जहां कोइ नहीं पहुंचा उस मंगल के चंद्रमा से सैंपल लाएगा जापान, क्‍या है जापान का MMX म‍िशन?

जहां कोइ नहीं पहुंचा उस मंगल के चंद्रमा से सैंपल लाएगा जापान, क्‍या है जापान का MMX म‍िशन?


जापान ने मंगल ग्रह के चंद्रमा फोबोस की मिट्टी और चट्टानों के नमूने धरती पर लाने के लिए MMX यानी मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन मिशन लॉन्च किया है. अब तक दुनिया का कोई भी देश मंगल के चंद्रमा तक नहीं पहुंचा है. लेकिन जापान अपने इस म‍िशन के मंगल के दोनों चंद्रमाओं फोबोस और डीमोस तक पहुंचने की पहली कोशिश करने जा रहा है. जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) ने मंगलवार को दक्षिणी जापान के तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से अपने मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन (MMX) नाम के स्पेसक्राफ्ट को H3 रॉकेट पर लॉन्च किया.

JAXA के इस मिशन का लक्ष्य फोबोस की सतह से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी और चट्टानों के नमूने इकट्ठा करना है. इसके लिए अंतरिक्षयान मंगल तक पहुंचने के बाद फोबोस का अध्ययन करेगा और एक छोटे रोवर की मदद से नमूने जुटाने के लिए सही जगह तलाशेगा. इससे वैज्ञानिकों को ये समझने में मदद मिल सकती है कि ये चंद्रमा कैसे बने और लाल ग्रह के शुरुआती इतिहास के बारे में भी कुछ सुराग मिल सकते हैं.

JAXA ने आधिकारिक बयान में कहा है कि स्पेसक्राफ्ट को निर्धारित कक्षा में डाल दिया गया है. ये करीब चार टन का स्पेसक्राफ्ट मंगल सिस्टम तक पहुंचने से पहले 50 करोड़ से 60 करोड़ किलोमीटर का सफर तय करेगा. ये मंगल के दोनों चंद्रमाओं फोबोस और डीमोस का अध्ययन करेगा. फिर फोबोस से नमूने इकट्ठा करके धरती पर वापस लाएगा. वापसी वाला कैप्सूल 2031 में दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में उतरने वाला है.

MMX मिशन जापान के हयाबुसा और हयाबुसा2 मिशनों के अनुभव पर आधारित है. (Image- AP)

जापान मंगल के चंद्रमाओं पर क्‍या खोज रहा है?
जापान के इस मिशन का मुख्य मकसद फोबोस और डीमोस के बनने की पुरानी पहेली सुलझाना है. वैज्ञानिकों के पास दो मुख्य थ्योरी हैं. एक कहती है कि ये दोनों एस्टेरॉइड हैं जिन्हें मंगल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ने पकड़ लिया. दूसरी थ्योरी ये है कि अरबों साल पहले किसी बड़े पिंड के मंगल से टकराने के बाद उड़े मलबे से ये बने. चंद्रमाओं की सतह, उनकी बनावट और भूगर्भीय विशेषताओं का अध्ययन करके वैज्ञानिक ये पता लगाने की कोशिश करेंगे कि इनमें से कौन सी थ्योरी ज्यादा सही है.

MMX स्पेसक्राफ्ट अगस्त 2027 में मंगल सिस्टम तक पहुंचने वाला है. उसके बाद ये करीब तीन साल तक फोबोस और डीमोस को खास कक्षाओं से देखेगा. उनकी भौतिक खासियत और सतह की बनावट का डेटा इकट्ठा करेगा. साथ ही ये भी जांचेगा कि क्या मंगल का कोई पदार्थ फोबोस पर जमा हुआ है. क्योंकि ये चंद्रमा ग्रह के काफी करीब घूमता है, इसलिए मंगल पर होने वाले प्रभावों से उड़ा मलबा इसकी सतह पर बैठ गया हो सकता है. चंद्रमा की इस म‍िट्टी और चट्टान की स्‍टडी वैज्ञानिकों को मंगल के शुरुआती इतिहास और अरबों साल पहले वहां की परिस्थितियों के बारे में वो जानकारी दे सकता है, जो अभी तक इंसान के पास नहीं है.

MMX फोबोस से नमूने कैसे लेगा?
फोबोस से मिट्टी लेना इंजीनियरिंग के लिहाज से काफी मुश्किल काम है क्योंकि ये चंद्रमा छोटा है और इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति बहुत कमजोर है. फोबोस करीब 22 किलोमीटर चौड़ा है और इसकी खिंचाव धरती से काफी कम है. इसलिए स्पेसक्राफ्ट को सतह पर बहुत सावधानी से ऑपरेशन करना होगा ताकि वो बहक न जाए या सैंपलिंग प्रक्रिया बिगड़ न जाए. JAXA फोबोस पर एक या दो बार उतरने की योजना बना रहा है. वो दो अलग-अलग जगहों से कम से कम 10 ग्राम सतह की मिट्टी (रेगोलिथ) इकट्ठा करना चाहता है. स्पेसक्राफ्ट में ऐसे सैंपलिंग उपकरण होंगे जो सतह से और थोड़ा नीचे से भी म‍िट्टी को उठा सकें. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन नमूनों में चंद्रमा की बनावट और बनने की प्रक्रिया की वो जानकारी सुरक्षित रहेगी जो सिर्फ दूर से देखने से नहीं मिल पाती. ये संभावना कि फोबोस में मंगल से उड़ा हुआ पदार्थ भी हो सकता है, मिशन को खास बनाती है. शोधकर्ता वापस लाए गए नमूनों में मंगल के पदार्थों के निशान ढूंढेंगे. इससे ग्रह के प्राचीन वातावरण के बारे में और जानकारी मिल सकती है.

नासा और यूरोप भी जापान के मिशन में शामिल
जापान के इस मिशन में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) समेत कई अंतरराष्ट्रीय साझेदार शामिल हैं. नासा ने एक गैस-सैंपलिंग उपकरण और गामा-रे व न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर दिया है. इससे वैज्ञानिक फोबोस की सतह की बनावट का अध्ययन कर सकेंगे.
फ्रांस की नेशनल सेंटर फॉर स्पेस स्टडीज (CNES) और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (DLR) ने IDEFIX नाम का एक छोटा रोवर बनाया है. ये करीब 30 किलोग्राम का है. 2029 में इसे फोबोस पर उतारा जाएगा ताकि स्पेसक्राफ्ट के सैंपलिंग ऑपरेशन से पहले वहां की जमीन और सतह की खासियतों की जांच की जा सके.

जापान के पिछले एस्टेरॉइड मिशनों का अनुभव
MMX मिशन जापान के हयाबुसा और हयाबुसा2 मिशनों के अनुभव पर आधारित है. इन दोनों ने 2010 और 2020 में एस्टेरॉइड से नमूने धरती पर वापस लाए थे. लेकिन मंगल सिस्टम तक जाना और उसके किसी चंद्रमा से पदार्थ वापस लाना अलग तरह की चुनौतियां सामने रखता है. जैसे दूसरे ग्रह के आसपास काम करना, कम गुरुत्वाकर्षण वाली सतह पर उतरना और नमूनों को सुरक्षित धरती पर वापस लाना.

अगर ये मिशन सफल रहा तो MMX वैज्ञानिकों को फोबोस से सीधे इकट्ठा किए गए पहले नमूने देगा. ये पदार्थ मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति के सवाल सुलझाने और मंगल सिस्टम के विकास पर रोशनी डालने में मदद कर सकते हैं. नमूनों को लेकर अंतरिक्ष यान के 2031 तक धरती पर लौटने की उम्मीद है. लैंडिंग दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के वूमेरा इलाके में होनी है. इन नमूनों से मंगल के इतिहास और सौरमंडल के शुरुआती दौर को समझने में मदद मिल सकती है.



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