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Balaghat: बालाघाट में 12 दिसंबर 2025 को सरेंडर करने वाले 13 नक्सलियों में से 12 को करीब 10 महीने की पुलिस निगरानी के बाद उनके गृह राज्य को सौंप दिया गया है. इस दौरान उनके बैंक खाते, पैन, आधार और वोटर कार्ड बनवाए गए और सिलाई और ड्राइविंग की ट्रेनिंग दी गई. बालाघाट मूल के कमांडर दीपक उइके अब भी निगरानी में हैं.
Balaghat Naxalites Surrender: मध्य प्रदेश का बालाघाट ही एक ऐसा जिला था, जो एमपी में सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित रहा है. एमपी के अलावा मंडला, डिंडौरी भी कभी नक्सल प्रभावित थे. यहां पर करीब 35 सालों तक बालाघाट के कुछ इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाते थे. लेकिन बीते साल केंद्र सरकार की डेडलाइन से पहले ही 12 दिसंबर 2025 को एमपी में सक्रिय रहे नक्सली एमपी सहित छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के सरेंडर कर चुके है. ऐसे में बालाघाट में 13 नक्सलियों ने सरेंडर किया था. ऐसे में करीब 10 महीने पुलिस निगरानी में रहने के बाद उन्हें अपने उनके गृह राज्य सुपूर्द किया जा चुका है. इसमें अब बालाघाट मूल के नक्सली कमांडर रहे दीपक उइके अब भी पुलिस निगरानी में हैं.
13 नक्सलियों ने किया सरेंडर, 12 हुए आजाद
नक्सलियों ने दंडकारण्य में एक जोन बनाया था. इसमें एक एमएमसी जोन यानी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय रहता था. इसमें दो डिवीजन थे. एक कान्हा भोरमदेव और दूसरा जीआरबी यानी ( गोंदिया, राजनांदगांव और बालाघाट) डिवीजन. यहां पर आखिर में तीन दलम सक्रिय थे. इसमें जीआरबी डीवीजन के नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के गोंदिया में सरेंडर किया. फिर केबी डिवीजन के नक्सलियों ने दिसंबर के महीने तक बालाघाट में सरेंडर किया. बालाघाट में सरेंडर करने वाले नक्सलियों की संख्या 13 थी, जिसमें 12 को उनके गृह राज्य पुलिस को सौंपा गया है. अब वो नक्सली अपने घर जा सकेंगे.
संविधान को नहीं मानने वाले नक्सलियों को मिली भारतीय पहचान
जब नक्सली जंगलों में हुआ करते थे. तब वह देश की सरकार को नहीं मानते थे. साथ ही संविधान को भी नागरिक विरोधी मानते थे और उनका सपना देश में अपनी जनताना सरकार स्थापित करना था. लेकिन वक्त के साथ नक्सल संगठन कमजोर हुए, तो उन्हें झुकना ही पड़ा. आखिर में अपनी पहचान के लिए वो दस्तावेज बने, जिसका विरोध उन्होंने जिदंगी भर किया. बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने लोकल 18 से बातचीत में कहां कि इतने दिनों तक मध्य प्रदेश शासन की सरेंडर पॉलिसी का फायदा पहुंचाने के लिए उनके गृह राज्य के साथ समन्वय बिठाकर दस्तावेज बनवाए गए. इसमें उनके बैंक अकाउंट खोले गए, पैन कार्ड और आधार कार्ड भी बनवाया गया. वहीं, सबसे खास बात ये है कि जो नक्सली कभी चुनाव का विरोध करते थे, उनके वोटिंग कार्ड भी बनवाए गए.
नक्सलियों को मिली स्वरोजगार की ट्रेनिंग
नक्सलियों ने सरेंडर होने के बाद अपने जीवन को जीने के लिए कुछ काम सीखने की इच्छा जाहिर की थी. ऐसे में बालाघाट पुलिस ने उन्हें सिलाई की ट्रेनिंग भी दी थी. इसके कुछ ने ड्राइविंग की इच्छा जाहिर की थी, उन्हें ड्राइविंग भी सिखाई गई. पुलिस ने बताया कि उन्हें पुलिस निगरानी के दौरान प्राथमिक शिक्षा भी दी गई ताकि वह सम्मानजनक जीवन जी सके.
बीजापुर के सबसे ज्यादा नक्सली
बालाघाट में सरेंडर हुए नक्सलियों में सबसे ज्यादा सात नक्सली छत्तीसगढ़ के सात नक्सली है. इसमें सबसे पहले सरेंडर करने वाली सुनीता ओयाम है. इसके अलावा जयशीला, जरीना, शिल्पा, समरर, सलिता और रोहित शामिल है. सभी पर 14 -14 लाख रुपए का इनाम था. फिर छत्तीसगढ़ के सुकमा के रहने वाले सुरेंद्र जिस पर 77 लाख रुपए का इनाम था. वह के बी डिवीजन का प्रमुख भी था. इसके अलावा नवीन, विक्रम भी शामिल है. महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से दो नक्सलियों को भी उनके गृह राज्य भेजा जा चुका है. बालाघाट पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा का कहना है कि रिहा होने के बाद भी उनकी गतिविधियों पर निगरानी रहेगी. ताकि कभी फिर से ऐसी समस्याएं खड़ी न हो सके.