नई दिल्ली: अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अर्थ ऑब्जर्विंग सैटेलाइट्स ने प्रशांत महासागर में ऐतिहासिक अल नीनो को ट्रैक किया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह प्राकृतिक घटना सूर्य ग्रहण से भी दुर्लभ है. नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन यानी (NOAA) ने चेतावनी दी है. नोआ के अनुसार 83 प्रतिशत आशंका है कि यह 1950 के बाद का सबसे ताकतवर अल नीनो बन रहा है. इस मौसमी बदलाव का सीधा असर दुनिया भर के किसानों और तटीय इलाकों में रहने वाले समुदायों पर दिखने लगा है. प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में पानी का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ गया है. हवाओं की दिशा पलटने से समंदर का जलस्तर और मौसमी चक्र पूरी तरह गड़बड़ा गया है. नासा के आधुनिक सैटेलाइट्स अंतरिक्ष से इस पूरे सिस्टम के हर बदलाव पर लगातार नजर रख रहे हैं.
समंदर के नीचे उठी केल्विन तरंगों ने अल नीनो की शुरुआत कैसे की?
नासा के सैटेलाइट्स को इस ऐतिहासिक अल नीनो का पहला सुराग जनवरी 2026 में मिला था. उस दौरान पश्चिमी प्रशांत महासागर में माइक्रोनेशिया के पास गर्म पानी की हलचल देखी गई थी. वैज्ञानिकों ने इसे केल्विन वेव का नाम दिया है. यह पानी के भीतर हजारों मील लंबी और धीमी गति से चलने वाली तरंगें होती हैं.
- यह तरंगें समंदर के भीतर किसी हाईवे की तरह काम करती हैं. यह तरंगें पश्चिम से पूर्व की ओर भारी मात्रा में गर्मी को ट्रांसफर करती हैं. गर्म पानी अपने ठीक ऊपर मौजूद हवा को गर्म करता है जिससे वह ऊपर उठने लगती है.
- हवा के दबाव में बदलाव आने से व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं. कई बार यह हवाएं विपरीत दिशा में बहने लगती हैं. इस बदलाव से पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में जलस्तर बढ़ता है और पानी अधिक गर्म होने लगता है.
प्रशांत महासागर के जलस्तर और तापमान में कितना बदलाव देखा गया?
अप्रैल महीने की शुरुआत तक यह केल्विन तरंगें पूर्वी प्रशांत क्षेत्र तक पहुंच चुकी थीं. गर्म होने की वजह से पानी का फैलाव बढ़ा जिससे स्थानीय जलस्तर में 30 से 40 सेंटीमीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. यह बढ़ा हुआ पानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बढ़ा और फिर कैलिफोर्निया के तट की ओर फैल गया.
नासा के सैटेलाइट्स महासागर की ऊंचाई और गर्मी को कैसे नाप रहे हैं?
- वैज्ञानिक साल 1993 से सैटेलाइट अल्टीमेट्री के जरिए समंदर की ऊंचाई का सटीक डेटा जुटा रहे हैं. यह रिकॉर्ड आज भी सेंटिनल-6 सैटेलाइट्स की मदद से बिना रुके जारी है. इन सैटेलाइट्स पर लगे रडार अल्टीमीटर एक ही दिन में लाखों वर्ग मील समंदर का सर्वेक्षण कर लेते हैं.
- यह सैटेलाइट्स नोआ के समुद्री सेंसर्स और तैरते हुए प्लैटफॉर्म के साथ मिलकर काम करते हैं. पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समंदर की सतह का तापमान सामान्य से 1.7 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म दर्ज किया गया है. जोश विलिस के अनुसार आने वाले महीनों में इस तापमान में और बढ़ोतरी हो सकती है.
- सैटेलाइट्स पर लगे इंफ्रारेड रेडियोमीटर बादलों के आर-पार देखकर समंदर की गर्मी को दर्ज करते हैं. गहरे लाल रंग की यह गर्म पानी की पट्टी प्रशांत क्षेत्र से दक्षिण अमेरिका तक लाखों वर्ग मील में फैल चुकी है.
अल नीनो की वजह से समंदर का हरा रंग नीला क्यों पड़ने लगा है?
अल नीनो के गर्म पानी ने प्रशांत महासागर के रंग को भी बदलना शुरू कर दिया है. नासा का एक विशेष सैटेलाइट महासागर के रंगों में आ रहे इस बदलाव को ट्रैक कर रहा है. पिछले कई महीनों के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र का पानी काफी हद तक नीला हो गया है.
नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में पेस सैटेलाइट टीम के मुख्य वैज्ञानिक मैथ्यू केहरली ने कहा, ‘कुछ लोग पानी को केवल नीला मानते हैं लेकिन समंदर के कई रंगों में होना अद्भुत है.’
समंदर का यह रंग फाइटोप्लैंकटन नाम के सूक्ष्म पौधों की वजह से तय होता है. यह सूक्ष्म पौधे समुद्री खाद्य श्रृंखला की बुनियादी नींव होते हैं. यह पौधे हरे और भूरे जैसे विभिन्न रंगों में पाए जाते हैं. इस साल आमतौर पर फाइटोप्लैंकटन से भरपूर रहने वाला हरा इलाका तेजी से फीका पड़ रहा है.
(Video Credit: NASA’s Scientific Visualization Studio)
समुद्री फूड चेन पर फाइटोप्लैंकटन की कमी का क्या असर पड़ेगा?
फाइटोप्लैंकटन आमतौर पर ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी में तेजी से पनपते हैं. अल नीनो के कारण व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं. हवाओं के रुकने से गहरे समंदर का ठंडा और पोषक पानी सतह पर नहीं आ पाता है.
भोजन की भारी कमी के कारण फाइटोप्लैंकटन की संख्या में तेज गिरावट आ जाती है. इस गिरावट का बुरा असर पूरे समुद्री जीव-जंतुओं के चक्र पर पड़ता है. भोजन की कमी होने पर मछलियों और अन्य समुद्री जीवों को नए इलाकों की तरफ जाना पड़ता है. इससे तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरों की आजीविका पर भी गहरा संकट खड़ा हो जाता है.
पेस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष से महासागर के रंगों का कौन सा डेटा जुटाया?
साल 2024 में लॉन्च हुए पेस सैटेलाइट के बाद से यह पहला बड़ा अल नीनो है. इस सैटेलाइट पर लगा ओशन कलर इंस्ट्रूमेंट समंदर को कई सौ अलग-अलग वेवलेंथ में देखता है. यह उपकरण विजिबल और नियर-इंफ्रारेड लाइट की मदद से फाइटोप्लैंकटन पर रियल टाइम नजर रखता है.
दुनिया भर के मौसम और आम इंसानों पर इस अल नीनो का क्या प्रभाव होगा?
समंदर का असामान्य तापमान पूरी दुनिया के मौसम को अस्त-व्यस्त कर सकता है. पानी की सतह के ऊपर की गर्म हवा नमी को वायुमंडल में ले जाती है. इससे भारी बारिश और भयानक तूफानों का नया दौर शुरू हो जाता है.
नासा के वैज्ञानिक अपने अर्थ ऑब्जर्विंग सैटेलाइट्स के जरिए इस मौसमी सिस्टम की लगातार निगरानी करेंगे. जोश विलिस ने कहा, ‘अल नीनो जब भी आता है तब हम सभी को किसी न किसी तरह प्रभावित करता है. हम यह समझने के लिए समंदर की तरफ देखते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है.’ आने वाले महीनों में यह प्रणाली दुनिया भर के मौसम पर गहरा असर डालेगी.