Archana Jaisal Success Story: BHU से पढ़ी रिक्शा चलाने वाले की बेटी, गांवों में खोल दिए 78 कोचिंग सेंटर, सिर्फ 100 रुपये से फीस

Archana Jaisal Success Story: BHU से पढ़ी रिक्शा चलाने वाले की बेटी, गांवों में खोल दिए 78 कोचिंग सेंटर, सिर्फ 100 रुपये से फीस


Archana Jaisal Success Story: उत्तर प्रदेश के गांवों में एक महिला ने शिक्षा को लेकर ऐसा काम शुरू किया है जिससे हजारों बच्चों की पढ़ाई के साथ सैकड़ों लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी भी बदल रही है. इस महिला का नाम अर्चना जायसवाल (Archana Jaisal) है. उनके पिता जगदीश राम कभी 17 साल की उम्र में परिवार चलाने के लिए रिक्शा चलाते थे. रिक्शा चलाने के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बाद में भारतीय रेलवे में नौकरी हासिल की. पिता चाहते थे कि उनके बच्चों को वे मुश्किलें न झेलनी पड़ें जिनसे उन्हें गुजरना पड़ा था लेकिन पिता के निधन के बाद परिवार एक बार फिर आर्थिक परेशानियों में घिर गया. इसके बावजूद अर्चना ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. आज वही अर्चना उत्तर प्रदेश के छह जिलों में ‘शिक्षा साथी’ (Shiksha Saathi) नाम से एक एजुकेशन स्टार्टअप चला रही हैं. यहां बच्चों को महज 100 रुपये से कोचिंग मिलती है. उनके इस प्रयास से 7,650 से ज्यादा बच्चे जुड़े हैं और 740 से अधिक ग्रामीण लड़कियों और महिलाओं को टीचर बनने की ट्रेनिंग दी जा चुकी है. आइए जानते हैं कि रिक्शा चलाने वाले पिता की बेटी ने गांवों में शिक्षा की यह मुहिम कैसे शुरू की.

अर्चना को याद आता है अपना बचपन

उत्तर प्रदेश के एक गांव में क्लास चल रही है. इसी बीच एक बच्चा आवाज लगाता है-‘अर्चना मैम, मुझे एक सवाल पूछना है.’अर्चना जायसवाल उसकी बात सुनती हैं और सवाल का जवाब देती हैं. तभी दूसरा बच्चा हाथ उठाकर अपनी परेशानी बताने लगता है.क्लास में बच्चों का इस तरह सवाल पूछना सामान्य बात लग सकती है लेकिन अर्चना के लिए यह बहुत मायने रखता है.वह चाहती हैं कि गांवों के बच्चों को पढ़ाई के लिए ऐसे मौके मिलें जहां वे बिना झिझक अपनी परेशानी बता सकें.अर्चना अच्छी तरह जानती हैं कि किसी बच्चे की पढ़ाई पर परिवार की आर्थिक स्थिति, आसपास अच्छे टीचर की उपलब्धता और सही समय पर मिलने वाले अवसर का कितना असर पड़ता है.उनकी अपनी जिंदगी में भी शिक्षा ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.

17 साल की उम्र में पिता को चलाना पड़ा रिक्शा

अर्चना जायसवाल का बचपन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से जुड़ा है. उनके पिता का नाम जगदीश राम था. जगदीश राम का बचपन आर्थिक परेशानियों में बीता था. उनके पिता का निधन उस समय हो गया था जब वह काफी छोटे थे.पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गईं. घर का खर्च चलाने के साथ बहनों की शादी की जिम्मेदारी भी सामने थी.परिवार के पास आमदनी का कोई मजबूत जरिया नहीं था. ऐसे में जगदीश राम ने महज 17 साल की उम्र में रिक्शा चलाना शुरू कर दिया हालांकि वह अपनी पढ़ाई भी जारी रखना चाहते थे.अर्चना बताती हैं कि शुरुआत में उनके पिता को लगा था कि अब पढ़ाई छोड़कर रिक्शा ही चलाना पड़ेगा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.वह दिन में रिक्शा चलाते और समय निकालकर पढ़ाई करते थे.इसी तरह मेहनत करते हुए उन्होंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया.

एक सलाह से बदल गई जिंदगी

जगदीश राम की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव उस समय आया जब रिक्शा चलाने वाले एक व्यक्ति ने उन्हें रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन करने की सलाह दी.वह व्यक्ति पिछले कुछ महीनों से जगदीश राम को काम के साथ पढ़ाई करते देख रहा था.एक दिन बातचीत के दौरान उसने पूछा कि वह रेलवे की नौकरी के लिए आवेदन क्यों नहीं करते.जगदीश राम ने इस सलाह को गंभीरता से लिया.अर्चना के मुताबिक उनके पिता को उस समय यह भी ठीक से पता नहीं था कि आगे क्या करना है लेकिन उन्होंने रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया.कुछ समय बाद उन्हें भारतीय रेलवे में नौकरी मिल गई.इसके बाद वह वाराणसी आ गए.इस एक मौके ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने की शुरुआत कर दी.

रेलवे में नौकरी मिली, करते रहे दूसरे काम

रेलवे में नौकरी मिलने के बाद जगदीश राम वाराणसी में रहने लगे हालांकि शुरुआती दिनों में शहर में खुद को स्थापित करना और परिवार की जरूरतें पूरी करना आसान नहीं था.बेटर इंडिया में छपी रिपोर्ट में बताया गया है कि अर्चना के पिता रेलवे की नौकरी के साथ दूसरे काम भी करते थे.वह बोर्ड और बैनर पेंट करते थे. लोगों के पोर्ट्रेट बनाते थे और टी-शर्ट पर नाम तथा नंबर लिखने का काम भी करते थे.इन कामों से उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती थी.अर्चना बताती हैं कि उनके पिता ने शहर में गुजारा करने के लिए काफी मेहनत की.उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि बच्चों को ऐसी जिंदगी मिले जिसमें उन्हें बचपन से परिवार चलाने के लिए संघर्ष न करना पड़े.

बच्चों को गांव से शहर लाए पिता 

जगदीश राम नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे उन्हीं परिस्थितियों में बड़े हों जिनका सामना उन्होंने बचपन में किया था इसलिए वाराणसी में रहने और काम की व्यवस्था करने के कुछ महीनों बाद वह अपने बच्चों को भी शहर ले आए. यहां बच्चों की पढ़ाई शुरू हुई.धीरे-धीरे परिवार की जिंदगी पटरी पर आने लगी.बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और अपने भविष्य को लेकर सपने देखने लगे थे लेकिन कुछ समय बाद परिवार के सामने एक ऐसी मुश्किल आ गई जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी.

पिता का निधन हुआ तो फिर आया आर्थिक संकट

अर्चना अभी छोटी थीं तभी उनके पिता जगदीश राम का निधन हो गया.उनके जाने के बाद परिवार के सामने आर्थिक परेशानियां खड़ी हो गईं.अर्चना के परिवार में पांच बहनें और एक भाई थे.पिता के निधन के बाद उनकी मां के रेलवे में नौकरी करने की बात थी लेकिन वह नौकरी करने की स्थिति में नहीं थीं.ऐसे में परिवार के पास नियमित आमदनी का कोई मजबूत जरिया नहीं बचा.परिवार रेलवे क्वार्टर में रह रहा था लेकिन रोजमर्रा के खर्च पूरे करना मुश्किल होने लगा.सबसे बड़ी चिंता बच्चों की पढ़ाई को लेकर थी.जिस शिक्षा के लिए जगदीश राम ने इतनी मेहनत की थी आर्थिक संकट के कारण वही पढ़ाई बीच में छूटने का खतरा पैदा हो गया.

बड़ी बहन ने संभाली जिम्मेदारी

पिता के निधन के बाद अर्चना और उनके भाई-बहनों ने एक-दूसरे का सहारा बनने की कोशिश की.इस मुश्किल समय में उनकी बड़ी बहन ने परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए कदम बढ़ाया.कुछ महीनों बाद बड़ी बहन ने कमाना शुरू कर दिया.वह अपनी कमाई से घर के लिए राशन खरीदने और भाई-बहनों की ट्यूशन फीस भरने में मदद करती थीं.अर्चना के मुताबिक बड़ी बहन की मदद से परिवार की आर्थिक स्थिति को कुछ सहारा मिला और बच्चों की पढ़ाई जारी रह सकी.इस दौरान भाई-बहन पढ़ाई के साथ कभी-कभी दूसरों को पढ़ाने की प्रैक्टिस भी करते थे.अर्चना के लिए यह दौर मुश्किल जरूर था लेकिन परिवार के सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया.

BHU से किया ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन

घर की आर्थिक परेशानियों के बावजूद अर्चना जायसवाल ने अपनी पढ़ाई जारी रखी.उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया.इसके बाद इसी विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी पूरी की.अर्चना का सपना कभी प्रोफेसर बनने का था लेकिन उन्हें लगता है कि सही मार्गदर्शन और जरूरी संसाधनों की कमी के कारण वह उस लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकीं.अपनी जिंदगी के इन अनुभवों से उन्होंने एक बात समझी कि केवल पढ़ाई करने की इच्छा होना काफी नहीं है.किसी छात्र को आगे बढ़ने के लिए सही जानकारी, मार्गदर्शन और अवसर भी मिलने चाहिए.यही सोच आगे चलकर उनके काम की बुनियाद बनी.

सातवीं के बच्चों से सवाल पूछे तो आई बड़ी परेशानी

कुछ साल बाद अर्चना उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अपने रिश्तेदारों के बच्चों से मिलीं.ये बच्चे नियमित रूप से स्कूल जाते थे लेकिन जब अर्चना ने उनसे स्कूल में पढ़ाए गए विषयों के बारे में सवाल पूछे तो कई बच्चे जवाब नहीं दे पाए.कुछ बच्चे सातवीं कक्षा तक पहुंच चुके थे लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई की बुनियादी बातें याद नहीं थीं.अर्चना को यह देखकर हैरानी हुई.उन्हें महसूस हुआ कि बच्चों का स्कूल जाना और वास्तव में अच्छी तरह सीखना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.उन्होंने इस समस्या को समझने की कोशिश की.इसी दौरान उन्हें गांवों में शिक्षा से जुड़ी एक और बड़ी परेशानी का पता चला.

गांवों में लड़कियों के पास कमाई के मौके भी थे कम

अर्चना ने देखा कि गांवों में पढ़ाई कर चुकी कई लड़कियों और महिलाओं के पास कमाई के ज्यादा अवसर नहीं थे.गांवों में ट्यूशन और कोचिंग सेंटर भी सीमित संख्या में थे.दूसरी तरफ बहुत से परिवारों के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए शहर भेजना आसान नहीं था.इसी तरह कई लड़कियों के लिए नौकरी या दूसरे काम के सिलसिले में शहर जाना भी मुश्किल था.अर्चना ने सोचा कि अगर गांव में ही बच्चों को अच्छी पढ़ाई की सुविधा मिले और स्थानीय लड़कियों को टीचिंग का मौका दिया जाए तो दोनों समस्याओं पर एक साथ काम किया जा सकता है.यहीं से एक ऐसे एजुकेशन मॉडल का विचार सामने आया जिसमें बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं की कमाई को आपस में जोड़ा गया.

2022 में शुरू किया कोचिंग 

अर्चना जायसवाल ने साल 2022 में अपने एजुकेशन स्टार्टअप की शुरुआत की.शुरुआत में इसका नाम Your Coaching रखा गया था.बाद में साल 2023 में इस संस्था को औपचारिक रूप से Shiksha Saathi के नाम से रजिस्टर कराया गया.यह एक रूरल एजुकेशन और लाइवलीहुड स्टार्टअप है.इसका मकसद गांवों के बच्चों को उनके घर के आसपास कम फीस में पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध कराना और ग्रामीण लड़कियों तथा महिलाओं को रोजगार के अवसर देना है.अर्चना का विचार था कि अगर बच्चे अच्छी पढ़ाई के लिए शहर नहीं जा सकते तो पढ़ाई की बेहतर सुविधा गांव तक क्यों नहीं पहुंचाई जाए.इसी सोच के साथ उन्होंने गांवों में छोटे-छोटे लर्निंग सेंटर खोलने शुरू किए.शिक्षा साथी के लर्निंग सेंटर में पहली से बारहवीं कक्षा तक के बच्चों को स्कूल के बाद कोचिंग दी जाती है.छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए कोचिंग फीस करीब 100 रुपये से शुरू होती है वहीं बारहवीं कक्षा के स्टूडेंट्स के लिए फीस 600 रुपये तक है.



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