Afghanistan Drought Crisis : यहां बेटियां बेचकर राशन खरीदते हैं बाप, घर चलाने को एक-एक अंग भी बिकता है, कुदरत के कोड़े खाकर जिंदा रहते हैं लोग

Afghanistan Drought Crisis : यहां बेटियां बेचकर राशन खरीदते हैं बाप, घर चलाने को एक-एक अंग भी बिकता है, कुदरत के कोड़े खाकर जिंदा रहते हैं लोग


मजबूरी ऐसी कि एक बाप अपनी मासूम बेटी को बेच दे रहा है…ऐसी दर्दनाक कहानियां आपने पुराने जमाने की फिल्मों में देखी होंगी. आज के जमाने में भी ये भयानक दास्तान एक पूरे देश की कड़वी हकीकत बन चुकी है. एक अभागे देश पर कुदरत के दो ऐसे खौफनाक कोड़े पड़े हैं कि लोगों के लिए जिंदा रहना किसी भयानक टॉर्चर जैसा हो गया है. वहां समाज का कोई ताना-बाना नहीं बचा है, बल्कि इंसान की चीजों की तरह खरीदे-बेचे जा रहे हैं. हद तो तब हो जाती है जब अपनी नन्हीं बच्चियों का सौदा करना भी पेट भरने के लिए काफी नहीं पड़ता तो लोगों को जिंदा रहने के लिए शरीर के अंग तक बेचने पड़ रहे हैं.

कुदरत के कोड़े रोज झेलते हैं यहां के लोग

जलवायु परिवर्तन और भयानक सूखे की दोहरी मार झेल रहा अफगानिस्तान इन दिनों एक ऐसे खौफनाक मानवीय संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसने समाज के ताने-बाने को पूरी तरह तबाह कर दिया है. ये संकट केवल फसलों के बर्बाद होने या खेतों के सूखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे विकराल और भयानक असर देश की भावी पीढ़ी पर पड़ रहा है.

देश के उत्तर-पश्चिमी इलाके, खासकर बदगीस जैसे कृषि-प्रधान प्रांतों में हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि लोग दो वक्त की सूखी रोटी जुटाने, पुराने कर्जों को चुकाने और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अपनी ही मासूम बच्चियों का सौदा करने को मजबूर हो रहे हैं. ये स्थिति न केवल एक देश की तबाही को दर्शाती है, बल्कि इस बात का भी साफ सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग और अंतरराष्ट्रीय उपेक्षा मिलकर किसी समाज को किस कदर तबाह कर सकते हैं.

रेगिस्तान बनी जमीनें, किसानों के खेत तबाह

  • अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाकों में, खास तौर पर बदगीस प्रांत में, लगभग 95 प्रतिशत आबादी पूरी तरह से बारिश पर आधारित खेती और पशुपालन पर निर्भर करती है. लेकिन पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह से बिगड़ चुका है. एक के बाद एक लगातार कई सालों तक मानसून की बेरुखी और सूखे ने उपजाऊ जमीनों को बंजर रेगिस्तान में बदल दिया है.
  • जिन खेतों में कभी गेहूं और अन्य अनाज लहलहाते थे, वहां अब केवल धूल उड़ती दिखाई देती है. फसलों का उत्पादन पूरी तरह शून्य हो चुका है, जिससे किसानों की सालों की मेहनत और पूरा निवेश डूब गया. इसके साथ ही सूखे के कारण चारे और पानी की भारी कमी हो गई है. नतीजतन, मवेशी या तो भूख से तड़प-तड़पकर मर रहे हैं या फिर किसानों को उन्हें कौड़ियों के भाव बेचना पड़ रहा है.
  • जो पशु कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करते थे, अब उनका अस्तित्व ही खतरे में है. खेती और पशुपालन दोनों के ठप हो जाने से ग्रामीणों की आय का एकमात्र जरिया खत्म हो चुका है. परिवार पूरी तरह से पाई-पाई के मोहताज हो गए हैं और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज के दलदल में धंसते चले जा रहे हैं.

भुखमरी और गरीबी का दलदल: जब केवल जिंदा रहना ही लक्ष्य बन जाए

जब लगातार कई सालों तक कोई कमाई नहीं होती और घर में जमा अनाज का आखिरी दाना भी खत्म हो जाता है, तब भुखमरी अपना सबसे विकराल और भयावह रूप दिखाती है. अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाकों में आज भुखमरी कोई अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का एक कड़वा और खौफनाक सच बन चुकी है. परिवार अब केवल किसी तरह सांसें चलाने के लिए जंगलों में उगने वाले जंगली पौधों को उबालकर खाने या सूखी रोटियों और चाय पर दिन बिताने को मजबूर हैं.

चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी तक खरीदने के पैसे नहीं हैं, इसलिए सड़कों से बीना हुआ कचरा और प्लास्टिक जलाकर खाना पकाया जा रहा है. भुखमरी के साथ-साथ बीमारियां भी तेजी से फैल रही हैं. कुपोषण, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए लोगों के पास फूटी कौड़ी भी नहीं है. अस्पताल जाने का किराया जुटाना भी इन परिवारों के लिए पूरी तरह नामुमकिन सा हो गया है. जब परिवार के सामने केवल दो ही रास्ते बचते हैं, या तो पूरा परिवार भूख से तड़पकर मर जाए या फिर किसी एक सदस्य का सौदा करके बाकी सदस्यों की जान बचाई जाए, तब लाचार मां-बाप वो कदम उठाने पर मजबूर होते हैं जिसकी कल्पना भी सामान्य दुनिया में नहीं की जा सकती.

बाल विवाह का भयानक ट्रेंड: सामाजिक और कानूनी व्यवस्था की विफलता

  1. अफगानिस्तान में बाल विवाह की परंपरा कोई नई नहीं है, लेकिन वर्तमान आर्थिक और जलवायु संकट ने इसे एक क्रूर व्यापारिक रूप दे दिया है. इसे अब परंपरा नहीं, बल्कि ‘आर्थिक अस्तित्व की रणनीति’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.
  2. लड़कियों की शादी के नाम पर मिलने वाली रकम (ब्राइड प्राइस) अब कर्ज चुकाने और राशन खरीदने का एकमात्र जरिया बन चुकी है. ये रकम किस्तों में तय होती है और सैकड़ों से लेकर हजारों डॉलर तक हो सकती है. सबसे चिंताजनक बात ये है कि इस सौदेबाजी में बच्चियों की उम्र का कोई लिहाज नहीं रखा जाता.
  3. दो साल, पांच साल, सात साल या ग्यारह साल की मासूम बच्चियों की सगाई अधेड़ उम्र के पुरुषों, दुकानदारों या कर्जदाताओं से कर दी जाती है. देश में बाल विवाह को रोकने के लिए कोई सख्त कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है. शासन और प्रशासन की बेरुखी के कारण ये अवैध और अमानवीय प्रथा खुलेआम जारी है.

गांवों से शरणार्थी शिविरों तक का दुखद सफर

  • गांवों में जब स्थिति पूरी तरह से बेकाबू हो जाती है तो लोग अपने पुश्तैनी मकानों और जमीनों को छोड़कर शहरों का रुख करते हैं. लेकिन ये विस्थापन उनके लिए कोई राहत लेकर नहीं आता, बल्कि समस्याओं का एक नया बवंडर खड़ा कर देता है.
  • बदगीस की राजधानी काला-ए-नौ और हेरात जैसे बड़े शहरों के बाहरी इलाकों में बने अस्थायी शरणार्थी शिविरों में लाखों लोग तंबू डालकर रह रहे हैं. इन शिविरों में न तो पीने का साफ पानी है, न शौचालय और न ही ठंड या गर्मी से बचने के इंतजाम.
  • शहरों में भी काम के अवसर न के बराबर हैं. विस्थापित लोग दिनभर कचरे के ढेरों से प्लास्टिक और बोतलें चुनकर या भीख मांगकर रोज के 50 से 100 रुपये ही कमा पाते हैं.
  • गरीबी का आलम ये है कि केवल बच्चियों को बेचना ही काफी नहीं पड़ रहा, बल्कि लोग अपने परिवार को पेट भरकर खाना खिलाने या बीमार बच्चों का इलाज कराने के लिए अपने शरीर के अंग तक बेचने को मजबूर हो रहे हैं.

बाल वधुओं का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक भविष्य

कम उम्र में शादी के बंधन में धकेली जाने वाली इन बच्चियों पर इसका असर केवल आज नहीं, बल्कि उनकी आने वाली पूरी जिंदगी पर पड़ता है. ये उनके मौलिक अधिकारों का सबसे बड़ा हनन है.

कम उम्र में गर्भधारण के कारण इन बच्चियों की जान हमेशा खतरे में रहती है. अफगानिस्तान में पहले से ही मातृत्व मृत्यु दर दुनिया में सबसे खराब स्तर पर है और बाल विवाह इस खतरे को कई गुना बढ़ा देता है. जब एक बच्चा, जिसे खुद देखभाल की जरूरत होती है, उसे पूरे घर को संभालने का काम सौंप दिया जाता है, तो नाकामी की सूरत में उसे भयंकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना सहनी पड़ती है.

ससुराल वालों और उम्रदराज पतियों द्वारा हिंसा आम बात है. सगाई या शादी होते ही बच्चियों को स्कूलों से हटा दिया जाता है. शिक्षा से दूर होने के कारण वे जीवनभर इस गरीबी और निर्भरता के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पातीं.

अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता में कटौती और वैश्विक उदासीनता

इस पूरे संकट को और अधिक भयावह बनाने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की घटती रुचि और मानवीय सहायता में भारी कटौती ने बड़ी भूमिका निभाई है.

वैश्विक राजनीतिक बदलावों और प्राथमिकताओं के बदलने के कारण अफगानिस्तान को मिलने वाली विदेशी सहायता और एनजीओ (NGO) की फंडिंग में भारी गिरावट आई है. वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मुताबिक, सहायता राशि घटने के कारण उन अस्पतालों, क्लिनिकों और बाल-संरक्षण कार्यक्रमों को बंद करना पड़ रहा है, जो इन बच्चियों और कुपोषित बच्चों को सुरक्षा प्रदान करते थे.

ये एक बड़ा विरोधाभास है कि अफगानिस्तान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में न के बराबर योगदान देता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के सबसे भयंकर दुष्परिणामों को भुगतने वाले देशों में सबसे आगे है. विकसित देशों द्वारा जलवायु क्षतिपूर्ति न मिलना इस संकट को और बढ़ा रहा है.



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