नई दिल्ली/पटना. आरजेडी के बक्सर सांसद सुधाकर सिंह ने बिहार के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से भेजे गए मानहानि के कानूनी नोटिस को लेकर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा है. सुधाकर सिंह ने स्पीकर से मामले का संज्ञान लेकर जांच कराने और जरूरत पड़ने पर इसे विशेषाधिकार समिति के पास भेजने की मांग की है.
सुधाकर सिंह के मुताबिक, कुंदन कृष्णन ने अपने निजी अधिवक्ता के माध्यम से उन्हें कानूनी नोटिस भेजकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है. साथ ही नोटिस में पांच करोड़ रुपये के मानहानि वाद और आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है. सांसद का कहना है कि नोटिस भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी की संदिग्ध मौत और कथित फर्जी मुठभेड़ को लेकर उनके द्वारा उठाए गए सवालों के संबंध में भेजा गया है.
सुधाकर सिंह ने पत्र में क्या लिखा?
लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में सुधाकर सिंह ने कहा है कि इस मामले में संबंधित पुलिसकर्मियों का निलंबन हुआ है और मृतक की मां की शिकायत पर प्राथमिकी भी दर्ज की गई है. उनके अनुसार, राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के लिए समिति गठित की है, लेकिन जांच के निष्कर्ष अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं. सांसद ने कहा कि जब जांच लंबित है, तब घटना की वास्तविक परिस्थितियों, तत्कालीन पुलिस कमान और निर्णय लेने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाना जनहित से जुड़ा विषय है. उन्होंने कहा कि जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी को स्वतः दोषमुक्त मान लेना उचित नहीं होगा.
कुंदन कृष्णन की भूमिका पर उठाए सवाल
सुधाकर सिंह ने पत्र में कहा है कि घटना के समय कुंदन कृष्णन बिहार एसटीएफ के महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे. इसलिए उन्होंने मांग की है कि जांच सिर्फ निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित न रहे, बल्कि आदेश देने की प्रक्रिया, अधिकारियों के बीच संवाद, पुलिस मुख्यालय को मिली जानकारी और तत्कालीन नेतृत्व की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच हो. आरजेडी सांसद ने अपने संसदीय दायित्वों का हवाला देते हुए कहा कि कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना विधायिका की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 75(3), 164(2) और 105 का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासनिक कार्रवाई और संभावित सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल उठाने का अधिकार है.
‘नोटिस का उद्देश्य मुझे डराना तो नहीं?’
सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया कि मानहानि का नोटिस उन्हें इस मामले को संसद में उठाने और अपने संसदीय दायित्वों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करने से रोकने का प्रयास हो सकता है. उन्होंने कहा कि यदि वरिष्ठ प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी जनप्रतिनिधियों को बड़े आर्थिक दावों और आपराधिक कार्रवाई की चेतावनियों के जरिए भयभीत करने लगें, तो इसका असर लोकतांत्रिक निगरानी और सार्वजनिक विमर्श पर पड़ेगा. उन्होंने अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 17 का भी हवाला दिया है. सांसद ने स्पीकर से यह स्पष्ट कराने की मांग की है कि कुंदन कृष्णन ने किस हैसियत से नोटिस भेजा और क्या इसके लिए बिहार या केंद्र सरकार से किसी तरह की अनुमति ली गई थी.
निजी विधि फर्म की भूमिका पर भी सवाल
सुधाकर सिंह ने नोटिस में इस्तेमाल की गई निजी विधि फर्म की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया है. उनका कहना है कि नोटिस में बिहार सरकार की ओर से उठाए गए कदमों और सरकारी कार्रवाई का जिस तरह बचाव किया गया है, उससे यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित विधि फर्म केवल कुंदन कृष्णन का निजी प्रतिनिधित्व कर रही थी या उसे बिहार सरकार का अधिकृत पक्ष रखने की अनुमति भी थी. उन्होंने लोकसभा स्पीकर से बिहार सरकार से इस संबंध में जानकारी मंगाने की मांग की है.
स्पीकर से की 5 मांगें
सुधाकर सिंह ने स्पीकर से इस पूरे मामले की जांच कराने, प्रथमदृष्टया आधार मिलने पर इसे विशेषाधिकार समिति को भेजने और बिहार सरकार से नोटिस भेजने के लिए ली गई अनुमति की जानकारी मांगने का आग्रह किया है. इसके अलावा उन्होंने निजी विधि फर्म को बिहार सरकार का पक्ष रखने की अनुमति दिए जाने संबंधी आदेश और उसका दायरा स्पष्ट कराने की मांग की है. उन्होंने न्यायिक जांच की वर्तमान स्थिति और उसके निष्कर्षों की जानकारी उपलब्ध कराने तथा सांसदों के संसदीय दायित्वों के निर्वहन में किसी भी तरह के दबाव या प्रतिशोध की स्थिति में सदन की गरिमा और सदस्यों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उचित कदम उठाने का अनुरोध किया है.