दिल से दिल जोड़ने और द्वेष मिटाने का संदेश देती है सोन पत्ती! छत्तीसगढ़ में दशहरे पर बांटने की अनूठी परंपरा

दिल से दिल जोड़ने और द्वेष मिटाने का संदेश देती है सोन पत्ती! छत्तीसगढ़ में दशहरे पर बांटने की अनूठी परंपरा


बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में दशहरा केवल रावण दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भाईचारे और आपसी सद्भाव का संदेश देने वाला उत्सव भी है. यहां दशहरे के दिन एक-दूसरे को सोन पत्ती भेंट करने की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है. सोन पत्ती यानी बौहिनिया रेसिमोसा (Bauhinia racemosa) के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप से सोना माना जाता है. रावण दहन के बाद लोग अपने इष्ट-मित्रों, रिश्तेदारों, गांव के लोगों और घर के बड़े-बुजुर्गों को सोन पत्ती भेंट कर शुभकामनाएं देते हैं. इस परंपरा के पीछे राजा-महाराजाओं के समय की कथाएं, विजय का प्रतीक और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने की भावना जुड़ी हुई है. मान्यता है कि सोन पत्ती बांटने का अर्थ केवल एक पत्ता देना नहीं, बल्कि आपसी द्वेष मिटाकर प्रेम और सद्भाव के साथ जीवन बिताने का संकल्प लेना है.

छत्तीसगढ़ में सोन पत्ती बांटने की परंपरा को लगभग 300 से 400 साल पुराना बताया जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मल्हार के राजा रत्नदेव के समय से इस परंपरा का विशेष महत्व रहा है. कहा जाता है कि दशहरे के अवसर पर सेना अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करती थी. युद्ध में विजय प्राप्त कर राज्य लौटने पर सैनिक सोन पत्ती लेकर आते थे और उसे लोगों के बीच बांटते थे. समय के साथ यह परंपरा आम जनजीवन का हिस्सा बन गई और आज भी दशहरे के दिन लोग इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं.

राजा रघु और कुबेर से जुड़ी है सोने की वर्षा की मान्यता
सोन पत्ती की परंपरा के पीछे एक प्राचीन धार्मिक कथा भी प्रचलित है. मान्यता के अनुसार, राजा रघु और कुबेर से जुड़ी कथा में सोने की वर्षा का उल्लेख मिलता है. इसी कथा को सोन पत्ती बांटने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. स्थानीय स्तर पर यह मान्यता भी प्रचलित है कि मल्हार में कभी सोने की वर्षा हुई थी. हालांकि, ये प्रसंग ऐतिहासिक तथ्यों से अधिक लोक मान्यताओं और धार्मिक कथाओं के रूप में प्रचलित हैं.

रावण दहन के बाद सोन पत्ती अर्पित कर मनाते हैं विजय का उत्सव
दशहरे के दिन रावण दहन के बाद सोन पत्ती बांटने की परंपरा का विशेष महत्व होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पेड़ से सोना पत्ती तोड़कर सबसे पहले रावण को प्रतीकात्मक रूप से अर्पित करते हैं. इसके पीछे यह संदेश माना जाता है कि अहंकार और बुराई का अंत निश्चित है. इसके बाद लोग घर लौटकर अपने परिवार, इष्ट-मित्रों और गांव के लोगों को सोन पत्ती भेंट करते हैं. इसे विजय, शुभकामना और आपसी प्रेम का प्रतीक माना जाता है.

घर की महिलाएं तिलक लगाकर स्वागत करती हैं, बदले में दी जाती है सोन पत्ती
दशहरे के दिन रावण दहन के बाद घर लौटने पर परिवार की महिलाएं, माताएं और बहनें दही-चंदन से तिलक लगाकर आरती उतारती हैं. इसके बाद परिवार के सदस्य उन्हें सोन पत्ती भेंट करते हैं. इस तरह यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच सम्मान, स्नेह और अपनापन बढ़ाने का माध्यम बनती है. बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर सोन पत्ती बांटना शुभ माना जाता है.

दिल से दिल जोड़ने और द्वेष मिटाने का संदेश देती है सोन पत्ती
सोन पत्ती की सबसे बड़ी विशेषता इसका सामाजिक संदेश है. इसे एक-दूसरे को भेंट करने का अर्थ है. पुरानी नाराजगी और मनमुटाव को भुलाकर नए सिरे से रिश्तों की शुरुआत करना. यह परंपरा लोगों को प्रेमपूर्वक रहने, आपसी मतभेद दूर करने और सामाजिक एकता बनाए रखने की प्रेरणा देती है. सोन पत्ती के पत्ते के आकार को भी प्रतीकात्मक रूप से दिल से जोड़कर देखा जाता है. इस तरह दशहरे पर सोना पत्ती बांटना दिलों को जोड़ने और समाज में सद्भाव बनाए रखने का संदेश देता है.

औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है सोन पत्ती का पेड़
सोन पत्ती के पेड़ को केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि इसके पारंपरिक औषधीय उपयोगों के लिए भी जाना जाता है. इसका वानस्पतिक नाम Bauhinia racemosa है. आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इस पौधे के विभिन्न हिस्सों का उपयोग किया जाता रहा है. हालांकि, किसी भी बीमारी के उपचार के लिए इसका इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए.



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