Meiteis vs Kukis in Manipur: 3 साल में 60000 बेघर… मणिपुर में मैतेई कुकी-नागा क्यों बने एक-दूसरे के दुश्मन, जमीन-आरक्षण या सत्ता क्‍या है वजह?

Meiteis vs Kukis in Manipur: 3 साल में 60000 बेघर… मणिपुर में मैतेई कुकी-नागा क्यों बने एक-दूसरे के दुश्मन, जमीन-आरक्षण या सत्ता क्‍या है वजह?


मण‍िपुर में पिछले तीन सालों से हिंसा की ऐसी तस्‍वीरें सामने आ रही हैं ज‍िसे देखकर इंसान‍ित शर्मसार हो रही है. सोमवार को इंफाल पूर्वी और कांगपोकपी जिलों की सीमा पर जंगल से जलावन की लकड़ियां इकट्ठा कर रहे मैतेई समुदाय के सोलह लोगों के समूह पर उग्रवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें तीन की जान चली गई, कई घायल हो गए और कुछ लापता भी बताए जा रहे हैं. मैतेई संगठन ‘ मैतेई हेरिटेज सोसाइटी’ ने इस हमले के लिए ‘कुकी उग्रवाद‍ियों’ को जिम्मेदार ठहराया है. वहीं आज खबर आ रही है कि जंगल में लकड़ी लेने गए एक 45 साल के आदमी की गोली मारकर हत्‍या कर दी गई, जो कुकी सुमदाय से था. असल में मणिपुर में 3 मई 2023 से जातीय संघर्ष जारी है. उस दिन राज्य के तीन प्रमुख समुदायों में से दो, मैतेई और कुकी समुदायों के बीच पहली बार हिंसा भड़की थी. लेकिन अब इस संघर्ष में नागा भी शाम‍िल हो गए हैं.

2023 से अब तक इस हिंसा में तीनों समुदायों के कम से कम 300 लोग मारे जा चुके हैं और 60,000 से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है. पर नोर्थ-ईस्‍ट के खूबसूरत प्राकृतिक दृश्‍यों में पनप रही आखिर 2 समुदायों के बीच के इस स्‍याह संघर्ष की वजह क्‍या है? क्‍या कारण है कि सालों से एक साथ रहने वाले यह समुदाय अचानक इस तरह एक-दूसरे के खून के प्‍यासे हो गए हैं? इसके ल‍िए इन समुदायों के इत‍िहास और इस संघर्ष की जड़ को समझना जरूरी है.

इस हिंसा के दौरान एक 5 साल के बच्चे और 6 महीने के बच्ची की हत्या हुई. (फोटो- रायर्टस)

घाटी-पहाड़ी में बंटा मणिपुर
दरअसल मण‍िपुर मुख्‍य रूप से ह‍िस्‍सों में बंटा है. पहाड़ी इलाका जो लगभग 90 प्रतिशत है. दूसरा है घाटी का 10% इलाका है जहां मणिपुर की बड़ी आबादी यहीं रहती है. मणिपुर की कुल जनसंख्‍या 34 लाख है और यहां 3 प्रमुख समुदाय हैं, मैतेइ, नगा और कुकी-जो. नागा और कुकी-जो दोनों आदिवासी समुदाय राज्य की लगभग 90% जमीन यानी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं. यानी राज्‍य की 90 प्रतिशत जमीन और संसाधनों पर इनका अध‍िकार है. जबकि मैतेई अधिकतर इंफाल घाटी में ही रहते हैं. यहां राज्‍य की जमीन का बस 10% ही हिस्‍सा है पर इनकी आबादी काफी ज्‍यादा है. नगा और कुकी-जो के पास अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा है, जबकि मैतेई अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या अनुसूचित जाति (SC) में आते हैं. इसी जातीय आरक्षण के चलते इनके बीच संघर्ष शुरू हुआ है.

कौन हैं कूकी?
कुकी एक आदिवासी समुदाय है, जिसे कई जगह कुकी-जो, चिन, जोमी या मिजो नामों से भी जाना जाता है. यह समुदाय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा म्यांमार और बांग्लादेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भी पाया जाता है. मणिपुर में कुकी समुदाय मुख्य रूप से चूड़ाचांदपुर, कांगपोकपी, फेरजाल और मोरेह जैसे पहाड़ी जिलों में रहता है. ज्यादातर कुकी लोग ईसाई धर्म को मानते हैं. इतिहास बताता है कि ब्रिटिश शासन के दौरान कई कुकी लोगों को इस क्षेत्र में मैतेई बहुल घाटी और नागा बहुल इलाकों के बीच एक बफर के तौर पर बसाया गया था.

2023 से अब तक इस हिंसा में तीनों समुदायों के कम से कम 300 लोग मारे जा चुके हैं और 60,000 से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है. (फोटो – रायर्टस)

कौन हैं मैतेई?
इंफाल की घाटी इलाकों में रहने वाले मैतेई आबाजी में ज्‍यादा हैं. इनके पास राज्‍य की जमीन का महज 10% है लेकिन इनकी आबादी लगभग 54% है. मैतेई समुदाय के अधिकतर लोग हिंदू हैं और राजनीतिक व आर्थिक रूप से यहां मजबूत माने जाते हैं. हिंदू धर्म के अलावा इनमें से कुछ लोग एक स्वदेशी धर्म सनमाही और मैतेई पंगल के मुस्लिम समुदाय को भी मानते हैं.
क्यों है इन समुदायों के बीच संघर्ष?

क्‍या है इसे पूरे विवाद की वजह?
कुकी-जो और नागा समुदायों को अनुसूचित-जनजाति यानी एसटी का दर्जा मिला है. इसल‍िए मैतेई राज्‍य के 90% इलाके में जमीन नहीं खरीद सकते. अब मैतेई समुदाय की मांग है कि उन्हें भी जनजाति का दर्जा दिया जाए. 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर ने मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति दर्जा देने की मांग के खिलाफ एकजुटता मार्च निकाला था. कुकी और नागा इस मांग का व‍िरोध कर रहे हैं. उन्‍हें डर है कि अगर मैतेई को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाता है तो वह पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदने और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पाने के पात्र हो जाएंगे. 3 मई को हुई इस रैली के दौरान चुराचांदपुर जिले के तोरबुंग में हिंसा हुई. इसके बाद पूरे राज्य में जातीय हिंसा फैल गई.

कुकी एक आदिवासी समुदाय है, जिसे कई जगह कुकी-जो, चिन, जोमी या मिजो नामों से भी जाना जाता है. (फोटो – रायटर्स)

मैतेई और कुकी-जो के तर्क
मैतेई समुदाय की दलील थी कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हुआ था. उससे पहले उन्हें जनजाति का ही दर्जा मिला हुआ था. इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सिफारिश की कि मैतेई को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल किया जाए. मैतेई का कहना है कि इन लोगों (कुकी-जो और नागा) ने रोजगार के लिए जंगल काटे और अफीम की खेती करने लगे. इससे मणिपुर ड्रग तस्करी का ट्राएंगल बन गया. यह सब खुलेआम हो रहा है.

वहीं कुकी-जो और नागा संगठन ने मैतेई को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा म‍िलने की मांग पर कड़ी आपत्ति जताई. उनका तर्क है कि राज्य की 60 में से 40 विधानसभा सीट पहले से मैतेई बहुल इंफाल घाटी में हैं. ऐसे में ST वर्ग में मैतेई को आरक्षण मिलने से उनके अधिकारों का बंटवारा होगा. बता दें कि मणिपुर के 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई और 20 विधायक नगा-कुकी जनजाति से हैं.



Source link