नवरात्रि का पर्व आते ही माता रानी के मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगती है। मध्य प्रदेश के खंडवा में भी एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसका संबंध रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है. यह मंदिर है मां तुलजा भवानी का धाम, जहां नवरात्रि के दिनों में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि 14 साल के वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण खांडव वन आए थे और इसी दौरान उन्होंने मां तुलजा भवानी की आराधना की थी। मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं आज भी भक्तों के बीच प्रचलित हैं. यहां माता के दर्शन करने के साथ एक ऐसी परंपरा भी है, जिसे देखने के लिए श्रद्धालु खास तौर पर उत्सुक रहते हैं। मंदिर की दीवार पर सिक्का चिपकाने की कोशिश की जाती है. मान्यता है कि जिसका सिक्का चिपक जाता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। हालांकि, यह श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी परंपरा है.
रामायण काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
खंडवा का मां तुलजा भवानी मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है. मंदिर को लेकर प्रचलित मान्यता है कि भगवान श्रीराम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ खांडव वन पहुंचे थे. उस समय इस क्षेत्र को खांडव वन के नाम से जाना जाता था। मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने यहां नौ दिनों तक मां तुलजा भवानी की आराधना की थी. इसके बाद माता से अस्त्र-शस्त्र का वरदान लेकर वे दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़े थे. इसी धार्मिक मान्यता के कारण मंदिर का महत्व श्रद्धालुओं के बीच और बढ़ जाता है.नवरात्रि के दौरान यहां आने वाले भक्त माता के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं.
मां की स्वयंभू प्रतिमा और तीन रूपों की मान्यता
मंदिर की सबसे खास बात यहां विराजित मां भवानी की प्रतिमा को लेकर है। मान्यता है कि गर्भगृह में स्थापित माता की प्रतिमा स्वयंभू है और इसे रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है. माता यहां सिद्धिदात्री स्वरूप में अष्टभुजी रूप में विराजमान हैं. प्रतिमा में माता सिंह पर सवार होकर राक्षसों का वध करती दिखाई देती हैं। श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि माता की प्रतिमा सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है. सुबह बाल्यावस्था, दोपहर में युवावस्था और शाम को वृद्धावस्था के रूप में माता के दर्शन होने की बात कही जाती है। भक्त इस मान्यता को माता की दिव्य महिमा से जोड़कर देखते हैं और श्रद्धा के साथ उनके दर्शन करते हैं.
मंदिर की दीवार पर सिक्का चिपकाने की अनोखी परंपरा
मां तुलजा भवानी मंदिर में दर्शन के साथ सिक्का चिपकाने की परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रचलित है. मंदिर के पीछे माता की पीठ की ओर एक दीवार है, जहां भक्त सिक्का चिपकाने की कोशिश करते हैं. मान्यता है कि जिस श्रद्धालु का सिक्का दीवार पर चिपक जाता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। हालांकि, हर किसी का सिक्का नहीं चिपकता। कुछ लोगों का सिक्का दीवार पर टिक जाता है, जबकि कई श्रद्धालु कोशिश करने के बाद भी ऐसा नहीं कर पाते। भक्त इसे माता की कृपा और अपनी आस्था से जोड़कर देखते हैं. इस परंपरा को लेकर लोगों में उत्सुकता रहती है और मंदिर आने वाले कई श्रद्धालु इसे आजमाते भी हैं. यह मान्यता धार्मिक विश्वास का हिस्सा है, इसे मनोकामना पूरी होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
मंदिर में चांदी की नक्काशी और विशाल दीपशिखा
मां तुलजा भवानी मंदिर के गर्भगृह में चांदी की सजावट भी श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती है। मंदिर की दीवारों पर चांदी की नक्काशी की गई है, जो इसकी सुंदरता को बढ़ाती है. माता के सिर पर चांदी और मीनाकारी से सजा मुकुट सुशोभित है, वहीं देवी के ऊपर चांदी का छत्र भी लगाया गया है. मंदिर परिसर में विशाल दीपशिखा बनी हुई है। नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं. दीपों की रोशनी और माता के जयकारों से मंदिर परिसर का माहौल भक्तिमय हो जाता है. नवरात्रि में यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन करने के साथ मंदिर की सजावट और धार्मिक परंपराओं को भी करीब से देखते हैं.
महाभारत और छत्रपति शिवाजी से भी जुड़ी हैं मान्यताएं
मां तुलजा भवानी मंदिर को लेकर केवल रामायण काल की ही मान्यता प्रचलित नहीं है, बल्कि महाभारत और मराठा इतिहास से जुड़ी कथाएं भी सुनने को मिलती हैं. स्थानीय धार्मिक परंपराओं में कहा जाता है कि महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का इस क्षेत्र से संबंध रहा था। वहीं, मराठा शासक छत्रपति शिवाजी मां भवानी को अपनी आराध्य देवी मानते थे। प्रचलित किंवदंती के अनुसार, माता भवानी ने शिवाजी को तलवार प्रदान की थी. इन कथाओं का उल्लेख श्रद्धालु मंदिर की धार्मिक महत्ता बताते हुए करते हैं. हालांकि, इन प्रसंगों को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्यों के बजाय धार्मिक मान्यताओं और किंवदंतियों के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
नवरात्रि में दूर-दूर से दर्शन करने पहुंचते हैं भक्त
मां तुलजा भवानी का मंदिर खंडवा और पूरे निमाड़ क्षेत्र के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। लोग माता के दर्शन कर परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। मंदिर में नवरात्रि के अलावा रामनवमी, महाशिवरात्रि, मकर संक्रांति, होली और दुर्गा पूजा जैसे पर्व भी श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं.खंडवा का यह प्राचीन मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, चांदी की सजावट, विशाल दीपशिखा और सिक्का चिपकाने की परंपरा के कारण खास पहचान रखता है। रामायण काल से जुड़ी मान्यता इसे भक्तों के लिए और भी खास बनाती है। नवरात्रि में यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए माता के दर्शन के साथ मंदिर के इतिहास और परंपराओं को जानना भी एक अलग अनुभव होता है.