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पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (केपीके) प्रांत में हालात बहुत खराब हो चुके हैं. वहां इमरजेंसी लगाकर सरकार ने सीधे अपने हाथ में कंट्रोल ले लिया है, जिससे नया राजनीतिक बखेड़ा खड़ा हो गया है. पाकिस्तान ने बरसों से आतंकवादियों को पाला-पोसा है और उन्हें ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ आतंकवादियों में बांटा है. इसी पुरानी गलती की वजह से आज पाकिस्तान खुद अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फंस गया है. केपीके के 12 जिलों में सेना और बिना चुने हुए लोगों का दखल बहुत बढ़ गया है. हालत यह है कि विपक्षी नेताओं पर सख्ती की जा रही है, मीडिया की आवाज दबाई जा रही है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस सख्ती और जुल्म से आतंकवाद खत्म हो पाएगा, या फिर इससे आम जनता का गुस्सा और ज्यादा भड़केगा?
इमरजेंसी, सियासत और आतंकवाद का चक्रव्यूह ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में हालात को फिर सुलगा दिया है. (Image: AI)
Pakistan News: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा यानी KPK प्रांत में सुरक्षा हालात को संभालने में नाकामी के बाद सरकार के कदमों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. पाकिस्तान ने आतंकवाद से निपटने के बजाय इमरजेंसी और गवर्नर रूल के जरिए चुनी हुई सरकार और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया है.
पाकिस्तान में आतंकवाद की समस्या को उसकी दशकों पुरानी नीतियों से जोड़कर देखा जा रहा है. पाकिस्तान ने करीब पांच दशक पहले रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल करने की नीति अपनाई. लेकिन बाद में यही संगठन पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गए.
अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी एक बार पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए कहा था कि अपने घर के पीछे सांप पालकर यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे सिर्फ पड़ोसियों को ही काटेंगे. यानी आतंकवाद को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाला देश एक दिन खुद भी उसका शिकार बन सकता है.
पाकिस्तान ने नहीं लिया सबक
- पाकिस्तान ने इससे सबक लेने के बजाय आतंकवादियों को अच्छे और बुरे आतंकवादियों में बांटना जारी रखा. इसी का नतीजा है कि आज उसे अपने ही इलाकों में आतंकी संगठनों की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
- पूर्व सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल के दौरान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी के लड़ाकों को पूर्ववर्ती फाटा और खैबर पख्तूनख्वा के इलाकों में दोबारा बसाने की कोशिशें भी सवालों के घेरे में रही हैं.
- अब केपीके में हालात बिगड़ने के बीच इमरजेंसी लगाने और संघीय सरकार का सीधा नियंत्रण बढ़ाने के फैसले को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है.
- पाकिस्तान ने पहले एक पूर्व प्रधानमंत्री को जेल में डाला, फिर संवैधानिक संशोधनों के जरिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर किया और अब विपक्ष के कब्जे वाली प्रांतीय सरकार को भी निशाना बनाया है.
- इस फैसले से KPK के स्थानीय समुदायों की मुश्किलें और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. इन इलाकों के लोग पहले भी आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्थापन और नागरिकों की मौतों का सामना कर चुके हैं.
- जर्ब-ए-अज्ब और रद्द-उल-फसाद जैसे सैन्य अभियानों के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी सामने आए थे. अब एक बार फिर बड़े पैमाने पर सुरक्षा कार्रवाई की आशंका ने चिंता बढ़ा दी है.
कार्रवाई के बहाने सेना को दे दी छूट
आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सेना और गैर-निर्वाचित संस्थाओं के हाथों में ज्यादा अधिकार दिए जा रहे हैं. केपीके के 12 जिलों में इमरजेंसी और सीधे संघीय नियंत्रण की व्यवस्था को इसी दिशा में उठाए गए कदम के तौर पर देखा जा रहा है. इन जिलों में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन को कमजोर किया गया है. इस बीच, विपक्षी नेताओं और विधायकों की हिरासत, उनके घरों पर छापे और राजनीतिक प्रदर्शनों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. प्रदर्शनकारियों पर पुलिस फायरिंग, आंसू गैस और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के आरोप लगे हैं. कानून-व्यवस्था बहाल करने के नाम पर सरकार अपने ही नागरिकों के खिलाफ सख्ती कर रही है.
केपीके में घटनाओं की रिपोर्टिंग पर मीडिया प्रतिबंधों के आरोपों ने भी चिंता बढ़ाई है. इससे सुरक्षा कार्रवाई के दौरान वास्तव में क्या हो रहा है, इसकी स्वतंत्र जानकारी सामने आने में मुश्किल पैदा हो सकती है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इमरजेंसी और सेना के बढ़ते दखल से पाकिस्तान में आतंकवाद पर काबू पाया जा सकेगा, या इससे स्थानीय लोगों में असंतोष और बढ़ेगा?