Myanmar Rare Earth Minerals: भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में अमेरिका की दिलचस्पी अचानक बढ़ गई है. जिस मिलिट्री शासन पर लोकतांत्रिक सरकार को हटाने के बाद सत्ता संभालने के आरोप हैं, उसी के साथ अमेरिका सीक्रेट तरीके से बातचीत कर रहा है. वजह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि जमीन के नीचे छिपा ऐसा खजाना भी है, जिस पर चीन की मजबूत पकड़ है. ये खजाना है ‘रेयर अर्थ’ यानी ऐसे खास खनिज, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक कारों, विंड एनर्जी और आधुनिक तकनीक में होता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और म्यांमार के मिलिट्री लीडरशिप के बीच पिछले हफ्ते टोक्यो में एक और दौर की बातचीत हुई. यह एक महीने के अंदर दोनों पक्षों की दूसरी बैठक थी. बातचीत में अमेरिकी विदेश विभाग के खुफिया और रिसर्च डिपार्टमेंट के सहायक सचिव माइकल वेंस ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. इसमें एक दर्जन से ज्यादा अधिकारी शामिल बताए गए हैं. इस मुलाकात से पहले सितंबर के मध्य में वेंस म्यांमार की राजधानी नेपीडॉ भी गए थे. वहां उन्होंने सैन्य समर्थित राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग से मुलाकात की थी. बातचीत में एक अमेरिकी कारोबारी की रिहाई और अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले ऑनलाइन ठगी के नेटवर्क पर कार्रवाई जैसे मुद्दे भी शामिल थे.
म्यांमार में क्यों घुसना चाहता है अमेरिका?
रेयर अर्थ खनिज आज दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच मुकाबले का अहम हिस्सा बन चुके हैं. इलेक्ट्रिक गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले मैग्नेट से लेकर विंड एनर्जी के टर्बाइन तक, कई टेक्नोलॉजी में इनकी जरूरत पड़ती है. इनमें डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे भारी रेयर अर्थ तत्व खास महत्व रखते हैं. इनकी मदद से ऐसे मैग्नेट बनाए जाते हैं, जो ज्यादा गर्मी और कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकते हैं. समस्या यह है कि इन खनिजों की सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है. चीन सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि इन खनिजों को साफ करने, प्रोसेस करने और उद्योगों में इस्तेमाल लायक बनाने की क्षमता भी उसके पास है.
अमेरिका के लिए यही बड़ी चुनौती है. अगर चीन सप्लाई रोकता है, तो इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा और दूसरे आधुनिक उद्योगों पर असर पड़ सकता है. ऐसे में म्यांमार जैसे देश अमेरिका के लिए अहम हो जाते हैं. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने जुलाई में रिपोर्ट किया था कि दुनिया में भारी रेयर अर्थ की करीब आधी सप्लाई म्यांमार के काचिन राज्य की खदानों से आती है. वहां से निकले खनिजों का बड़ा हिस्सा प्रोसेसिंग के लिए चीन भेजा जाता है. यानी खनिज म्यांमार की जमीन से निकलते हैं, लेकिन उन्हें इस्तेमाल लायक बनाने में चीन की बड़ी भूमिका है. अमेरिका इसी व्यवस्था में अपनी जगह बनाना चाहता है.
अमेरिका के लिए क्या हैं मुश्किलें?
अमेरिकी की स्ट्रैटेजी को सुनकर सबकुछ आसान लग रहा होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. अमेरिका की रणनीति के सामने एक बड़ी मुश्किल भी है. म्यांमार में जिन इलाकों में रेयर अर्थ खदानें हैं, उनमें से कुछ पर वहां की सेना का कंट्रोल नहीं है. काचिन राज्य में काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (KIA) का प्रभाव है. यह एक सशस्त्र जातीय संगठन है, जो म्यांमार की सेना के खिलाफ लड़ रहा है. चीन की सीमा के पास मौजूद चिपवे-पांगवा खनन क्षेत्र भी उसके कंट्रोल में है. KIA ने अक्टूबर 2024 में इस इलाके पर कब्जा किया था. इसके बाद म्यांमार की सेना ने सीमा के अहम इलाकों पर दोबारा नियंत्रण पाने की कोशिश की है. इससे खनन और खनिजों की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
यही इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू है. अमेरिका म्यांमार के सैन्य नेतृत्व से बातचीत कर रहा है, लेकिन जिन खदानों से वह रेयर अर्थ मिनरल चाहता है, उन पर कब्जा विद्रोही संगठनों का है. ऐसे में सिर्फ सैन्य शासन से बातचीत कर लेने भर से अमेरिका को खनिजों की सप्लाई मिलने की गारंटी नहीं है. उसे खदानों पर नियंत्रण, सुरक्षा और खनिजों को बाहर ले जाने के रास्तों जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है.
अमेरिका के लिए खनिज मिलना भी है मुश्किल
रेयर अर्थ की कहानी में एक और बड़ी समस्या है. खदान से खनिज निकाल लेना ही काफी नहीं होता. उन्हें अलग करना, साफ करना और तय गुणवत्ता तक पहुंचाना भी जरूरी है. स्टिमसन सेंटर के 2025 के एक विश्लेषण के मुताबिक, म्यांमार के पास रेयर अर्थ को उस स्तर तक शुद्ध करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है, जिसकी आधुनिक उद्योगों में जरूरत होती है. इसका मतलब है कि अगर अमेरिका म्यांमार से खनिज हासिल भी कर ले, तो उसे उनकी प्रोसेसिंग के लिए अलग व्यवस्था बनानी पड़ सकती है. और अगर खनिज फिर चीन में ही प्रोसेस होते हैं, तो चीन पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करना मुश्किल होगा.
भारत की भी म्यांमार के खनिजों पर नजर
इस पूरी कहानी में भारत का पहलू भी बेहद अहम है. म्यांमार भारत का पड़ोसी देश है और उसके खनिज संसाधन भारत की रणनीतिक जरूरतों से भी जुड़े हैं. भारत के राजदूत अभय ठाकुर ने जुलाई में बताया था कि महत्वपूर्ण खनिजों की संभावनाएं तलाशने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल दिसंबर 2024 और फरवरी 2026 में म्यांमार गया था. रॉयटर्स की एक पिछली रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के खान मंत्रालय ने सरकारी कंपनी IREL और निजी कंपनी मिडवेस्ट एडवांस्ड मटेरियल्स से कहा था कि वे KIA के नियंत्रण वाली खदानों से रेयर अर्थ के नमूने हासिल करने की संभावनाएं तलाशें. इससे साफ है कि म्यांमार के खनिजों में भारत की भी दिलचस्पी है.