ईरान में मिला था पूंछ पर मकड़ी बनाकर पक्षियों का शिकार करने वाला यह सांप, 56 साल बाद हड्डियों ने खोला राज

ईरान में मिला था पूंछ पर मकड़ी बनाकर पक्षियों का शिकार करने वाला यह सांप, 56 साल बाद हड्डियों ने खोला राज


यह दुर्लभ नमूना दशकों तक म्यूजियम के शेल्फ पर सुरक्षित रखा रहा. इसके बाद साल 2003 में वैज्ञानिकों को ठीक वैसी ही पूंछ वाला एक और सांप मिला. लंबी जांच के बाद साल 2006 में वैज्ञानिकों ने इसे एक बिल्कुल नई प्रजाति के तौर पर दर्ज किया.

फील्ड म्यूजियम के कलेक्शन में मौजूद संरक्षित नमूने की पूंछ. (Image Credit: Sara Ruane)

इसके बाद 1968 में पकड़े गए पहले सांप को इसका होलोटाइप यानी संदर्भ नमूना बना दिया गया. जंगलों में शूट किए गए वीडियो फुटेज से साफ हुआ कि सांप अपनी पूंछ को मकड़ी की तरह हिलाकर पक्षियों को आकर्षित करता है.


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एक्सरे स्कैन के 3800 से ज्यादा फोटो में सांप का कंकाल कैसा दिखा?

फील्ड म्यूजियम ने साल 2024 के अंत में अपनी नई हाई-टेक एक्सरे स्कैनिंग लैब शुरू की. वैज्ञानिक सारा रूएन ने तय किया कि इस अनोखे वाइपर को सबसे पहले स्कैनर के अंदर डाला जाएगा.

इस एडवांस स्कैनर की खासियत यह है कि यह बिना किसी चीर-फाड़ के नमूने का पूरा थ्री-डी मॉडल तैयार कर देता है. यह स्कैनिंग प्रक्रिया लगभग 44 मिनट तक चली. इस दौरान कुल 3,848 एक्सरे इमेज ली गईं.

पोलिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के जॉर्जिओस जॉर्जियालिस और हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के कास्पर वेगजिन ने पूरे कंकाल का बारीकी से अध्ययन किया.

पूंछ पर रेंगने वाली फर्जी मकड़ी का राज हड्डियों में क्यों नहीं मिला?

वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि मकड़ी जैसी पूंछ को सहारा देने के लिए अंदर कोई खास कंकाल तंत्र होगा. रबर बोआ और सैंड बोआ जैसे कुछ दूसरे सांपों की पूंछ के सिरे पर बेहद अजीब हड्डियां पाई जाती हैं. जॉर्जियालिस ने कहा, ‘दूसरे सांपों की पूंछ में काफी अनोखे आकार की हड्डियां दिखती हैं.’ लेकिन इस वाइपर के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं निकला.

नकली मकड़ी के शरीर या उसकी टांगों के अंदर हड्डी का कोई भी हिस्सा नहीं फैला हुआ था. सारा रूएन ने कहा, ‘कंकाल के अंदर ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि बाहर इतनी असाधारण मकड़ी जैसी संरचना बनी है.’ इस जांच से साफ हो गया कि शिकार को रिझाने वाली यह पूरी संरचना केवल त्वचा और स्केल्स यानी शल्कों से बनी है. हड्डियों में इसका कोई नामोनिशान तक नहीं था.

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शिकार को फंसाने के लिए सांप की पूंछ पर कैसे बनी मकड़ी की टांगें?

सांप के शरीर की त्वचा पूंछ के पास आकर बेहद खुरदरी और कांटेदार हो जाती है. यह बनावट सांप को पत्थरों के बीच पूरी तरह छिपने में मदद करती है. पूंछ के बिल्कुल सिरे पर पहुंचकर सांप की त्वचा के स्केल्स लंबे और लचीले धागों में बदल जाते हैं.

ये धागे ही देखने में मकड़ी की चलती हुई टांगों जैसे लगते हैं. मकड़ी का फूला हुआ गोल पेट वास्तव में कई स्केल्स के आपस में जुड़ने से बना है.

दुनिया में रैटलस्नेक, बोआ और अजगर जैसे कई सांप अपनी पूंछ हिलाकर शिकार को पास बुलाते हैं. लेकिन वे अपनी सामान्य पूंछ का ही इस्तेमाल करते हैं. जीवित सरीसृपों में किसी भी दूसरे जीव के पास ऐसे धागे जैसे स्केल्स नहीं पाए जाते हैं.

XCT स्कैन में सांप की अजीबोगरीब पूंछ के अंदर सामान्य हड्डियां दिखाई दे रही हैं. (Image Credit: Sara Ruane and Stephanie Smith)

इस सांप ने बिना हड्डियों में बदलाव किए दुनिया का सबसे चतुर फरेब तैयार कर लिया.

जीवाश्मों की खोज करने वाले वैज्ञानिकों के लिए यह स्टडी सबक क्यों बन गई?

इस जांच के नतीजे जीवाश्म विज्ञानियों के लिए एक बड़ी सीख बन गए हैं. धरती में लाखों साल पुराने सांपों के जीवाश्म आमतौर पर बिखरी हुई हड्डियों के रूप में ही मिलते हैं. वैज्ञानिक इन्हीं हड्डियों के आधार पर प्राचीन प्रजातियों का नाम तय करते हैं. एक वाइपर की कशेरुका को पहचानना आसान है, लेकिन उसकी सटीक प्रजाति बताना बहुत मुश्किल काम है.

जॉर्जियालिस ने कहा, ‘हम जीवाश्म विज्ञानी ऐसी पहेली सुलझाने की कोशिश करते हैं जिसके कई टुकड़े गायब होते हैं.’ अगर भविष्य में इस वाइपर का सिर्फ जीवाश्म मिलता तो कोई भी वैज्ञानिक यह नहीं जान पाता कि इसकी पूंछ पर मकड़ी जैसी आकृति थी. त्वचा, रंग और शिकार करने का व्यवहार जीवाश्मों में कोई निशान नहीं छोड़ता है. इसका मतलब है कि अतीत के कई जीव अपनी हड्डियों की तुलना में कहीं ज्यादा विचित्र रहे होंगे.

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इस रहस्यमय शिकारी सांप के बारे में अब भी कौन से सवाल बाकी हैं?

इस प्रजाति से जुड़े दो करीबी सांपों के कंकाल का अब तक कोई स्कैन नहीं हुआ है. इसलिए वैज्ञानिक यह नहीं जानते कि क्या यह विशेषता केवल इसी वाइपर में है. पूंछ की हड्डियों के नीचे एक कांटेदार संरचना मिली है, जो दूर के दो अन्य वाइपर में भी देखी गई है. इसके अलावा यह सवाल भी बना हुआ है कि ये धागे जैसे स्केल्स शरीर पर कैसे उगते हैं.

शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से आगे की जांच करनी होगी. अच्छी बात यह रही कि बिना किसी नुकसान के 1968 का मूल नमूना सुरक्षित वापस रख दिया गया है. इसके सभी 3डी स्कैन अब मॉर्फसोर्स प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध करा दिए गए हैं. यह अध्ययन द एनाटॉमिकल रिकॉर्ड जर्नल में प्रकाशित हुआ है.



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