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Rishikesh Durga Puja : ऋषिकेश के तपोवन में होने वाली दुर्गा पूजा की अपनी अलग पहचान है. बंगाल से पंडित और मूर्तिकार बुलाए जाते हैं. मां की प्रतिमा तैयार करने से लेकर पूजा की विधि तक में बंगाली परंपराओं की छाप दिखती है. लोकल 18 से तपोवन दुर्गा पूजा समिति के सचिव शंकर कुमार राय बताते हैं कि यहां पहला पंडाल 1989 में लगा था. पूजा की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं. पंडाल सजाने से लेकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने तक, हर काम अलग तरह से होता है.
ऋषिकेश. उत्तराखंड के ऋषिकेश में नवरात्रि के दौरान कई जगहों पर मां दुर्गा के पंडाल सजाए जाते हैं, लेकिन लक्ष्मण झूला के तपोवन की पूजा की अपनी अलग पहचान है. यहां मां दुर्गा की आराधना बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार की जाती है. पूजा की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं. पंडाल को सजाने से लेकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने तक, हर काम में खास ध्यान दिया जाता है. इस आयोजन को अलग बनाने के लिए बंगाल से पंडित और मूर्तिकार ऋषिकेश आते हैं. मां की प्रतिमा तैयार करने से लेकर पूजा की विधि तक में बंगाल की परंपराओं की झलक देखने को मिलती है. लोकल 18 से श्री दुर्गा पूजा समिति के सचिव शंकर कुमार राय बताते हैं कि लक्ष्मण झूला के तपोवन में स्थित इस पंडाल में इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का 38वां वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा है. इसकी शुरुआत 1989 में हुई थी.
शंकर राय कहते हैं कि इस पंडाल की सबसे बड़ी खासियत यहां की पूजा और अनुष्ठान का पूरी तरह से पश्चिम बंगाल की पद्धति पर आधारित होना. यहां मूर्तिकार, पंडित और आयोजक भी बंगाल से आते हैं. मां दुर्गा की मूर्ति को पारंपरिक रूप में तैयार किया जाता है, जिसमें मां के साथ महिषासुर और दूसरे देवी-देवताओं की आकृतियां भी देखने को मिलती हैं. इस प्रतिमा को तैयार करने के लिए बंगाल से मूर्तिकार बुलाए गए हैं.
40 मिनट सबसे अलग
शंकर राय बताते हैं कि इस आयोजन में उत्तराखंड-गढ़वाल और बंगाली समुदाय के लोग मिलकर हिस्सा लेते हैं. यहां षष्ठी से लेकर दशमी तक यानी कुल पांच-छह दिनों तक विशेष कार्यक्रम चलते हैं, जिनमें अष्टमी और नवमी के दिन होने वाली विशेष पूजाओं का बहुत अधिक महत्व है. अष्टमी की समाप्ति और नवमी के आरंभ के बीच के 40 मिनटों में ‘संधि पूजा’ की जाती है, जो उस समय की याद दिलाती है जब मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था. इसके बाद, दशमी के दिन सिंदूर खेला के साथ माता की विदाई की जाती है. उन्हें मायके से विदा कर गंगा जी में विसर्जित किया जाता है.