सौ बात की एक बात ये कि पाकिस्तान से एक ऐसी ख़बर आ रही है जो असल में इसी बात पर सवाल उठा रही है कि पाकिस्तान बना ही क्यों था? सीधा देखने में भले ही ऐसा ना लगे, लेकिन मूल सवाल वही है. ख़बर ये आ रही है कि आसिम मुनीर पाकिस्तान के प्रांतों को तोड़कर छोटे-छोटे नए प्रांत बनाने की तरफ़ बढ़ रहे हैं. लेकिन वो ऐसा क्यों करना चाहते हैं ये समझने वाली बात है. ये तो शायद यहां की पब्लिक जानती है कि पाकिस्तान में चार प्रांत हैं. पंजाब, सिंध, ख़ैबर पख़्तूख़्वा और बलूचिस्तान. ये कहा जा रहा है कि वहां के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर चाहते हैं कि इन चारों को तोड़कर 12 से 15 छोटे-छोटे प्रांत बना दिए जाएं.
ये ख़बरें और अटकलें वहां छाई हुई हैं. मशहूर अंतर्राषेट्रीय मैगज़ीन ने भी इसपर रिपोर्ट छापी है. तमाम विश्लेषण हो रहे हैं, कई जगह विरोध की भी आवाज़ें आ रही हैं. ख़ासकर सिंध में, क्योंकि वहां के लोग कह रहे हैं कि कराची और हैदराबाद को ही सिंध से अलग कर देंगे तो सिंध फिर सिंध ही नहीं रहेगा. लेकिन शायद यही तो पाकिस्तान की हुकूमत चाहती है कि बलूचिस्तान बलूचिस्तान ना रहे, सिंध सिंध ना रहे, ख़ैबर ख़ैबर ना रहे. पंजाब का मामला अलग है क्योंकि बाक़ी तीन प्रांत तो यही इल्ज़ाम लगाते हैं कि सब कुछ तो पंजाब ही कंट्रोल करता है.
कहने को तो दलील ये दी जा रही है कि ये चार प्रांत इतने बड़े हैं कि प्रशासन ठीक से नहीं चल पाता. मतलब छोटे-छोटे प्रांत रहेंगे तो प्रशासन बहतर होगा. लेकिन असल वजह सिर्फ़ ये है या कुछ और है? यहां की पब्लिक तो ये भी सोच सकती है कि उनका मसला वो जानें, हमें उससे क्या, हमारे पास अपने कम मसले थोड़े ही हैं कि ये देखते फिरें कि पाकिस्तान अपने प्रांतों में क्या कर रहा है. लेकिन ये समझना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जब-जब वहां के अंदरूनी हालात ख़राब होते हैं, ये भी देखा गया कि उनकी सेना अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए यहां पर ख़ुराफ़ात करने लगते हैं.
ये तो अब पूरी दुनिया समझ चुकी है कि पाकिस्तान की हुकूमत का मतलब होता है वहां की सेना. असली हुकूमत वहां की फ़ौज के हाथ में ही होती है ऐसा निज़ाम रहा है पाकिस्तान में शुरू से. तो उनके चार प्रांतों के बारे मे तो यहां पब्लिक जानती है. लेकिन और थोड़ा जानने की ज़रूरत है पाकिस्तान के बारे में. पंजाब चार प्रांतों में एक प्रांत है वहां का लेकिन पाकिस्तान की लगभग आधी आबादी पंजाब में रहती है और बाक़ी आधी बाक़ी तीन प्रांतों में रहती है. टोटल 25 करोड़ लोग हैं पाकिस्तान में लगभग. 12-13 करोड़ पंजाब में रहते हैं. 6 करोड़ रहते हैं सिंध में. 4 करोड़ ख़ैबर में. और नक़्शे पर सबसे बड़ा जो दिखता है बलूचिस्तान, उसमें रहते हैं मुश्तिल से 1.5 करोड़ लोग. यानी पंजाब ही आधा पाकिस्तान है जनसंख्या के हिसाब से. और पंजाब कंट्रोल करता है बाक़ी तीनों प्रांतों को. और उन तीनों में विद्रोह होता रहता है ये ख़बरें तो आप देखते ही रहते हो.
चारों प्रांतों की भाषा अलग-अलग है. ख़ैबर में पश्तो है, पंजाब में पंजाबी है, सिंध में सिंधी है और बलूचिस्तान में बलूची है. ये चार मुख्य भाषाएं हैं और कुछ और भाषाएं हैं जो थोड़े-थोड़े इलाक़े में बोली जाती हैं लेकिन मुख्य तौर पर चार प्रांतों की चार भाषाएं हैं. और चारों प्रांतों की संस्कृति अलग-अलग है. ये विद्रोह जो होते रहते हैं अलग-अलग प्रांतों में ये तब से हो रहे हैं जबसे पाकिस्तान बना है. और आसिम मुनीर जो इन प्रांतों तो तोड़ने का प्लैन बना रहे हैं.
इसका मतलब है कि सेना को अब ख़तरा साफ़ दिखाई दे रहा है कि पाकिस्तान को एक रखना मुश्किल होता जा रहा है. इस्लाम के नाम पर देश तो बना दिया, लेकिन धर्म कोई देश का आधार नहीं हो सकता ये बार-बार साबित हो रहा है. जिन्नाह की टू-नेशन थ्योरी को मुनीर भी बार-बार गाते रहते हैं. लेकिन यही उनका डर भी दिखा रहा है. टू-नेशन थ्योरी की धज्जियां तो 1971 में ही उड़ गई थीं जब बांग्लादेश अलग हो गया था पाकिस्तान से. पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली लोगों ने अपने आप को सिर्फ़ इस्लाम के नाम पर बाक़ी चार प्रांतों के साथ माना ही नहीं.
पहले ये 5 प्रांत थे, 5 भाषाएं थीं, बंगाली अलग हो गए. यही मुनीर का सबसे बड़ा डर है. जब वो ख़ैबर में विद्रोह देखते हैं, सिंध में विद्रोह देखते हैं, बलूचिस्तान में विद्रोह देखते हैं तो उनको बांग्लादेश का अलग होना ही याद आता है. जिन्नाह ने पांच अलग-अलग प्रांतों का एक देश तो बना दिया ये कह कर कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग हैं. लेकिन वो मुसलमान भारत अलग हो कर भी ख़ुद एक कहां हो पाए? वो बंगाली हो गए, पठान हो गए, पंजाबी हो गए, सिंधी हो गए, बलोच हो गए. जिन्नाह के टाइम से ये चला आ रहा है.
ऐसे-ऐसे नारे बनाए गए ताकि पाकिस्तान के लोग इस्लाम के नाम पर एक रहें. नारा लगवाते रहे लोगों से कि पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह. लेकिन ये उन लोगों की भाषा ही नहीं थी. तो जिन्नाह ने क्या किया? जिन्नाह ने पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा कौन सी बना दी? उर्दू बना दी. वो उर्दू जो दिल्ली-यूपी की भाषा थी, वो उन लोगों पर थोप दी जिनकी वो भाषा ही नहीं थी. बंगालियों को बोला कि उर्दू बोलो, पंजाबियों को बोला कि उर्दू बोलो, सिंधियों को बोला कि उर्दू बोलो, पश्तूनों को बोला कि उर्दू बोलो, बलोचों को बोला कि उर्दू बोलो. सब ऑफ़िशियल काम कर दिया उर्दू में. फ़ायदा किसका हुआ? उनका जो दिल्ली, यूपी, बिहार, मध्य भारत से पाकिस्तान गए थे. सरकारी प्रशासन पर उनका क़ब्ज़ा हो गया. क्योंकि उनकी तो भाषा ही उर्दू थी. तो क्या भाषा एक कर देने से पाकिस्तान एक हो गया? बंगालियों ने सबसे पहले विद्रोह कर दिया.
जिन्नाह तो पाकिस्तान बनने के बाद ज़्यादा दिन तक रहे नहीं. लेकिन ये चिंगारी सुलगती रही. तो फिर पाकिस्तान ने क्या किया? भारत ने आप जानते ही हो भाषाओं के आधार पर राज्य बना दिये थे यहां पर. ताकि एक संस्कृति के लोगों का, एक भाषा के लोगों का एक राज्य हो. पाकिस्तान ने इसका उल्टा कर दिया. 1955 में पाकिस्तान ने सारे अपने प्रांत ही ख़त्म कर दिए. कि कोई बंगाल, कोई फ़्रंटियर नहीं, कोई पंजाब नहीं, कोई बलूचिस्तान नहीं, कोई सिंध नहीं. सब पाकिस्तान है. सब मुसलमान हैं, सब पाकिस्तानी हैं. और सारा आधिकारिक काम उर्दू में होगा. तो क्या हुआ? वो चिंगारी बुझी नहीं.
पूर्वी पाकिस्तान में तो वो ऐसी आग बन गई कि आख़िर 1970 आते-आते पाकिस्तान समझ गया कि ऐसे एक भाषा एक संस्कृति सब पर नहीं थोप सकते. 1970 में सब प्रांत फिर से बना दिए. लेकिन देर हो चुकी थी। 1971 में बांग्लादेश आख़िर अलग ही हो गया. अब बचा वो पाकिस्तान जो आज हमें नक़्शे पर दिखता है. और फिर वहां अलग-अलग विद्रोह हो रहे हैं. और फिर चिंगारी आग में बदल सकती है ये आसिम मुनीर को दिख रहा है. तो 1995 में सारे प्रांत ख़त्म कर के तो पाकिस्तान देख चुका. उससे तो लोगों ने माना नहीं था कि वो सिंधी नहीं हैं, बलोच नहीं हैं. तो अबकी बार दूसरा फॉर्मुला प्लैन कर रहे हैं मुनीर. कि चारों प्रांतों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दो. फिर कोई एक सिंध नहीं रहेगा, कोई एक बलूचिस्तान नहीं रहेगा, कोई एक ख़ैबर नहीं रहेगा. तो विद्रोह को कुचल देंगे. लेकिन सिंध एक नहीं रहेगा तो क्या सिंधी एक नहीं रहेंगे? ख़ैबर एक नहीं रहेगा तो क्या पश्तून एक नहीं रहेंगे? बलूचिस्तान एक नहीं रहेगा तो क्या बलोच एक नहीं रहेंगे? या पाकिस्तान ही एक नहीं रहेगा.
दुनिया देख रही है कि सिर्फ़ धर्म के नाम पर कोई देश आर्टिफ़िशियल तरीक़े से बनाया जा सकता है क्या? ईरान में इस्लाम ना हो तो लोग तो ईरानी रहेंगे. अफ़ग़ानिस्तान में अगर इस्लाम ना हो तो लोग अफ़ग़ान रहेंगे. अरब में अगर इस्लाम ना हो तो लोग तो अरब रहेंगे. पाकिस्तान में अगर इस्लाम ना हो तो लोग क्या कहलाएंगे? ये है मुनीर का सबसे बड़ा ख़ौफ़. इसलिए टुकड़े-टुकड़े करने चले हैं पाकिस्तान के. धर्म के नाम पर नहीं जोड़ कर रख पा रहे. जिन्नाह की टू-नेशन थ्योरी की धज्जियां उड़ चुकी हैं. सौ बात की एक बात.