Allahabad High Court News | Allahabad High Court Hindi इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादीशुदा हैं तो क्या हुआ, बेटी को भी मिल सकती है अनुकंपा नौकरी


Last Updated:

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादीशुदा बेटियों के अनुकंपा पर नौकरी को लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने सहारनपुर के बीएसए के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें शादी का हवाला देकर मनीषा त्यागी का दावा खारिज किया गया था.

Top Deals Inside

इलाहाबाद HC का फैसला, शादीशुदा हैं तो क्या हुआ बेटी को भी मिलेगी अनुकंपा नौकरीZoom

अनुकंपा पर नौकरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला. (फाइल फोटो)

Allahabad High Court On Compassionate Appointment: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुकंपा पर नौकरी को लेकर बड़ा फैसला सुनावाया है. कोर्ट के इस फैसले ने सैकड़ों-हजारों बेटियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है. फैसले में कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी बेटी को केवल उसके शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली सरकारी नौकरी से वंचित या अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. दरअसल, कोर्ट सहारनपुर की रहने वाली मनीषा त्यागी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. कोर्ट ने अपने फैसले में बेसिक शिक्षा अधिकारी के फैसले को निरस्त कर दिया है.

मनीषा के पिता धर्मवीर सिंह एक प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे. दुर्भाग्यवश, 14 मई 2015 को सेवाकाल के दौरान ही उनका निधन हो गया था. इसके बाद मनीषा त्यागी ने 17 मई 2016 को नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था. हालांकि, सहारनपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 14 नवंबर 2024 को उनके आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया था कि वह शादीशुदा हैं. इस मनमाने आदेश के खिलाफ मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की अदालत का निर्देश

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के 14 नवंबर 2024 के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया जिसमें शादी का हवाला देकर दावा खारिज किया गया था. कोर्ट ने साफ किया कि विवाह के बाद भी बेटी अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा बनी रहती है. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इससे नौकरी का स्वतः (ऑटोमैटिक) अधिकार नहीं मिल जाता. संबंधित विभाग को याची की शैक्षिक योग्यता, परिवार की कुल आर्थिक स्थिति, आश्रित होने और पद की उपलब्धता सहित अन्य सभी विधिक शर्तों के आधार पर नए सिरे से विचार करना होगा. हाईकोर्ट ने प्राधिकारियों को आठ सप्ताह के भीतर सभी कारणों को स्पष्ट करते हुए नया आदेश पारित करने का सख्त निर्देश दिया है.

फैमिली पेंशन और सेवा लाभों पर भी अहम टिप्पणी

इस बीच, अदालत ने एक अन्य मामले में फैमिली पेंशन और सेवा लाभों को लेकर भी बड़ा कानूनी बिंदु स्पष्ट किया. न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मृत सरकारी कर्मचारी की फैमिली पेंशन और अन्य वित्तीय सेवा लाभों का असली हकदार कौन होगा, यह पूरी तरह से संबंधित सेवा नियमों से तय किया जाएगा, न कि उत्तराधिकार कानून से. अदालत ने कहा कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने वाली निचली अदालतें इन लाभों पर अपना अंतिम अधिकार तय नहीं कर सकती हैं, क्योंकि कानूनी वारिस होना और किसी विशेष सेवा लाभ का पात्र होना दोनों अलग-अलग बातें हैं.

निलंबित लेखपाल को भी मिली बड़ी राहत

इसके अलावा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य फैसले में अनुचित कार्रवाई का शिकार हुए लेखपाल प्रवेश कुमार को बड़ी राहत दी है. न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की अदालत ने आदेश दिया कि विभागीय और आपराधिक मामलों में आरोपमुक्त हो चुके लेखपाल को उसकी निलंबन अवधि का पूरा वेतन और अन्य सभी एरियर का भुगतान किया जाए. एटा की अलीगंज तहसील में तैनात इस लेखपाल पर साल 2009 में गबन के आरोप लगे थे, जिन्हें कोर्ट ने अब खारिज कर दिया है.



Source link