बागेश्वर: उत्तराखंड के पहाड़ों में सुबह की शुरुआत चाय की चुस्की के बिना अधूरी मानी जाती है. गांव हो या शहर, घर हो या दुकान, सुबह उठते ही कई लोगों को सबसे पहले चाय की याद आती है. पहाड़ी जीवन में चाय केवल एक पेय नहीं, बल्कि दिनचर्या, मेल-मिलाप और मेहमाननवाजी का अहम हिस्सा बन चुकी है. पहाड़ में चाय को कई लोग ताजगी देने वाला पेय तो कुछ लोग थकान दूर करने का साथी मानते हैं.
कहां से आयी चाय पीने की परंपरा
चाय पीने की परंपरा का इतिहास चीन से जुड़ा माना जाता है. समय के साथ चाय दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंची और भारत में भी लोकप्रिय हो गई. अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में चाय की खेती का विस्तार हुआ. असम और दार्जिलिंग जैसे क्षेत्रों में चाय उत्पादन बढ़ने के बाद यह धीरे-धीरे आम लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगी. उत्तराखंड में भी चाय ने घर-घर में अपनी जगह बनाई है. आज पहाड़ के छोटे गांवों से लेकर बाजारों तक चाय की दुकानें लोगों के मिलने-जुलने का प्रमुख ठिकाना हैं.
खेती-बाड़ी और मेहनत के बीच चाय का सहारा
बागेश्वर जैसे पर्वतीय जिलों में बड़ी संख्या में लोग खेती-बाड़ी, पशुपालन और दूसरे मेहनत भरे कामों से जुड़े हैं. सुबह जल्दी उठकर खेतों में जाना, पशुओं के लिए चारा जुटाना और पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलना यहां की दिनचर्या का हिस्सा है. ऐसे में गर्म चाय पीने से लोगों को ताजगी और गर्माहट का एहसास होता है. चाय में मौजूद कैफीन कुछ समय के लिए सतर्कता बढ़ा सकता है.
पहाड़ों में मौसम के अनुसार चाय बनाने का तरीका भी बदलता रहता है. सर्दियों में कई घरों में अदरक, तुलसी और काली मिर्च डालकर चाय बनाई जाती है. इसकी गर्माहट और खुशबू लोगों को खूब पसंद आती है. कई लोग इसे सर्दी-जुकाम में राहत देने वाला घरेलू नुस्खा भी मानते हैं.
मेहमाननवाजी की पहचान है चाय
उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में कोई रिश्तेदार, परिचित या मेहमान घर पहुंचता है, तो उससे अक्सर सबसे पहले चाय पीने के लिए पूछा जाता है. घर में उपलब्ध सामग्री के अनुसार चाय के साथ बिस्कुट, रोटी या स्थानीय पकवान भी परोसे जाते हैं. कई जगह चाय की चुस्की के साथ गांव की खबरें, खेती-बाड़ी, परिवार और सामाजिक मुद्दों पर बातचीत होती है. इस तरह चाय लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का माध्यम बनती है.
बदलते समय के साथ पहाड़ों में चाय के स्वाद और तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसका सामाजिक महत्व आज भी बना हुआ है. गांव की चौपाल हो, बाजार की दुकान या घर का आंगन, चाय लोगों के बीच बातचीत शुरू करने का आसान बहाना है. उत्तराखंड के पहाड़ों में चाय सिर्फ सुबह की आदत नहीं, बल्कि जीवनशैली, अपनापन और स्थानीय संस्कृति का मुख्य हिस्सा है.