सामान्य सुई से टांके.. एंबुलेंस नहीं आई तो ट्रॉली से अस्पताल पहुंचा युवक, डॉक्टरों ने मृत घोषित किया

सामान्य सुई से टांके.. एंबुलेंस नहीं आई तो ट्रॉली से अस्पताल पहुंचा युवक, डॉक्टरों ने मृत घोषित किया


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बालाघाट में स्वास्थ्य व्यवस्था बेपटरी हो गई है. कुम्हारी गांव में सड़क हादसे में घायल युवक ढाई घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार करता रहा लेकिन एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंची, जिसके बाद पुलिस और ग्रामीणों ने उसे ट्रॉली से जिला अस्पताल पहुंचाया. जहां डॉक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. लेकिन अस्पताल में सामान्य सुई से टांके लगाने के मामलों ने पोल खोल दी है.

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बालाघाट में दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था

चितरंजन/बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से स्वास्थ्य सेवाओं की बेहद लचर और संवेदनहीन तस्वीरें सामने आई है. हाल ही में बैगा आदिवासी बच्चों की मौतों के बाद अब शहरी और ग्रामीण दोनों अंचलों में चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली खुलकर सामने आ गई है, जिसके गवाह खुद क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि बने हैं.

पहली घटना बालाघाट से लगे कुम्हारी गांव की है, जहां एक सड़क हादसे में घायल युवक ढाई घंटे तक दर्द से तड़पता रहा. सूचना देने के बावजूद 108 एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंची, जबकि डायल 112 वाहन मौके पर आ गया था. आखिरकार पुलिस और ग्रामीणों को घायल को ट्रैक्टर की ट्रॉली में लिटाकर जिला अस्पताल पहुंचाना पड़ा, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. घटना से नाराज परसवाड़ा विधायक मधु भगत ने मौके पर पहुंचकर व्यवस्थाओं पर गहरा रोष जताया और पुलिस अधिकारियों से बात की.

अस्पताल कर्मियों ने धमकाया
दूसरी घटना कटंगी के सरकारी अस्पताल की है, जहां सिंगोड़ी में सड़क हादसे में घायल एक मरीज के घावों पर सर्जिकल सुई के बजाय कपड़े सीने वाली साधारण सुई से टांके लगा दिए गए. जब परिजनों ने इस गंभीर लापरवाही का विरोध किया, तो अस्पताल कर्मियों ने उन्हें डराते-धमकाते हुए जहां चाहे शिकायत करने की बात कही. मामला तूल पकड़ने पर स्थानीय विधायक गौरव सिंह पारधी अस्पताल पहुंचे और स्टोर कीपर को फटकार लगाते हुए अपनी जेब से पैसे देकर तुरंत सर्जिकल नीडल मंगवाई.

आम जनता भगवान भरोसे
हालांकि, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघन दहिया ने अजीब तर्क देते हुए कहा कि वह सर्जिकल सुई ही थी, जो दिखने में साधारण सुई जैसी लगती है. यह पूरा घटनाक्रम बालाघाट की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था की बानगी मात्र है. जिले के 10 में से 8 विकासखंड स्तरीय अस्पतालों में महिला रोग विशेषज्ञ तक नहीं हैं, जिसके कारण ग्रामीण मरीजों को मजबूरन जिला अस्पताल या महंगे निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है. इसके अलावा, कई अस्पतालों में आधुनिक मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन उन्हें संचालित करने वाले ऑपरेटर तक तैनात नहीं हैं, जिससे आम जनता भगवान भरोसे जीने को मजबूर है.



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