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जापान की स्पेस एजेंसी JAXA का MMX मिशन मंगल के चांद फोबोस से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी के नमूने लाएगा. 2031 में ये ये मिशन पूरा होने का टार्गेट रखा गया है. वैज्ञानिक इन नमूनों की जांच करके पता लगाना चाहते हैं कि मंगल के दोनों चांद फोबोस और डीमोस कैसे बने. दरअसल मंगल ग्रह के चांद को लेकर रहस्य हैं. पहला रहस्य ये कि शायद इनका निर्माण मंगल पर किसी उल्कापिंड की टक्कर से हुआ है. दूसरा ये कि शायद ये एस्टेरॉयड थे, जो मंगल की ग्रेवेटी में फंस गए. इन नमूनों के जरिए वे पता लगाना चाहते हैं कि आखिर इनका निर्माण कैसे हुआ?
मंगल ग्रह के चांद पर स्पेसक्राफ्ट उतारने की तैयारी.
Mars Moon News: मंगल ग्रह के दो चांद हैं- फोबोस और डीमोस. फोबोस (Phobos) करीब 22–27 किलोमीटर लंबा और डीमोस (Deimos): करीब 12–15 किलोमीटर लंबा है. लेकिन ये दोनों बने कैसे? क्या ये अंतरिक्ष में भटक रहे ऐसे एस्टेरॉयड थे, जिन्हें मंगल ने अपने गुरुत्वाकर्षण से पकड़ लिया? या फिर किसी विशाल टक्कर के बाद मंगल से निकले मलबे से इनका जन्म हुआ? वैज्ञानिकों के पास इन सवालों के दो जवाब हैं, लेकिन अब तक किसी एक सवाल का जवाब भी नहीं मिला है. जापान अब इसी रहस्य को सुलझाने की तैयारी कर रहा है. उसका एक खास स्पेसक्राफ्ट मंगल के चांद फोबोस से मिट्टी के नमूने लेकर धरती पर लौटेगा.
10 ग्राम मिट्टी से खुलेगा रहस्य
जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA ने इसके लिए मार्टियन मून्स एक्सप्लोरेशन (MMX) मिशन तैयार किया है. इसका लक्ष्य मंगल के चांद फोबोस से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी और दूसरे पदार्थ इकट्ठा करना है. इन नमूनों को धरती पर लाकर वैज्ञानिक लैब में उनकी जांच करेंगे. मिशन की योजना के मुताबिक, नमूने 2031 में धरती पर वापस लाए जाएंगे. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन नमूनों की जांच से पता चल सकता है कि फोबोस और डीमोस का जन्म कैसे हुआ. इससे मंगल और उसके आसपास के अंतरिक्ष की शुरुआती कहानी समझने में भी मदद मिल सकती है.
आखिर क्या है मंगल के चांद बनने की पहेली?
वैज्ञानिकों के सामने दो बड़ी संभावनाएं हैं.
- पहली थ्योरी: फोबोस और डीमोस कभी अलग-अलग एस्टेरॉयड थे. ये अंतरिक्ष में घूम रहे थे और बाद में मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने इन्हें अपनी कक्षा में खींच लिया.
- दूसरी थ्योरी: अरबों साल पहले मंगल से कोई बहुत बड़ा पिंड टकराया. इस टक्कर से निकला मलबा मंगल के चारों ओर जमा हुआ और धीरे-धीरे दोनों चांद बन गए.
इन दोनों में से कौन-सी थ्योरी सही है, यह पता लगाने में फोबोस से लाई गई मिट्टी अहम साबित हो सकती है. वैज्ञानिक इसमें मौजूद खनिजों, रासायनिक तत्वों और दूसरे संकेतों की जांच करेंगे. इनसे पता चल सकता है कि फोबोस का पदार्थ कहां से आया और उसका इतिहास क्या रहा है.
जापान के सामने क्या होगी चुनौती?
फोबोस पर उतरना और वहां से मिट्टी उठाना आसान नहीं होगा. इसका गुरुत्वाकर्षण बहुत कमजोर है. ऐसे में स्पेसक्राफ्ट को बेहद सावधानी से काम करना होगा, ताकि नमूने इकट्ठा करते समय वह अपनी जगह से अनियंत्रित होकर न हट जाए.
इसके लिए मिशन में नमूने जुटाने के दो खास सिस्टम होंगे. पहला उपकरण सतह के नीचे से मिट्टी का नमूना निकालेगा. दूसरा सिस्टम तेज दबाव वाली नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल करके सतह के कणों को उड़ाएगा और उन्हें एक कंटेनर में इकट्ठा करेगा. मिशन के तहत फोबोस की दो अलग-अलग जगहों से नमूने जुटाने की योजना है. इसके अलावा, जर्मनी और फ्रांस के सहयोग से तैयार एक छोटा रोवर भी फोबोस की सतह का अध्ययन करेगा.
दूसरे चांद डीमोस पर भी नजर
जापान का यह मिशन केवल मिट्टी लाने तक सीमित नहीं है. स्पेसक्राफ्ट मंगल के दोनों चांद- फोबोस और डीमोस का अध्ययन करेगा. यह उनकी सतह, बनावट, अंदरूनी संरचना, रासायनिक संरचना और गुरुत्वाकर्षण से जुड़ी जानकारियां जुटाएगा. मिशन की योजना के मुताबिक, स्पेसक्राफ्ट को मंगल तक पहुंचने में 2027 तक का समय लगेगा. वहां पहुंचने के बाद वह फोबोस का बारीकी से अध्ययन करेगा और नमूने इकट्ठा करने का काम करेगा. इसके बाद नमूनों को एक खास कैप्सूल में बंद करके धरती की ओर भेजा जाएगा. इसकी वापसी ऑस्ट्रेलिया के वूमेरा इलाके में कराने की योजना है.