रही थी. ऐसे में चंद्रमोहन ने अपनी पुरानी टेलीकॉम कंपनी से संपर्क किया और करीब 5,000 से 6,000 सिम कार्ड उपलब्ध कराने में मदद मांगी. इन सिम कार्ड के साथ 20 जीबी इंटरनेट डेटा मुफ्त दिया गया. इससे सीमा पर पहुंचे लोगों को एक-दूसरे से संपर्क बनाए रखने में मदद मिली. चंद्रमोहन के मुताबिक, सात दिनों तक सीमा पर करीब 300 से 400 स्वयंसेवक अलग-अलग भाषाओं में लोगों की मदद कर रहे थे और वह उनके बीच समन्वय कर रहे थे.
सराहनीय थी ऑपरेशन गंगा की पहल
वह कहते हैं कि उस समय सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ लोगों को सीमा पार कराने की नहीं थी, बल्कि घबराए हुए माता-पिता को भरोसा दिलाने और छात्रों का हौसला बनाए रखने की भी थी. हालात इतने अनिश्चित थे कि किसी को नहीं पता था कि रूसी सेना की बढ़त आगे किस दिशा में जाएगी और क्या युद्ध पोलैंड तक फैल सकता है. चंद्रमोहन ने भारत सरकार के ऑपरेशन गंगा की तारीफ करते हुए कहा कि सरकार ने जिस तरह भारतीयों को वापस लाने की पहल की, वह सराहनीय थी. उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय अभियान के दौरान दूसरे देशों के नागरिकों को भी मदद मिली.
भारत-पोलैंड रिश्तों में कारोबार की नई उम्मीद
चंद्रमोहन को भारत और पोलैंड के बीच बढ़ते व्यापारिक रिश्तों से भी काफी उम्मीदें हैं. उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच सहयोग सिर्फ सामान खरीदने और बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. भारतीय और पोलिश कंपनियों को संयुक्त उद्यम, तकनीक के आदान-प्रदान और प्रतिभा के इस्तेमाल पर भी जोर देना चाहिए. उनके मुताबिक, दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में भरोसा और नेटवर्किंग बेहद अहम हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साल 2024 की पोलैंड यात्रा के बाद उन्हें दोनों देशों के बीच कारोबारी माहौल में सकारात्मक बदलाव महसूस हुआ है.