जयपुर. राजस्थान में पंचायती राज चुनाव को लेकर ग्रामीण इलाकों में जोरदार गहमागहमी है. साथ ही नामांकन की प्रक्रिया में सरपंच पद को लेकर मुकाबले की तस्वीर सामने आने लगी है. अब तक हुए नामांकन के आधार पर प्रत्येक ग्राम पंचायत में औसतन पांच दावेदार सामने आ रहे हैं. दो चरणों के लिए अब तक हुए नामांकन में सामने आया है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में सरपंच पद के लिए औसतन पांच दावेदार मैदान में उतर रहे हैं. इस लिहाज से प्रदेश की सभी 14,403 ग्राम पंचायतों का गणित देखें तो करीब 72 हजार दावेदार सरपंच बनने की दौड़ में हैं. खास बात यह है कि सरपंच को हर महीने 7,346 रुपये मानदेय मिलता है.
वहीं मनरेगा की बात की बात की जाए तो 30 दिन काम करने वाला मजदूर 8,280 रुपये तक कमा सकता है. इसके बावजूद गांवों की सरकार में अपनी जगह बनाने के लिए दावेदार लाखों रुपये खर्च करने को तैयार हैं. चुनाव प्रचार, जनसंपर्क और अन्य इंतजामों पर 5 लाख से 20 लाख रुपये तक खर्च होने का अनुमान है. ऐसे में सवाल है कि जब सरपंच का मानदेय मनरेगा मजदूर की महीनेभर की कमाई से भी कम है, तो आखिर इस पद को पाने के लिए इतना जुनून क्यों है?
14,403 पंचायतों में सरपंच बनने की होड़
सरपंच का मानदेय मनरेगा मजदूर से भी कम
सरपंच को हर महीने 7,346 रुपये मानदेय मिलता है. वहीं, मनरेगा मजदूर की दैनिक मजदूरी 276 रुपये के हिसाब से 30 दिन की कमाई 8,280 रुपये बैठती है. यानी सरपंच का मासिक मानदेय मनरेगा मजदूर की 30 दिन की मजदूरी से 933 रुपये कम है. पंचायत की बैठक में शामिल होने पर सरपंच को 276 रुपये प्रति बैठक भत्ता भी मिलता है. दूसरी ओर, चुनाव लड़ने वाले दावेदारों को प्रचार और जनसंपर्क पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ सकती है. कुछ दावेदारों के मुताबिक, चुनावी खर्च 5 लाख से 20 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. पूर्व सरपंच रामलाल का कहना है कि उन्हें पांच साल में मानदेय के रूप में करीब 4.40 लाख रुपये मिले, जबकि इस बार चुनाव में ही 5 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो गए हैं. इससे चुनावी खर्च और जनप्रतिनिधियों को मिलने वाले मानदेय के बीच का अंतर भी सामने आता है.
सरपंच संघ ने 30 से 35 हजार मानदेय की मांग उठाई
कम मानदेय के बावजूद चुनावी जुनून बरकरार
राजस्थान में सरपंच पद के लिए करीब 72 हजार दावेदारों का अनुमान इस चुनाव में ग्रामीण राजनीति की अहमियत को दर्शाता है. एक तरफ सरपंचों को मिलने वाला मानदेय सीमित है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव लड़ने में लाखों रुपये खर्च होने की संभावना है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग गांव की सरकार का नेतृत्व हासिल करना चाहते हैं. अब देखना होगा कि चुनावी मुकाबले में कौन-कौन से दावेदार बाजी मारते हैं और मानदेय बढ़ाने की मांग पर सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं.