20 एकड़ में खेती, खाद पर खर्च ₹0! किसान ने अपनाया ऐसा फार्मूला, बदली खेती
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Natural Farming Tips: रोहतास के किसान लालबाबू सिंह ने प्राकृतिक खेती अपनाकर खेती की लागत शून्य कर दी है. वे 20 एकड़ जमीन पर घर में तैयार जीवामृत और जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों का खर्च बचा है और मुनाफा बढ़ रहा है. उनके इस प्रयास के लिए उन्हें 15 पुरस्कार मिले हैं.
रोहतास: रोहतास जिले के मोथा गांव के रहने वाले किसान लालबाबू सिंह की जिंदगी एक आइडिया ने बदल दी. कभी रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर हजारों रुपये खर्च करने वाले लालबाबू आज घर में ही प्राकृतिक चीजों से खाद तैयार कर रहे हैं. इससे न केवल उनकी खेती की लागत कम हुई है बल्कि कीटनाशकों और खेतों में बार-बार खाद डालने पर होने वाला खर्च भी बच रहा है. प्राकृतिक खेती को अपनाकर वह अच्छी बचत कर रहे हैं. उनके इस प्रयास के लिए उन्हें अब तक 15 पुरस्कार भी मिल चुके हैं.
किसानों के सामने मुनाफा बचाने की चुनौती थी
लालबाबू सिंह पहले पारंपरिक तरीके से रासायनिक खेती करते थे. उनके पास करीब 20 एकड़ जमीन है. एक एकड़ खेत में केवल डीएपी खाद पर लगभग 2,000 रुपये खर्च होते थे. इस हिसाब से 20 एकड़ में एक फसल के लिए डीएपी पर ही करीब 40 हजार रुपये खर्च करने पड़ते थे. इसके अलावा कीटनाशकों और दूसरे रासायनिक उर्वरकों का खर्च अलग से होता था. इस तरह खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही थी. किसानों के सामने मुनाफा बचाने की चुनौती बनी हुई थी.
जीवामृत और अन्य प्राकृतिक मिश्रणों का इस्तेमाल
इसी बीच लालबाबू सिंह को प्राकृतिक खेती का विचार आया. उन्होंने इसके बारे में जानकारी जुटाई और प्रशिक्षण लेकर इस पद्धति को अपनाना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने रासायनिक खाद की जगह घर पर तैयार होने वाले जैविक मिश्रण का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आज स्थिति यह है कि वह खाद खरीदने पर होने वाले खर्च को काफी हद तक बचा रहे हैं. खेतों में उर्वरक के रूप में वह घन जीवामृत और अन्य प्राकृतिक मिश्रणों का इस्तेमाल करते हैं. जिन्हें घर में उपलब्ध चीजों से तैयार किया जाता है.
ऐसे तैयार करें जीवामृत
घन जीवामृत तैयार करने की विधि के बारे में लालबाबू सिंह ने Local18 से बातचीत में बताया कि इसके लिए सबसे पहले 100 किलोग्राम ताजा देसी गाय का गोबर लिया जाता है. इसके बाद इसमें तीन से चार किलोग्राम गोमूत्र, दो किलोग्राम गुड़, दो किलोग्राम बेसन और ऐसी जगह की एक किलोग्राम मिट्टी मिलाई जाती है. जहां पहले कभी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं किया गया हो. इन सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाकर तैयार मिश्रण को 15 दिनों तक छाया में रखा जाता है. इसके बाद यह मिश्रण खेतों में इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है. किसान इसका इस्तेमाल रासायनिक खाद के विकल्प के तौर पर कर रहे हैं.
लागत घटने से किसानों की बचत बढ़ेगी
लालबाबू सिंह के मुताबिक प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि खाद तैयार करने के लिए बाजार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. घर में उपलब्ध गोबर, गोमूत्र और दूसरी चीजों से खाद तैयार हो जाती है. जिससे उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है. उनका कहना है कि इस पद्धति को अपनाने से कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी बच रहा है. इसके साथ ही खेतों में बार-बार खाद डालने के लिए मजदूरों पर होने वाला खर्च भी कम हुआ है. इस तरह खेती की कुल लागत घटने से किसानों की बचत बढ़ रही है.
लालबाबू सिंह ने बताया कि किसानों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि रासायनिक खाद की तुलना में जैविक खाद के इस्तेमाल से फसल का उत्पादन कम होता है. हालांकि उनका अनुभव इससे अलग है. उनका कहना है कि सही प्रशिक्षण और उचित तरीके से प्राकृतिक खेती की जाए तो उत्पादन अच्छा मिल सकता है. उनके अनुसार उत्पादन के साथ-साथ खेती की लागत का आकलन करना भी जरूरी है. जब खाद कीटनाशक और मजदूरी पर होने वाला खर्च कम होता है तो किसान की कुल बचत बढ़ जाती है.