साल 1951 और तारीख 16 अक्टूबर. यानी पाकिस्तान देश बनने के 4 साल बाद की बात है. पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान रावलपिंडी शहर के कंपनी बाग में भाषण दे रहे थे. माइक के सामने उनके मुंह से निकला- बरादरान-ए-मिल्लत जिसका हिंदी तर्जुमा कौम के भाइयों होगा. और फिर सामने की भीड़ में से उठे एक शख्स ने बंदूक निकालकर दो गोली मार दी. इस हमले के फौरन बाद ही पुलिस ने गोली चलाने वाले उस इंसान को भी मार दिया. इस कारण उससे पूछताछ नहीं हो सकी और हत्या की असली वजह जानने का सबसे अहम मौका खत्म हो गया. उस घटना को आज 75 साल पूरे हो गए लेकिन सवाल जस का तस है. आखिर पाकिस्तान के पहले पीएम की हत्या क्यों की गई?
पाकिस्तान के इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिनके सवाल आज भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाए हैं. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या भी ऐसी ही एक घटना है. 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी में एक सार्वजनिक सभा के दौरान उन्हें गोली मार दी गई थी. वह पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी सहयोगी थे और देश के शुरुआती राजनीतिक ढांचे को आकार देने में उनकी अहम भूमिका थी.
लियाकत अली खान की हत्या का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि उनकी मौत के बाद पाकिस्तान की राजनीति में सत्ता, सेना, नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संबंधों को लेकर कई सवाल उठे. गोली चलाने वाला शख्स तो पहचान में आ गया लेकिन हत्या के पीछे की साजिश, मकसद और उसके सहयोगियों को लेकर विवाद बना रहा. सबसे अहम सवाल यही है कि गोली किसने चलाई, हमलावर को किसने मारा और क्या इस हत्या के पीछे कोई बड़ी साजिश थी?
उस बाग पर पड़े खून के छींटे
लियाकत अली खान की हत्या जिस सभा में हुई, उस जगह का नाम कंपनी बाग था, जिसे आज लियाकत बाग के नाम से जाना जाता है. इस पार्क के दामन पर भी खून के दाग हैं. मार्च 1973 में आवामी नेशनल पार्टी के नेता अब्दुल वली खान की अगुवाई में रैली पर गोलीबारी हुई थी, जिसमें कई लोगों की मौत हुई थी. फिर दिसंबर 2007 में इसी पार्क में सबसे बड़ी घटना हुई, जब पूर्व पीएम बेनजीर भुट्टो पर फायरिंग के बाद बम अटैक से कत्ल कर दिया गया था.
56 साल की उम्र में लियाकत पर हमलावर ने कथित तौर पर लगातार दो गोलियां दागीं. उन्हें गंभीर हालत में रावलपिंडी के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई. गोली चलाने वाला अफगान मूल का सईद अकबर बाबरक निकला. तुरंत ही पुलिस ने उसे ढेर कर दिया. उसका संबंध अफगानिस्तान के खोस्त क्षेत्र के जदरान कबायली समुदाय से बताया जाता है. वह पाकिस्तान के एबटाबाद में रह रहा था. उसकी ऐसी कोई खास पहचान नहीं थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक उसका कबीला अफगानिस्तान की तत्कालीन राजशाही के खिलाफ संघर्ष में शामिल रहा था. हालांकि उसने लियाकत अली खान की हत्या किस मकसद से की थी, इसका पता नहीं चल सका.
हमलावर को जिंदा क्यों नहीं पकड़ा गया?
लियाकत पर हमले के बाद पुलिस अधिकारी खान नजफ खान के ऑर्डर पर इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह ने सईद अकबर पर गोलियां चलाईं. इसका नतीजा यह हुआ कि मुख्य संदिग्ध से पूछताछ करने, उसके मकसद का पता लगाने और यह जानने का अवसर नहीं मिला कि उसने किसी के कहने पर हमला किया था या अकेले ही इसकी योजना बनाई थी. हत्या की जांच करने वाले आयोग ने पुलिस के आचरण और सुरक्षा इंतजामों से जुड़े कई सवालों पर विचार किया. बाद में इस बात को लेकर भी सवाल उठे कि हमलावर को जिंदा पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की गई और पुलिसकर्मियों के बयानों में अंतर क्यों था.
लियाकत अली खान की हत्या के पीछे क्या कारण था?
इस सवाल का कोई ऐसा जवाब नहीं है जिसे निर्णायक रूप से साबित किया जा चुका हो. सरकारी जांच हुई, पुलिस ने पड़ताल की और ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड ने भी मामले की जांच की. इसके बावजूद हत्या के पीछे के मकसद और किसी संभावित साजिश में दूसरे लोगों की भूमिका को लेकर सवाल बने रहे.
- कश्मीर का मुद्दा: लियाकत अली खान की हत्या की जांच में सामने आए प्रमुख संभावित कारणों में कश्मीर नीति भी शामिल थी. 1947 में भारत के विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष शुरू हुआ. युद्ध के बाद 1 जनवरी 1949 को सीजफायर लागू हुआ. पाकिस्तान में कुछ ऐसे लोग थे जो कश्मीर में सैन्य कार्रवाई जारी रखने और श्रीनगर तक पहुंचने के पक्ष में थे. सईद अकबर के बारे में भी यह बात सामने आई कि वह कश्मीर के मुद्दे में दिलचस्पी रखता था. जांच आयोग ने यह आशंका जताई कि उसने लियाकत अली खान की कश्मीर नीति से नाराज होने के चलते यह कदम उठाया होगा. हालांकि, जांच आयोग ने इस पेशकश को विश्वसनीय नहीं माना.
- लाइफस्टाइल और पत्नी का हिजाब: जांच के दौरान एक दूसरा दावा यह भी सामने आया कि हमलावर प्रधानमंत्री की लाइफस्टाइल से नाराज था. उनकी पत्नी बेगम राना लियाकत अली खान सार्वजनिक जीवन में पर्दा नहीं करती थीं. इस आधार पर यह अटकल लगाई गई कि हमलावर को उनके तौर-तरीकों से आपत्ति थी. लेकिन यह दावा भी ठोस सबूतों से साबित नहीं हुआ. जांच आयोग ने इस संभावना को आधारहीन माना.
- अफगानिस्तान का राजनीतिक संघर्ष: सईद अकबर अफगानिस्तान के खोस्त क्षेत्र के जदरान कबायली समुदाय से जुड़ा था. उसके परिवार का अफगानिस्तान की राजशाही के विरोध से संबंध रहा था. वह बाद में पाकिस्तान में रहने लगा. इस बैकग्राउंड की वजह से उसके पुराने राजनीतिक संबंधों, कबायली संपर्कों और पाकिस्तान में उसके जीवन की जांच की गई. लेकिन आयोग को उसके इन संपर्कों से हत्या की वजह का कोई निर्णायक सुराग नहीं मिला.
- पाकिस्तानी सेना और रावलपिंडी साजिश: मार्च 1951 में पाकिस्तान में लियाकत अली खान की सरकार को गिराने की कथित साजिश सामने आई थी, जिसे इतिहास में रावलपिंडी साजिश कहा जाता है. इसमें मेजर जनरल अकबर खान समेत सेना के कुछ अधिकारियों और अन्य लोगों पर सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने के आरोप लगे थे. इस साजिश का मकसद सरकार को हटाना था. मामले में गिरफ्तारियां हुईं और मुकदमा चला. लियाकत अली खान की हत्या के लगभग सात महीने पहले यह घटनाक्रम हुआ था. इसी समय-संबंध के कारण बाद में सवाल उठे कि क्या हत्या का संबंध सरकार को गिराने की कोशिश करने वाले लोगों से हो सकता था. सईद अकबर के बेटे फारूक बाबरकजई ने अपनी किताब में भी इस मुद्दे को उठाया है.
हत्या की जांच के लिए कौन-सा आयोग बना था?
पाकिस्तान सरकार ने हत्या के नौ दिन बाद, 25 अक्टूबर 1951 को जांच आयोग बनाया. इसकी अध्यक्षता फेडरल कोर्ट के न्यायाधीश मोहम्मद मुनीर ने की. पंजाब के वित्त आयुक्त अख्तर हुसैन भी आयोग में शामिल थे. आयोग ने 38 बैठकों में 66 गवाहों के बयान दर्ज किए. इनमें 23 बैठकें लाहौर और 15 रावलपिंडी में हुईं. आयोग ने 28 फरवरी 1952 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड से जुड़े अधिकारी सेसिल एडविन यूरेन ने भी मामले की पड़ताल की. उनकी जांच के अनुसार सईद अकबर ने अकेले ही हत्या की योजना बनाई थी.
क्या हत्या के पीछे पाकिस्तान के राजनीतिक नेताओं का हाथ था?
इस सवाल पर भी समय-समय पर अटकलें लगाई गईं. लियाकत अली खान की मौत से पाकिस्तान के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व में बड़ा बदलाव आया. उनके बाद ख्वाजा नजीमुद्दीन प्रधानमंत्री बने, जबकि गुलाम मोहम्मद गवर्नर जनरल बने. प्रधानमंत्री की हत्या ने राजनीतिक व्यवस्था को और अनिश्चित बना दिया. लेकिन किसी नेता को हत्या का जिम्मेदार बताने के लिए सिर्फ इतना पर्याप्त नहीं है कि उनकी मौत के बाद सत्ता में बदलाव हुआ या किसी को राजनीतिक लाभ मिला. उपलब्ध जांच के आधार पर किसी खास राजनीतिक नेता को हत्या का षड्यंत्रकारी घोषित नहीं किया जा सकता है.