उज्जैन. हिंदू धर्म में नवरात्रि के पर्व को शक्ति की आराधना और भक्ति का महापर्व माना जाता है. इन 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने का विशेष विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में माता रानी अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर विराजमान होती हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है. नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है. आइए, उज्जैन के पंडित आनंद भारद्वाज से जानते हैं कि नवरात्रि के सातवें दिन किस देवी की पूजा करनी चाहिए और इसका क्या महत्व है.
मां कालरात्रि की पूजा का विधान
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा का विधान है. मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली माना जाता है. उनका वर्ण घने अंधकार के समान श्याम है और माता के तीन नेत्र हैं. उनके लंबे, खुले हुए केश उनके स्वरूप को और भी अद्भुत बनाते हैं. माता के गले में सुशोभित माला बिजली की तरह दमकती है. वहीं उनकी सांसों से अग्नि की लपटें निकलने का वर्णन मिलता है. मां के चार हाथ हैं, जिनमें खड्ग और लौह अस्त्र हैं जबकि अन्य दो हाथों से वह भक्तों को अभय और वरदान प्रदान करती हैं.
मां कालरात्रि की पूजा के लाभ
माता कालरात्रि अपने उपासकों को काल से भी बचाती हैं अर्थात उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती. इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही भूत, प्रेत, राक्षस और सभी नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं. माता दुष्टों का विनाश करने वाली हैं. वह ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली देवी हैं. इनके उपासक को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते. सभी व्याधियों और शत्रुओं से छुटकारा पाने के लिए मां कालरात्रि की आराधना विशेष फलदायी होती है.
मां कालरात्रि को जरूर लगाएं यह भोग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता रानी को गुड़ और इससे बनी मिठाइयों का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है. इस दिन पूजा के दौरान मां कालरात्रि को गुड़, गुड़ की खीर या गुड़ से तैयार पकवान अर्पित कर सकते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है.
जरूर करें माता के इन मंत्रों का जाप
1. ॐ कालरात्र्यै नम:।
2. एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
3. जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि।
जय सार्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तुते॥
4. ॐ ऐं सर्वाप्रशमनं त्रैलोक्यस्या अखिलेश्वरी।
एवमेव त्वथा कार्यस्मद् वैरिविनाशनम् नमो सें ऐं ॐ।।