Dussehra in USA: पूरे देश में धूमधाम से विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व मनाया जा चुका है, भारत में दशहरे के मौके पर एक अलग ही माहौल बन जाता है. कहीं रामलीला के लाउडस्पीकर गूंजने लगते हैं, तो कहीं पटाखों की आवाज आती है. गली-मोहल्लों में बच्चे मेले के सामान देखते हैं तो कहीं गरमा-गरम जलेबियों की खुशबू त्योहार की रौनक बढ़ा देती है. लेकिन जब आप अमेरिका में रहते हैं तो एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती है. न्यू जर्सी या टेक्सास में रहने वाले किसी भारतीय परिवार के लिए दशहरे की सुबह शायद ऑफिस की मीटिंग के अलार्म के साथ शुरू होती है. ना कोई सरकारी छुट्टी, ना पड़ोस के पार्क में रावण दहन का आयोजन और ना ही रिश्तेदारों का बिना बताए घर आ जाना. फिर भी अमेरिका में बसे भारतीय परिवारों ने अपनी परंपराओं और त्योहारों को जीवित रखने के अनूठे तरीके खोज लिए हैं. इनमें कुछ परंपराएं भारत से काफी अलग दिखाई देती हैं, तो कुछ ऐसी हैं जिन्हें देखकर घर की याद और भी गहरी हो जाती है…
जब अमेरिका में मनाया जाता है दशहरा
भारत में त्योहार पंचांग देखकर मनाए जाते हैं, अमेरिका में भी त्योहार की तिथि स्थानीय पंचांग और समय के अनुसार देखी जाती है, इसलिए कई परिवार अपने नजदीकी मंदिर के कैलेंडर के आधार पर पूजा और कार्यक्रमों की योजना बनाते हैं. अमेरिका में अलग टाइम जोन के कारण कई बार त्योहार एक दिन पहले मनाते हैं तो कई बार एक दिन बाद मनाया जाता है. हालांकि, त्योहार के दिन सबसे बड़ी चुनौती काम पर जाने की होती है. अमेरिका में ज्यादातर लोगों को दशहरे के लिए छुट्टी नहीं मिलती. ऐसे में भारतीय मंदिर और सांस्कृतिक संगठन अपने बड़े आयोजन अक्सर नजदीकी शनिवार या रविवार को रखते हैं, ताकि अधिक से अधिक परिवार इनमें शामिल हो सकें.
त्योहार के दिन घर पर ही कर लेते हैं पूजा
वहीं कई बार परिवार वास्तविक तिथि पर ही घर में छोटी-सी पूजा करते हैं. कुछ लोग सुबह ऑफिस जाने से पहले दीप जलाते हैं, तो कुछ शाम को काम से लौटने के बाद परिवार के साथ पूजा और प्रसाद का आयोजन करते हैं. भारत में रहने वाले रिश्तेदारों से संपर्क बनाए रखना भी थोड़ा मुश्किल हो सकता है. अक्टूबर के दौरान भारतीय समय अमेरिका के पूर्वी तट से लगभग साढ़े नौ घंटे और पश्चिमी तट से लगभग साढ़े बारह घंटे आगे रहता है. ऐसे में दिल्ली में सुबह का समय कैलिफोर्निया में देर रात हो सकता है. इसलिए कई परिवार अपनी घर की पूजा का छोटा-सा वीडियो बनाकर भारत में रह रहे माता-पिता और रिश्तेदारों को भेज देते हैं. इस तरह दूरी के बावजूद त्योहार की खुशियां अपनों तक पहुंच जाती हैं.
अमेरिका में रावण दहन
भारत में दशहरे का सबसे आकर्षक दृश्य अक्सर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन होता है. मैदान में उमड़ी भीड़, आतिशबाजी और जय श्रीराम के जयकारों के बीच बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है. लेकिन अमेरिका में खुले मैदान में विशाल पुतले जलाना इतना आसान नहीं है. यहां फायर सेफ्टी रेगुलेशन, स्थानीय प्रशासन की परमिशन, इंश्योरेंस और आयोजन से जुड़ी अन्य शर्तों का पालन करना पड़ता है.
इसी वजह से भारतीय समुदाय इस परंपरा को निभाने के नए तरीके अपनाता है. कुछ संगठन आवश्यक अनुमति लेकर बड़े मैदानों या मंदिर परिसरों में नियंत्रित रावण दहन आयोजित करते हैं, जहां अग्निशमन कर्मियों और सुरक्षा व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है. कुछ जगहों पर छोटे पुतलों का इस्तेमाल होता है, जबकि अन्य आयोजनों में रोशनी, ध्वनि और विशेष प्रभावों के जरिए प्रतीकात्मक दहन दिखाया जाता है.
अमेरिका में रामलीला का आयोजन
रामलीला का आयोजन भी अमेरिका में भारतीय समुदाय के बीच लोकप्रिय है. स्थानीय नाट्य समूहों में बच्चे और बड़े मिलकर रामायण के प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत करते हैं. कई बार छोटे बच्चे हनुमान की सेना के वानरों की भूमिका निभाते हैं, तो कोई राम, लक्ष्मण, सीता या रावण बनता है. मंदिरों के सभागारों और स्कूलों के ऑडिटोरियम में होने वाली ये प्रस्तुतियां उन बच्चों के लिए खास होती हैं, जिनका जन्म और पालन-पोषण भारत से दूर हुआ है. रामलीला उनके लिए केवल एक नाटक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और रामायण से जुड़ने का माध्यम भी बन जाती है.
क्षेत्रीय परंपराएं अमेरिका में भी बरकरार
भारत में दशहरा हर क्षेत्र में एक ही तरीके से नहीं मनाया जाता. कहीं रावण दहन प्रमुख होता है, तो कहीं मां दुर्गा की आराधना, गरबा, गोलू और आयुध पूजा का विशेष महत्व होता है. अमेरिका में बसे भारतीय परिवार भी अपनी क्षेत्रीय परंपराओं को उसी प्रेम और श्रद्धा से आगे बढ़ाते हैं.
बंगाली परिवारों का दुर्गा पूजा उत्सव
अमेरिका के कई शहरों में बंगाली समुदाय दुर्गा पूजा का आयोजन करता है. इसके लिए सामुदायिक भवन या बड़े हॉल किराए पर लिए जाते हैं, जहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर कई दिनों तक पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक भोज का आयोजन होता है. विजयादशमी के अवसर पर कई समुदायों में सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है. इसमें विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. उत्सव का समापन अक्सर विजया दशमी की शुभकामनाओं, मिठाइयों, गले मिलने और परिवार व मित्रों के साथ समय बिताने से होता है. इस तरह सात समंदर पार भी बंगाल की सांस्कृतिक पहचान जीवंत बनी रहती है.
गुजराती समुदाय का गरबा और डांडिया
गुजराती परिवारों के लिए नवरात्रि और दशहरे का उत्सव गरबा और डांडिया के बिना अधूरा-सा लगता है. अमेरिका के न्यू जर्सी, टेक्सास और अन्य क्षेत्रों में गुजराती संगठन बड़े स्तर पर गरबा और डांडिया कार्यक्रम आयोजित करते हैं. कई आयोजन कन्वेंशन सेंटर या बड़े हॉल में होते हैं, जहां पारंपरिक परिधानों में सजे लोग गुजराती संगीत की धुन पर देर रात तक नृत्य करते हैं. रंग-बिरंगे चनिया-चोली, केडियू, झिलमिलाती रोशनी और डांडिया की खनक त्योहार को खास बना देती है. इन कार्यक्रमों में केवल गुजराती परिवार ही नहीं, बल्कि दूसरी भारतीय पृष्ठभूमियों से आने वाले लोग और कई अमेरिकी मित्र भी हिस्सा लेते हैं. इस तरह गरबा और डांडिया भारतीय संस्कृति से परिचित कराने का एक सुंदर माध्यम बन जाते हैं.
दक्षिण भारतीय परिवारों में गोलू और विद्यारंभम
दक्षिण भारत के कई परिवार नवरात्रि के दौरान घर में गोलू सजाते हैं. इसमें सीढ़ीनुमा मंच पर देवी-देवताओं, संतों, पौराणिक पात्रों और रोजमर्रा के जीवन को दर्शाने वाली गुड़ियों की सुंदर सजावट की जाती है. अमेरिका में रहने वाले परिवार भी अपने घरों में गोलू सजाकर रिश्तेदारों और मित्रों को आमंत्रित करते हैं. बच्चे इन गुड़ियों के माध्यम से पौराणिक कथाओं और पारंपरिक कहानियों के बारे में सीखते हैं.
केरल के कई परिवारों में विजयादशमी के दिन विद्यारंभम की परंपरा भी निभाई जाती है. इस अवसर पर छोटे बच्चों को शिक्षा की शुरुआत कराई जाती है. शिक्षक या परिवार का कोई बड़ा सदस्य बच्चे का हाथ पकड़कर चावल या अन्य उपयुक्त माध्यम पर पहला अक्षर लिखवाता है. यह केवल लिखना सीखने की शुरुआत नहीं, बल्कि ज्ञान और शिक्षा के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है.
आयुध पूजा: काम आने वाली हर चीज के प्रति सम्मान
आयुध पूजा की परंपरा भी अमेरिका में रहने वाले भारतीय परिवारों के जीवन में सहजता से शामिल हो जाती है. इस पूजा में उन औजारों, उपकरणों और साधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, जो आजीविका और दैनिक जीवन में सहायक होते हैं. अमेरिका में कोई परिवार अपने लैपटॉप, कार, कामकाज के उपकरणों या किचन में इस्तेमाल होने वाले सामान पर तिलक लगाकर और फूल चढ़ाकर पूजा कर सकता है. किसी के लिए यह ऑफिस में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है, तो किसी के लिए परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों में सहायक साधनों के प्रति आभार जताने का तरीका.
दूरी भले हो, बना रहता है परंपराओं से जुड़ाव
अमेरिका में दशहरा मनाना भारत जैसा बिल्कुल नहीं होता. यहां ना हर जगह रामलीला की आवाज सुनाई देती है, ना हर मोहल्ले में रावण दहन होता है और ना ही त्योहार के दिन काम से छुट्टी मिलना आम बात है. फिर भी भारतीय परिवार अपनी परिस्थितियों के अनुसार त्योहार को नए रूप में अपनाते हैं. कहीं मंदिर में सामूहिक पूजा होती है, कहीं बच्चे रामलीला में अभिनय करते हैं, कहीं गरबा की धुन पर पूरा समुदाय एक साथ नाचता है, तो कहीं घर के छोटे-से पूजा स्थल पर जलता एक दीपक भारत की यादों को ताजा कर देता है. विदेश में पले-बढ़े बच्चों के लिए ये परंपराएं अपनी जड़ों को समझने का माध्यम हैं. वहीं, माता-पिता और दादा-दादी के लिए ये अपने बचपन, परिवार और मातृभूमि से जुड़े रहने का भावनात्मक सहारा बनती हैं.