राजस्थान के सिरोही में है देवी के अनोखे रूप, जानें गुफा और चमत्कारों की कहानी
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Sirohi Famous Ancient Temples: अरावली की प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा सिरोही जिला धार्मिक आस्था, प्राचीन मंदिरों और रहस्यमयी लोककथाओं का अनूठा संगम है. यहां आरासना अंबा माता, मातर माता, भद्रकाली और मुखरी माता के मंदिर श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखते हैं. आरासना मंदिर में पारंपरिक प्रतिमा के बजाय नाभिकमल रूपी चक्र की पूजा की मान्यता है. मातर माता मंदिर को देवड़ा राजवंश की वंशवृद्धि से जुड़ी आस्था के लिए जाना जाता है. उमरनी के भद्रकाली मंदिर में मां की दो शेरों पर सवार प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है. वहीं, मुखरी माता मंदिर की पहाड़ी में बनी संकरी गुफा को लेकर मान्यता है कि इसका दूसरा छोर माउंट आबू के अधर देवी मंदिर के पास निकलता है. ये धार्मिक स्थल सिरोही की सांस्कृतिक विरासत और लोकविश्वासों की झलक दिखाते हैं.
अरावली की पहाड़ियों और प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसे सिरोही जिले की पहचान यहां स्थित प्राचीन धार्मिक स्थलों से भी है. जिले में पिंडवाड़ा के पास स्थित आरासना अंबा माता मंदिर और गुजरात सीमा पर स्थित विश्वप्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी धाम के बीच गहरा नाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दोनों धामों में मां अंबा के नाभिकमल स्वरूप की पूजा की जाती है. इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार के अनुसार आरासना मंदिर की खास बात यह है कि यहां पारंपरिक मूर्ति के बजाय देवी के नाभिकमल रूपी चक्र की आराधना होती है. मान्यता है कि आरासुर नामक नरभक्षी राक्षस का वध करने के कारण मां को आरासुरी देवी कहा गया.
स्थानीय भक्तों के मुताबिक गुजरात के दांता रियासत के राजा मां के अनन्य भक्त थे और उन्होंने देवी से अपने राज्य में पधारने की प्रार्थना की. मां ने शर्त रखी कि यात्रा के दौरान राजा पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे, लेकिन दांता की सीमा पर पहुंचते ही राजा ने पीछे देख लिया और देवी वहीं ठहर गई. इसके बाद उस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया, जो आज दांता अंबाजी के नाम से प्रसिद्ध है. इस मान्यता के चलते आरासना और अंबाजी दोनों धामों को एक ही शक्ति के दो प्रमुख आस्था केंद्र माना जाता है.
सिरोही के सिरणवा पर्वत पर स्थित प्राचीन मातर माता मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 1000 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है. मान्यता है कि मातर माता, आबूराज की अधिष्ठात्री अर्बुदा देवी का ही स्वरूप है. भक्तों के अनुसार वर्ष 1206 में जालोर से निर्वासित शासक मानिक्यराय ने बरलूट को राजधानी बनाकर अपने राज्य की स्थापना की थी. नि:संतान मानिक्यराय को मातर माता के आशीर्वाद से पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसके बाद देवड़ा राजवंश को राज्य की स्थिरता और वंश वृद्धि का वरदान मिलने की मान्यता प्रचलित हुई.
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जिले के आबूरोड शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर उमरनी गांव में अरावली की पहाड़ियों के बीच बना प्राचीन भद्रकाली मंदिर भक्तों में आस्था का केंद्र है. यह एक मात्र मंदिर है ,जहां मां काली दो शेरों पर सवार है. इस मंदिर का इतिहास करीब 8 हजार वर्ष पुराना है. यहां तपस्वी राजा अम्बरीष ने कड़ी तपस्या की थी. तब मां ने कल्याणी रूप में दो दर्शन दिए थे. राजा अम्बरीष ने माता से इसी स्वरूप में यहां विराजमान होने की प्रार्थना की थी. तब से यहां अब तक 3 बार मंदिरों का निर्माण हो चुका है.
आबूराज के मुख पर प्राचीन मुख्य माता मंदिर क्षेत्र में आस्था का केंद्र है. यहां करीब 21 किलोमीटर लंबी गुफा मंदिर के अंदर है. पहाड़ी में बनी गुफा में प्राकृतिक मंदिर विराजमान मुखरी माता को लेकर मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से भक्तों के दुख दूर हो जाते है. यहां एक मोर-मोरनी के जोड़े को लेकर भी कथा प्रसिद्ध है. इस कथा के अनुसार मोर मोरनी के जोड़े ने मंदिर परिसर में जप-तप कर अपने शरीर को एक साथ त्यागा था. उसके बाद यहां उन्हें समाधि देकर उनका मंदिर बनवाया गया था.
मंदिर में बनी ये गुफा काफी संकरी है. इस वजह से सुरक्षा कारणों से इस पर द्वार लगाकर बंद किया हुआ है. माना जाता है कि इस गुफा का दूसरा छोर माउंट आबू में अधर देवी मंदिर के पास निकलता है. माउंट आबू घूमने आने वाले पर्यटक इस शक्ति मंदिर के दर्शन जरूर करते हैं. वहीं नवरात्रि पर यहां खास आयोजन होते हैं, जिसमें आसपास के कई गांवों के भक्त भाग लेते हैं.