नई दिल्ली: खगोलविदों ने एक बेहद दुर्लभ और हैरान करने वाली घटना दर्ज की है. वैज्ञानिकों को अपनी मूल गैलेक्सी के केंद्र से 1000 पारसेक से भी अधिक दूरी पर भटक रहा एक विशाल ब्लैक होल मिला है. इस भटकते हुए ब्लैक होल के पास जब एक बदकिस्मत तारा पहुंचा, तो उसने उसे खींचकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया. इस पूरी घटना को वैज्ञानिकों ने टीडीई 2023एमएफएम नाम दिया है. तारे के इस तरह नष्ट होने की प्रक्रिया को टाइडल डिसरप्शन इवेंट (TDE) कहा जाता है. इस घटना को सबसे पहले जेडटीएफ सर्वे ने पकड़ा था. इसके बाद हबल, स्विफ्ट, चंद्रा, केक और वीएलए जैसे दुनिया के कई शक्तिशाली टेलिस्कोपों से इसका अध्ययन किया गया.
गैलेक्सी के बीच में रहने वाले ब्लैक होल आखिर बाहर कैसे भटकने लगते हैं?
ब्रह्मांड में मौजूद अधिकांश विशालकाय ब्लैक होल अपनी गैलेक्सी के बिल्कुल मध्य भाग में डेरा जमाए रहते हैं. हाल के अध्ययनों में वैज्ञानिकों को ऐसे ब्लैक होल की एक नई आबादी मिली है. यह ब्लैक होल गैलेक्सी के केंद्र में रहने के बजाय उससे काफी दूर बाहरी हिस्सों में भटकते रहते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन ब्लैक होल के केंद्र से बाहर भटकने के कई कारण हो सकते हैं.
जब दो गैलेक्सी आपस में टकराती हैं, तो उनके केंद्र में मौजूद ब्लैक होल भी आपस में क्रिया करते हैं. इस दौरान पैदा होने वाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों के जोरदार झटके से ब्लैक होल बाहर फेंक दिया जाता है. कई बार तीन ब्लैक होल के आपसी टकराव में गुलेल की तरह एक ब्लैक होल बाहर छिटक जाता है.
इन भटकते हुए ब्लैक होल को खोजना बेहद मुश्किल काम होता है. जब तक वे किसी तारे या गैस को निगल नहीं रहे होते, उनसे कोई भी सिग्नल नहीं निकलता है.
गैलेक्सी के केंद्र से दूर तारे को निगल गया भटकता ब्लैक होल. (वीडियो : AI जेनेरेटेड)
टीडीई 2023एमएफएम घटना ने भटकते ब्लैक होल का राज कैसे खोला?
- शांत पड़े इन भटकते हुए ब्लैक होल की मौजूदगी तभी सामने आती है जब कोई तारा उनके गुरुत्वाकर्षण के जाल में फंस जाता है. जब कोई तारा इस दैत्य के बहुत करीब चला जाता है, तो ब्लैक होल उसे चीरकर मलबे की एक लंबी धारा में बदल देता है. इसे टाइडल डिसरप्शन इवेंट यानी टीडीई कहा जाता है.
- तारे के बिखरने से अलग-अलग वेवलेंथ में भारी मात्रा में चमक पैदा होती है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक इताई सफरादी के नेतृत्व में एक रिसर्च टीम ने इस चमक का बारीकी से अध्ययन किया है.
- शोधकर्ताओं ने ज्विकी ट्रांसिएंट फैसिलिटी, हबल स्पेस टेलिस्कोप और स्विफ्ट यूवीओटी की मदद से ऑप्टिकल और अल्ट्रावायलेट डेटा जुटाया. इसके साथ ही केक और लिक वेधशालाओं से स्पेक्ट्रोस्कोपी की गई. इसके अलावा चंद्रा, एक्सएमएम-न्यूटन और वेरी लार्ज एरे से रेडियो तरंगों की जांच भी की गई.
तारे के बिखरने की चमक और 20 हजार केल्विन तापमान का क्या गणित है?
वैज्ञानिकों ने जब इस घटना के प्रकाश के उतार-चढ़ाव की जांच की तो कई दिलचस्प आंकड़े सामने आए. ऑप्टिकल लाइट कर्व 30 दिनों के भीतर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद अगले 100 दिनों के दौरान यह रोशनी धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती चली गई.
शोधकर्ताओं ने इसके स्पेक्ट्रल एनर्जी डिस्ट्रीब्यूशन का सटीक मॉडल तैयार किया. इससे पता चला कि तारे से निकलने वाला प्रकाश अलग-अलग वेवलेंथ में किस तरह फैला हुआ था. ऑप्टिकल और अल्ट्रावायलेट किरणों के अध्ययन से तारे के मलबे का तापमान करीब 20,000 केल्विन आंका गया.
चमक चरम पर पहुंचने के एक महीने बाद भी यह मलबा इतना ही गर्म बना रहा. यह पूरी हिंसक घटना गैलेक्सी के केंद्र से 1.08 किलोपारसेक यानी करीब 3,500 प्रकाश वर्ष की दूरी पर हुई थी.
ऑप्टिकल, UV और रेडियो प्रकाश में TDE 2023mfm क्षेत्र के नजारे. बाईं ओर: दो फिल्टरों, F225W (नीला) और F625W (पीला) में हबल (HST/WFC3) की इमेज. ऊपर दाईं ओर: ‘वेरी लार्ज एरे’ (VLA) से 6 GHz पर ली गई रेडियो इमेज; इसे TDE से रेडियो उत्सर्जन शुरू होने से पहले, टेलीस्कोप के B-कॉन्फिगरेशन का यूज करके लिया गया था. नीचे दाईं ओर: उत्सर्जन शुरू होने के बाद उसी रेडियो बैंड की इमेज, जिसे A-कॉन्फिगरेशन का उपयोग करके लिया गया है. एक हीरे का निशान आकाशगंगा के केंद्र (न्यूक्लियस) को दर्शाता है और एक तारे का निशान TDE को; इनकी स्थिति HST F625W इमेज से ली गई है. (Image Credit: Itai Sfaradi et al., arXiv (2026). DOI: https://doi.org/10.48550/arXiv.2609.35998)
एक्स-रे टेलिस्कोप से इस भयानक घटना के कोई सीधे संकेत क्यों नहीं मिले?
- वैज्ञानिकों की टीम को इस टीडीई से सीधे तौर पर निकलने वाला कोई भी एक्स-रे उत्सर्जन नहीं मिला. हालांकि उस दिशा से एक बेहद धुंधला एक्स-रे स्रोत दर्ज किया गया था. जांच में पता चला कि यह सिग्नल टीडीई के बजाय गैलेक्सी के केंद्र में मौजूद न्यूक्लियस से आ रहा था.
- शुरुआती दौर में एक्स-रे न दिखना आम बात है, लेकिन बाद के समय में भी इसका न दिखना दुर्लभ माना जाता है. ऑप्टिकल टेलिस्कोप से खोजी गई करीब 40 प्रतिशत टीडीई घटनाओं में बाद में एक्स-रे की तेज चमक दिखाई देती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कोई अनसुनी बात नहीं है, क्योंकि कुछ घटनाएं सालों तक एक्स-रे में शांत रहती हैं.
- स्पेक्ट्रम में हाइड्रोजन की चौड़ी रेखाएं मिलने के कारण इसे टीडीई-एच श्रेणी में रखा गया है. वैज्ञानिकों ने तीन अलग-अलग तरीकों से इस ब्लैक होल का द्रव्यमान सूरज से 10 लाख से 1 करोड़ गुना अधिक तय किया है.
क्या दो गैलेक्सी की आपसी टक्कर की वजह से बाहर निकला यह ब्लैक होल?
वैज्ञानिकों ने इस बात की पड़ताल की कि इतना बड़ा ब्लैक होल गैलेक्सी के केंद्र से इतनी दूर कैसे पहुंचा.
- पहला कारण यह हो सकता है कि किसी छोटी गैलेक्सी की इस बड़ी गैलेक्सी के साथ टक्कर हुई हो. ब्लैक होल की जगह पर 1 करोड़ से 10 करोड़ सौर द्रव्यमान वाले तारों का एक छोटा झुंड मौजूद है. हालांकि यह झुंड ब्लैक होल के भारी वजन के मुकाबले काफी हल्का है.
- दूसरा सिद्धांत यह था कि तीन ब्लैक होल के टकराव में गुरुत्वाकर्षण तरंगों के झटके से यह बाहर फिंक गया हो. तीसरा विकल्प दो ब्लैक होल के आपस में विलय के बाद पैदा हुए झटके का था. लेकिन वैज्ञानिकों ने इन दोनों थ्योरी को खारिज कर दिया.
गैलेक्सी के मुख्य केंद्र में पहले से ही एक एक्टिव ब्लैक होल मौजूद है. इसका मतलब यह हुआ कि इस गैलेक्सी में दो अलग-अलग ब्लैक होल मौजूद हैं. इसी वजह से छोटी गैलेक्सी के टकराने का सिद्धांत सबसे ज्यादा सही बैठता है.
रेडियो तरंगों की 991 दिनों की खामोशी से क्या नया सवाल खड़ा हुआ है?
इस पूरे मामले में रेडियो तरंगों के डेटा ने वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा चौंकाया है. रेडियो टेलिस्कोप को घटना के बाद लंबे समय तक टीडीई 2023एमएफएम से कोई भी सिग्नल नहीं मिला. लगभग 991 दिन यानी 2.7 साल बीतने के बाद पहली बार एक बेहद कमजोर रेडियो सिग्नल पकड़ा गया.
इसके बाद भी रेडियो तरंगों की चमक बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी. यह घटना दिखने में दूसरी ऑफ-सेंटर घटना टीडीई 2024टीवीडी से काफी मिलती-जुलती थी, लेकिन रेडियो व्यवहार बिल्कुल उल्टा निकला. वैज्ञानिक अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वहां शुरुआत में गैस का बहाव नहीं था या गैस का घनत्व अलग था.
वैज्ञानिकों ने कहा, ‘यदि ऑफ-न्यूक्लियर टीडीई से रेडियो उत्सर्जन दर्ज होता है, तो इससे ब्लैक होल की पुष्टि होगी और दोनों ब्लैक होल के बीच की सटीक दूरी नापी जा सकेगी.’