उत्तराखंड में जमीन के नीचे छिपा खतरा, हिमालयी फॉल्ट में जमा तनाव लाएगा तबाही
Agency:एजेंसियां
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उत्तराखंड में मेन हिमालय थ्रस्ट के नीचे तनाव जमा हो रहा है. यह तनाव 8.1 मैग्नीट्यूड के बराबर हो सकता है. नई स्टडी में सामने आया है कि अगर इस तनाव की वजह से चट्टान कमजोर हुई तो ये तनाव भूकंप के तौर पर बाहर भी निकल सकता है. अगर 8.1 मैग्नीट्यूड से भूकंप आए तो भारी तबाही की वजह बन सकता है.
जोशीमठ पहले से खतरे में है.
उत्तराखंड में जमीन के नीचे टेक्टोनिक तनाव जमा हो रहा है. तमिलनाडु केंद्रीय विश्विवद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक यहां जमा होने वाली ऊर्जा की मात्रा हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर हो सकती है. यह अध्ययन इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तराखंड मध्य हिमालय के उस हिस्से में आता है, जिसे भूकंपों के लिहाज से अहम माना जाता है. यहां भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट की ओर बढ़ रही है. इस हलचल से जमीन के मौजूद चट्टानों में तनाव जमा होता है, जो किसी दिन बड़े भूकंप के रूप में बाहर निकल सकता है.
तमिलनाडु केंद्रीय विवि के रिसर्चरों ने ग्लोबल नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम और जापान के ALOS-2 उपग्रह से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल कर इस तनाव को समझने की कोशिश की है. एविडेंस ऑफ स्ट्रॉन्ग प्लेट कंपलिंग इन उत्तराखंड हिमालय शीर्षक से इस रिसर्च को यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन में प्रस्तुत किया गया है.
स्टडी में क्या आया सामने?
शोधकर्ताओं के मुताबिक उत्तराखंड में मेन हिमालय थ्रस्ट के नीचे भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच मजबूत कपलिंग है. यानी दोनों प्लेटें साथ घूमनी चाहिए. हालांकि उत्तराखंड के नीचे तकरीबन 115 किलोमीटर की चौड़ाई में ऐसा नहीं हो रहा. रिसर्च के मुताबिक यूरेशियन प्लेटें तो अपनी गति से घूम रही हैं, मगर भारतीय प्लेटें अटक रही हैं. इसमें हर साल तकरीबन 18 मिलीमीटर का अंतर आ रहा है. इस स्थिति को स्लिप डेफिसिट कहा जाता है. इसी वजह से फॉल्ट के अंदर तनाव जमा हो रहा है. तनाव का यह स्तर 8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर हो सकता है. इसके अलावा ALOS-2 उपग्रह के आंकड़ों का एनालिसिस करने पर यह भी सामने आया कि जमीन हर साल 4 से 6 मिलीमीटर की दर से ऊपर उठ रही है.
8.1 तीव्रता का भूकंप क्या होता है?
भूकंप को मैग्नीट्यूट में मापा जाता है. यह असल में भूकंप की ऊर्जा होती है. 8.1 मैग्नीट्यूट का भूकंप बंद शक्तिशाली होता है जो एक बड़े इलाके को नुकसान पहुंचा सकता है. हालांकि वास्तविक नुकसान इस लिहाज से तय होता है कि भूकंप की गहराई और केंद्र कहां है. रिसर्च में हर साल 8.2 मैग्नीट्यूट के भूकंप के बराबर ऊर्जा जमा होने का अनुमान दिया गया है. ऐसे में अगर कभी ये तनाव बाहर निकलता है तो उत्तराखंड में इतने ही स्तर का भूकंप आने का खतरा है.
कैसे पता चला कि जमीन के नीचे तनाव है?
रिसर्च के लिए GNSS तकनीक अपनाई गई. इसमें धरती पर स्थापित स्टेशनों के जरिए ये पता लगाया जाता है कि जमीन किस दिशा में और कितनी तेजी से खिसक रही है. इसके अलावा AlOS-2 InSAR उपग्रह से जमीन के बदलाव का पता लगाया गया. इसमें जमीन का उठना या नीचे धंसना समझ में आता है.
मेन हिमालयन थ्रस्ट क्या है?
हिमालय का निर्माण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ है. भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ रही है और यूरेशियन प्लेट नीचे की ओर धंस रही हैं. इस प्रक्रिया जहां हो रही है उसे ही मेन हिमालय थ्रस्ट कहा जाता है.भारतीय प्लेटें लॉक होने की वजह से इसमें तनाव जमा हो रहा है. इस वजह से आसपास की चट्टानें कमजोर हो रही हैं. अगर कभी चट्टानें इतना कमजोर हो गईं कि इस दबाव को सहन न कर पाइ्रा तो फॉल्ट का हिस्सा अचानक खिसक जाएगा और भूकंप आ जाएगा.
कितनी खास है ये रिसर्च
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक, उत्तराखंड भूकंपीय दृष्टि से सक्रिय क्षेत्र में आता है और राज्य के हिस्से भूकंपीय जोन IV और V में शामिल हैं. ऐसे में ये रिसर्च बहुत अहम रहने वाला है.
इस तरह के शोध से सरकारों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को लंबे समय के खतरे को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है. इससे भवन निर्माण के मानकों, अस्पतालों और स्कूलों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जा सकता है.