बागेश्वर: उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में चरवाहों का जीवन प्रकृति, मौसम और पशुओं के साथ गहराई से जुड़ा हुआ होता है. यहां भेड़-बकरियों का पालन केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली और आजीविका का प्रमुख साधन है. जंगलों, पहाड़ी रास्तों और ऊंचे बुग्यालों के बीच रहने वाले चरवाहे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार ठिकाना बदलते हैं. ऊन, दूध, घी और पशुओं की बिक्री से होने वाली कमाई के सहारे वे अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं.
गर्मियों में ऊंचे बुग्यालों की ओर करते हैं रुख
स्थानीय जानकार रमेश कृषक पांडे बताते हैं कि पहाड़ों में सर्दियों के दौरान ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के कारण पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल हो जाता है. वहीं, गर्मियों में ऊंचे बुग्यालों में प्राकृतिक घास और पानी की उपलब्धता बढ़ने पर चरवाहे अपने पशुओं के साथ इन क्षेत्रों की ओर निकल पड़ते हैं. आमतौर पर अप्रैल से सितंबर के बीच उनका ठिकाना ऊंचाई वाले चरागाहों में होता है. इन दुर्गम इलाकों में चरवाहे अस्थायी तंबुओं या पत्थरों से बनी छोटी चन्नियों में रहते हैं. कई बार उन्हें खुले आसमान के नीचे रात बितानी पड़ती है. दिनभर पशुओं को चराने, पानी की व्यवस्था करने और झुंड को सुरक्षित रखने में उनका समय गुजरता है.
सर्दियों में बदलना पड़ता है ठिकाना
अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम बदलने और ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड बढ़ने के साथ चरवाहे निचली घाटियों व भाबर की ओर लौटने लगते हैं. इस मौसमी आवागमन का मुख्य उद्देश्य पशुओं को अनुकूल मौसम, चारा और पानी उपलब्ध कराना होता है. इस दौरान उन्हें अपने साथ भोजन, जरूरी सामान और पशुओं की देखभाल के लिए आवश्यक सामग्री भी ले जानी पड़ती है. दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर लंबे सफर के दौरान भूस्खलन, बारिश, बर्फबारी और रास्तों की खराब स्थिति जैसी चुनौतियां सामने आती हैं. ऐसे में चरवाहों को मौसम का अनुमान लगाते हुए सावधानी से आगे बढ़ना पड़ता है.
ऊन, दूध और पशुओं से चलती है आजीविका
चरवाहों की आमदनी का प्रमुख आधार भेड़-बकरी पालन है. भेड़ों से मिलने वाली ऊन, बकरियों और अन्य पशुओं के दूध से तैयार उत्पाद तथा पशुओं की बिक्री उनकी आय के मुख्य स्रोत हैं. कुछ परिवार दूध से घी और अन्य उत्पाद भी तैयार करते हैं. पशुपालन के साथ परिवार के सदस्यों की मेहनत भी जुड़ी रहती है. पशुओं को चराने, बीमार पशुओं की देखभाल करने और झुंड को जंगली जानवरों से बचाने की जिम्मेदारी आसान नहीं होती है. कई बार परिवार के सदस्यों को महीनों तक अपने स्थायी गांव और सामाजिक परिवेश से दूर रहना पड़ता है.
बुग्यालों में अनाज पहुंचने के लिए हर गांव की बारी
दरअसल जब चरवाहें बुग्यालों में रहते हैं, तो इनके साथ कई गांव की बकरियां और भेड़ होते हैं. ऐसे में हर महीने अलग-अलग गांव के लोग इन तक राशन और नमक पहुंचते हैं. स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां न हो इसलिए भेड़ों को नमक अच्छी मात्रा में खिलाया जाता है. इस दौरान इन चरवाहों के पास एक हजार से अधिक भेड़ होते हैं. जिनका इन्हें खुद ही ध्यान रखना होता है. जिस दौरान गांव के लोग राशन और अन्य खाद्य सामान लेकर बुग्यालों में पहुंचते हैं. इसी दौरान चरवाहों की कुशलता भी जानी जाती है. साथ में उनके अगले पड़ाव की जानकारी भी अन्य गांव के लोगों को इसी माध्यम से मिलती है. छह महीने चरवाहें उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहते हैं, और शीत ऋतु शुरू होने के समय धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों से होते हुए भाबर की ओर निकल जाते हैं. अगले छह महीने वहीं अपना जीवन यापन करते हैं.