दशहरे के बाद फिरोजाबाद में गूंजते हैं टेसू-झांझी के लोकगीत, वीर बर्बरीक और उनकी प्रेमिका की अनूठी कहानी से है नाता

दशहरे के बाद फिरोजाबाद में गूंजते हैं टेसू-झांझी के लोकगीत, वीर बर्बरीक और उनकी प्रेमिका की अनूठी कहानी से है नाता


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Tesu Jhanjhi Firozabad: दशहरे पर रावण दहन की राख ठंडी होते ही ब्रज और उसके आस-पास की गलियां लोकगीतों और बच्चों की खिलखिलाहट से गुलजार हो उठती हैं. तीन लकड़ियों के सहारे मिट्टी के सिर पर टिमटिमाता दीया केवल एक पारंपरिक खिलौना नहीं, बल्कि महाभारत के महाबली वीर बर्बरीक के अप्रतिम बलिदान और अमर प्रेम का जीवंत प्रतीक है. फिरोजाबाद की गलियों में आज भी जीवित यह सदियों पुरानी ‘टेसू-झांझी’ परंपरा न केवल हमारी सांस्कृतिक जड़ों की गवाही देती है, बल्कि आने वाले शुभ वैवाहिक सीजन के आगाज का शंखनाद भी करती है.

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Tesu Jhanjhi Firozabad: रावण दहन के बाद शुरू होने वाले टेसू-झांझी के खेल की जड़ें महाभारत काल में मिलती हैं. कथा के अनुसार भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक, जो आगे चलकर खाटू श्याम कहलाए, अत्यंत बलशाली थे. महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी शक्ति की परीक्षा ली और उनका शीश दान में मांग लिया.

कहा जाता है कि शीश कटने के बाद बर्बरीक ने अपनी अंतिम इच्छा जताई कि वह अपनी प्रेमिका झांझी से विवाह करना चाहते हैं. तब उनके कटे शीश को तीन लकड़ियों के सहारे ऊंचाई पर रखा गया ताकि वे पूरा युद्ध देख सकें. इसी प्रतीक के रूप में आज भी टेसू को तीन लकड़ियों पर मिट्टी का चेहरा लगाकर बनाया जाता है, जिसके ऊपर एक दीया रखा जाता है. यह केवल एक खिलौना नहीं, बल्कि बर्बरीक के बलिदान का प्रतीक है.

सात दिनों तक चलने वाला लोक उत्सव और घर-घर घूमती टोलियां
फिरोजाबाद के छारबाग़ में रहने वाली महिला बेबी ने लोकल 18 से बातचीत करते हुए बताया कि वह पिछले 10 साल से टेसू और झांझी को बना रही हैं. इसे बच्चे बड़े ही आनंद से खेलते हैं. इसकी मान्यता है कि रावण दहन की शाम से ही यह त्योहार शुरू हो जाता है और पूरे सात दिन तक चलता है. शाम ढलते ही बच्चों की टोलियां टेसू और झांझी को सजाकर घर-घर घूमने निकल पड़ती हैं.

टेसू को लड़के का प्रतीक और झांझी को लड़की के रूप में सजाया जाता है. बच्चे हर दरवाजे पर जाकर लोकगीत गाते हैं- ‘टेसू रे टेसू घंटा बजायो, टेसू की आई है बरात…’ और घर वाले उन्हें खुशी-खुशी पैसे, गेहूं, चावल और मिठाइयां देते हैं. इससे बच्चों में आपस में बांटने और सामूहिक उत्सव की भावना पैदा होती है.

प्रतीकात्मक विवाह, विसर्जन और स्थानीय मूर्तिकारों का रोजगार
सातवें दिन दोनों की प्रतीकात्मक शादी कराई जाती है, खूब गीत-बाजे होते हैं और अंत में टेसू-झांझी को यमुना जी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है. टेसू झांझी बनाने वाली महिला ने कहा कि वह इस सीजन पर 500 से 600 टेसू और झांझी बनाकर बेच लेती हैं. उनके यहां एक टेसू की कीमत 10 रुपये से शुरू होती है और 250 रुपये तक टेसू बिकता है. वहीं झांझी भी 30 रुपए से लेकर 100 रुपए तक रहती है.

वैवाहिक सीजन का आगाज और विलुप्त होती लोक-संस्कृति
वहीं उन्होंने कहा कि इस परंपरा का सामाजिक महत्व भी है. कहा जाता है कि टेसू और झांझी की शादी होने के बाद ही मनुष्यों की शादियों का शुभ मुहूर्त शुरू होता है. इसलिए दशहरा के बाद और दिवाली से पहले इस अनुष्ठान को जरूरी माना जाता है. यह एक तरह से शादियों के सीजन के आगाज का संकेत है. लेकिन आज के समय में यह लोक-संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर है. मोबाइल गेम और टीवी ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है. शहरों में टेसू-झांझी अब दिखाई नहीं देते. फिरोजाबाद और आसपास के ग्रामीण इलाकों में ही कुछ बच्चे इस परंपरा को बचाए हुए हैं. जरूरत है कि हम अपने बच्चों को इस सुंदर परंपरा से फिर से जोड़ें.



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