Exclusive: ट्रेड डील से लेकर QUAD और पाकिस्तान से लेकर होर्मुज तक, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का पूरा इंटरव्यू

Exclusive: ट्रेड डील से लेकर QUAD और पाकिस्तान से लेकर होर्मुज तक, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का पूरा इंटरव्यू


Marco Rubio Interview: नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए इंटरव्यू में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बहुत कुछ साफ कर दिया. भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर रूबियो ने कहा कि यह समझौता अब महीनों नहीं बल्कि कुछ हफ्तों की दूरी पर है. इसमें केवल कुछ तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप देना बाकी है. इस समझौते से भारत को बेहतर टैरिफ दरें मिलने की उम्मीद है. जोशी के सवाल पर रूबियो ने रूस पर नए प्रतिबंध तुरंत न लगाने के राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले का भी बचाव किया. उनका मानना है कि ट्रेड डील से दोनों देशों के बीच उपजे तनाव को कम करने में मदद मिलेगी. पाकिस्तान के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि परमाणु हथियारों और भौगोलिक स्थिति की वजह से अमेरिका रिश्ते बनाए रखेगा. इससे भारत की सुरक्षा चिंताओं को सुलझाने में भी मदद मिल सकती है. पढ़‍िए, मार्को रूबियो के इंटरव्यू के संपादित अंश.

राहुल जोशी: सेक्रेटरी रूबियो, नेटवर्क18 को यह एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देने के लिए बहुत धन्यवाद और भारत में आपका स्वागत है. आप भारत के शुभचिंतक रहे हैं. आप एक बड़े वैश्विक नेता हैं. कुछ ही महीनों में यह आपका दूसरा दौरा है. पिछली बार आप दिल्ली में थे और आगरा जाकर आपने अच्छा वक्त बिताया था. इस बार आपने दिल्ली को छोड़कर सीधे मुंबई का रुख किया है और आप जामनगर भी जा रहे हैं. इस दौरे की क्या अहमियत है और आप क्या हासिल करना चाहते हैं?

मार्को रूबियो: देखिए, यह एक बहुत बड़ा और अहम देश है. किसी भी बड़े देश की तरह मैं लोगों से यही कहता हूं कि अगर अमेरिका को समझना है तो सिर्फ वाशिंगटन जाना काफी नहीं है. आपको दक्षिण के राज्यों या वेस्ट कोस्ट जाना चाहिए. आपको न्यूयॉर्क और शिकागो भी जाना पड़ेगा.

मेरे लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के तौर पर पूरे भारत को देख पाना मुमकिन नहीं है. इतने बड़े देश को जितना हो सके करीब से देखना और समझना बेहद जरूरी है. मुंबई खास तौर पर इस देश का वित्तीय दिल और आत्मा है. यहां ऐसी तमाम कंपनियां मौजूद हैं जो अमेरिका में निवेश कर रही हैं. हम भी उनके साथ ज्यादा व्यापार करना चाहते हैं. यह देश की आर्थिक जीवनरेखा है. इसलिए यहां आना पूरी तरह से स्वाभाविक है. आज मैंने अपने मीडिया से भी यही कहा जब वे पूछ रहे थे कि हम यहां क्यों आए हैं. मीडिया कभी-कभी चाहता है कि हम दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाएं. मैंने उनसे कहा कि इस रिश्ते की अहमियत को देखते हुए हम यहां बहुत कम आते हैं.

मुझे खुशी है कि मैं यहां आया हूं और इस वक्त एक कांग्रेस डेलिगेशन भी शहर में मौजूद है. यहां हमारे अटॉर्नी जनरल और कॉमर्स सेक्रेटरी भी आ चुके हैं. मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं दोबारा यहां आऊंगा.

राहुल जोशी: चूंकि हम आर्थिक राजधानी मुंबई में हैं तो सीधे काम की बात पर आते हैं. भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर आपने आज कहा कि यह बहुत करीब है. यह डील कितनी करीब है और क्या इसकी कोई अंतिम तारीख तय है?

मार्को रूबियो: जी हां, मुझे पहले भी ऐसा ही लगा था. ऐसे समझौतों में घोषणा से पहले हर छोटी बात पर पूरी सहमति होना बेहद जरूरी होता है. आप इतने बड़े रिश्ते को खतरे में नहीं डाल सकते कि पहले घोषणा कर दी जाए और बाद में पता चले कि डील फाइनल नहीं हुई थी.

लेकिन यह वाकई बहुत करीब है. अब सिर्फ कुछ तकनीकी पहलुओं को सुलझाना बाकी रह गया है. तकनीकी बातें इसलिए मायने रखती हैं क्योंकि दोनों पक्षों को भाषा के एक ही मतलब पर सहमत होना होता है. बात अब उसी स्तर पर पहुंच चुकी है. मैं खुद इस पर बातचीत नहीं कर रहा हूं क्योंकि यह काम हमारे ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव का है. मैं इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए हुए हूं. हम उम्मीद कर रहे हैं कि यह काम महीनों में नहीं बल्कि कुछ हफ्तों में हो जाएगा.

राहुल जोशी: क्या आपको लगता है कि भारत को दूसरों के मुकाबले बेहतर दरों की उम्मीद करनी चाहिए?

मार्को रूबियो: जाहिर है कि किसी भी डील का मकसद मौजूदा दरों से बेहतर दरें हासिल करना होता है. इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि हमारे व्यापारिक रिश्ते टिकाऊ बने रहें. अमेरिका की विदेश नीति और ट्रेड पॉलिसी इस सोच पर चलती है कि हर देश के अपने राष्ट्रीय हित होते हैं. हम भारत ही नहीं बल्कि हर देश से यह उम्मीद करते हैं कि वह अपने फायदे के लिए लड़ेगा. हम भी अपने हितों के लिए खड़े होंगे.

फर्क सिर्फ इतना है कि जब आप दोस्त और सहयोगी होते हैं तो मतभेदों को आसानी से सुलझा लेते हैं. इससे दोनों के फायदे का रास्ता निकलता है. किसी भी देश के साथ ट्रेड डील को लंबे समय तक टिकाऊ रखने के लिए जरूरी है कि वह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद हो. इसमें कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आपको पसंद न आएं. इसके बावजूद उसका बड़ा हिस्सा आपके हित में होना चाहिए. हमारा मकसद यही हासिल करना है. हम इसे जल्द पूरा करना चाहते हैं क्योंकि मिलकर काम करने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है.

राहुल जोशी: मिस्टर सेक्रेटरी, अमेरिका रूसी तेल खरीदने पर भारत जैसे देशों पर प्रतिबंध और टैरिफ लगाता है. अब मिडटर्म चुनावों से पहले कीमतों को काबू में रखने के लिए अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीद रहा है. रणनीति में इस बदलाव को आप कैसे देखते हैं और इस तस्वीर को कैसे समझाएंगे?

मार्को रूबियो: दिलचस्प बात यह है कि यूक्रेन में जंग अब अपने पांचवें साल में पहुंच चुकी है. यह अपने आप में एक बड़ी समस्या है.

जो लोग हम पर दबाव बनाते हैं वे पूछते हैं कि हम और प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रहे हैं. लोग यह नहीं समझते कि प्रतिबंधों का एक असर होता है. ये प्रतिबंध सिर्फ रूस पर नहीं बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाले हर देश पर असर डालते हैं. ऐसे में हमेशा संतुलन बनाना पड़ता है. एक तरफ जंग में शामिल देशों पर समझौते के लिए दबाव बनाना होता है. दूसरी तरफ यह ध्यान रखना होता है कि इस दबाव का असर दूसरे देशों पर नकारात्मक न पड़े. यही वजह है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद राष्ट्रपति ने कांग्रेस के पारित बिल पर नेशनल सिक्योरिटी वेवर का इस्तेमाल किया.

इस बिल में रूस के साथ काम करने वाले देशों पर टैरिफ और प्रतिबंध बढ़ाने की बात कही गई थी. राष्ट्रपति ने इसे तुरंत लागू न करने का फैसला किया क्योंकि वे चीजों को समग्रता में देखते हैं. यूक्रेन और रूस के घटनाक्रम के साथ वैश्विक असर को संतुलित करना जरूरी होता है. उम्मीद है कि भारत के साथ ट्रेड डील से ये मसले हल हो जाएंगे. मैं समझता हूं कि यह तनाव मौजूद है और हमें इसे संतुलित करना होगा.



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