Dehradun News : भोलेनाथ को क्यों इतना प्रिय है हुड़का? नदी किनारे की लकड़ियों से होता तैयार, मढ़ते हैं हिरण की खाल

Dehradun News : भोलेनाथ को क्यों इतना प्रिय है हुड़का? नदी किनारे की लकड़ियों से होता तैयार, मढ़ते हैं हिरण की खाल


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Why Hurka Favorite Bholenath : उत्तराखंड की लोक संस्कृति में हुड़के का एक अलग स्थान है. यह भोलेनाथ का प्रिय है और जागर के साथ लोक गाथाओं के गायन में इसका प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है. लोकल 18 से उत्तराखंड के लोक कलाकार राम चरण जुयाल बताते हैं कि हुड़का बनाना आसान नहीं. शीशम, अखरोट, खमीण या तुन की मजबूत लकड़ी को तराश कर इसे आकार दिया जाता है. इसके दोनों सिरों पर बकरी या हिरण की मुलायम लेकिन मजबूत खाल मढ़ी जाती है. राम चरण जुयाल कहते हैं कि इस वाद्य यंत्र की बनावट और कसावट इसकी गूंज को सबसे अलग बनाती है. खाल को आपस में एक-दूसरे की डोरी से कस दिया जाता है ताकि सही ध्वनि निकल सके.

देहरादून. उत्तराखंड की लोक संस्कृति में ‘हुड़का’ का एक विशिष्ट और पवित्र स्थान है. डमरू के आकार से मिलता-जुलता यह वाद्य यंत्र देवों के देव भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है. पौराणिक मान्यता है कि हुड़के की लयबद्ध और गूंजती हुई ध्वनि से स्वयं भगवान शिव प्रसन्न होते हैं. यही कारण है कि ‘जागर’ जैसे उत्तराखंड का पारंपरिक देव-आह्वान अनुष्ठान और लोक गाथाओं के गायन में इसका प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है. हुड़के की थाप केवल संगीत उत्पन्न नहीं करती, बल्कि वातावरण में एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है, जिससे जगरिया और श्रोता भक्ति-रस में लीन हो जाते हैं.

कैसे बनाते हैं

लोकल 18 से उत्तराखंड के लोक कलाकार राम चरण जुयाल बताते हैं कि हुड़के को बनाने की प्रक्रिया बेहद खास, पारंपरिक और बारीक कारीगरी से भरी होती है. इसके बीच का खोखला ढांचा या काठ नदी के किनारे पाई जाने वाली विशेष लकड़ियों से तैयार किया जाता है. शीशम, अखरोट, खमीण या तुन की मजबूत लकड़ी को तराश कर इसे डमरू का रूप दिया जाता है. इसके लकड़ी के इस मुख्य भाग को स्थानीय भाषा में ‘नाई’ या ‘नाली’ कहा जाता है. इसके दोनों खुले सिरों पर बकरी या हिरण की मुलायम लेकिन मजबूत छली हुई खाल मढ़ी जाती है, जिसे आमाशय की झिल्ली से भी सुसज्जित किया जाता है.

बजाते कैसे हैं

राम चरण जुयाल कहते हैं कि इस वाद्य यंत्र की बनावट और कसावट इसकी गूंज को सबसे अलग बनाती है. इसके दोनों सिरों पर चढ़ाई गई खाल को लकड़ी के ढांचे पर कसने के लिए सूत या मूंज की मजबूत रस्सियों का ताना-बाना बुना जाता है. खाल को आपस में एक-दूसरे की डोरी से कस दिया जाता है ताकि सही ध्वनि निकल सके. राम चरण जुयाल के मुताबिक हुड़के को बजाने की विधि अलग है. बजाते समय वादक इसे अपने कंधे में रस्सी के सहारे लटकाता है. वह एक हाथ से इसकी रस्सियों को दबाकर आवाज की पिच और गूंज को नियंत्रित करता है, जबकि दूसरे हाथ से लकड़ी की छोटी डांडी यानी कोनी से खाल पर थाप दी जाती है. रस्सियों के इस खिंचाव और ढील से मनमोहक ध्वनि निकलती है.

जागर और गीत दोनों की जान

लोक कलाकार राम चरण जुयाल काफी कम उम्र से हुड़का बजा रहे हैं. वे कहते हैं कि उत्तराखंड के पहाड़ों में गायन की दो शैलियां प्रमुख हैं- एक जागर शैली और दूसरी गीत शैली. जहां गीतों में ढोलक और जागर में ढोल दमाऊ बजाए जाते हैं, हुड़के की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जागर और गीत दोनों में समान रूप से बजाया जाता है. डमरू की जाति का होने के कारण यह भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है और आज भी उत्तराखंड की पहाड़ियों में शिव-भक्ति और लोक-संस्कृति की अटूट पहचान बना हुआ है.



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