भारत में आजतक केवल 1 महिला को फांसी की मिली सजा, क्या था 70 साल वो पुराना दहलाने वाला कांड?

भारत में आजतक केवल 1 महिला को फांसी की मिली सजा, क्या था 70 साल वो पुराना दहलाने वाला कांड?


नीले ड्रम कांड से चर्चा में आई मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है. पति सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या करने के बाद टुकड़े कर ड्रम में बंद करने वाली मुस्कान को मृत्युदंड मिलना चर्चा के केंद्र में है. भारत के न्यायिक इतिहास में जब भी मौत की सजा यानी फांसी का जिक्र होता है, तो अमूमन पुरुष अपराधियों के ही मामले सामने आते हैं. लेकिन पिछले कुछ समय से देश की अलग-अलग अदालतों की तरफ से महिलाओं को भी गंभीर और जघन्य अपराधों में मृत्युदंड सुनाए जाने के मामलों ने सबका ध्यान खींचा है. अब मेरठ के नीले ड्रम मर्डर केस में मुस्कान और साहिल को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है. इसके बाद से यह बहस फिर छिड़ गई है कि आजाद भारत में अब तक कुल कितनी महिलाओं को फांसी के फंदे पर लटकाया गया है? ऐतिहासिक रतनबाई कांड की चर्चा भी होने लगी है.

कानूनी एक्सपर्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आंकड़ों के अनुसार आजाद भारत के इतिहास में अब तक केवल एक ही महिला को न्यायिक प्रक्रिया के तहत सच में फांसी की सजा दी गई है. जी हां, साल 1947 में देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक के इतिहास में केवल रतनबाई जैन ही वह इकलौती महिला हैं, जिन्हें कानूनन फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. उनकी यह सजा 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में पूरी की गई थी.

भारत में अब तक कितनी महिलाओं को फांसी दी गई है?
वैसे तो निचली अदालतों और हाई कोर्ट की तरफ से पिछले सात दशकों में शबनम अली, रेणुका शिंदे और सीमा गावित समेत कई महिलाओं को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है. इनमें से कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट या तो सजा उम्रकैद में बदल चुका है या फिर दया याचिकाएं पेंडिंग होने या फिर कानूनी प्रक्रियाओं के चलते वे आज भी मृत्युदंड की कोठरी में बंद हैं. साल 2026 की बात करें तो देश में 571 लोग अभी डेथ रो पर हैं. इनमें से 21 महिलाएं हैं.

रतनबाई का कांड क्या था? उसने क्या किया था?
अभी तक केवल रतनबाई जैन ही एकमात्र ऐसा नाम है जो इस मुकाम तक पहुंच सका है. रतनबाई जैन का मामला 1950 के दशक के शुरुआती कुछ साल का है. यह देश के शुरुआती सबसे सनसनीखेज और खौफनाक आपराधिक मामलों में गिना जाता है, जिसने उस समय के जूडिशल सिस्टम को झकझोर कर रख दिया था.

हत्याओं की खौफनाक स्क्रिप्ट
दस्तावेजों और उस दौर की न्यायिक रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली की रहने वाली रतनबाई जैन एक स्टरलिटी क्लीनिक में मैनेजर के तौर पर काम करती थीं. यह बांझपन और हेल्थ से जुड़ा सेंटर था. उसने शक और बदले की आग में यह कांड कर डाला था.

इस जघन्य कांड के पीछे की मुख्य वजह शक और अनैतिक संदेह था. मीडिया रिपोर्ट्स और अदालती ब्योरे के अनुसार, रतनबाई को अपनी ही क्लिनिक या आसपास काम करने वाली कुछ युवा लड़कियों और महिलाओं पर शक था कि उनके उसके पति के साथ अवैध संबंध हैं. इसी शक और बदले की भावना ने उसके मन में ऐसा जहर घोला कि उसने उन मासूमों की जान लेने की खौफनाक साजिश रच डाली.

रतनबाई ने बहुत ही शातिर तरीके से क्लीनिक में काम करने वाली तीन युवा लड़कियों और महिलाओं को निशाना बनाया. उसने सुनियोजित तरीके से साजिश रची. और उसी के तहत उनके खाने या पीने की चीजों में बहुत घातक और तेज जहर मिला दिया. जैसे ही उन तीनों लड़कियों ने जहरीला पदार्थ खाया या पिया, जहर के असर से उनकी तुरंत और तड़प-तड़प कर मौत हो गई. एक साथ तीन हत्याओं की इस घटना से पूरे दिल्ली शहर में सनसनी फैल गई थी.

गिरफ्तारी और अदालती कार्यवाही
इस घटना के तुरंत बाद पुलिस ने सतर्कता दिखाते हुए रतनबाई जैन को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में यह साबित हो गया कि हत्याएं किसी और ने नहीं बल्कि रतनबाई ने ही अपने हाथों से जहर मिलाकर की थीं. निचली अदालत ने सबूत और गवाहों के आधार पर इस अपराध को रेयरेस्ट ऑफ रेयर कैटिगरी माना है.

अदालत ने 35 साल की रतनबाई को तीन-तीन हत्याओं के इल्जाम में दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई. हाई लेवल पर तमाम कानूनी पहलुओं और अपीलों पर विचार करने के बाद उनकी दया याचिका खारिज कर दी गई.

फांसी पर लटकाए जाने की तारीख
3 जनवरी 1955 का दिन आजाद भारत के जूडिशल इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ. उस दिन दिल्ली की तिहाड़ जेल के अंदर कड़ी सुरक्षा के बीच रतनबाई जैन को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया. वह देश के इतिहास में मौत की सजा पाने और फंदे पर लटकने वाली पहली महिला बनीं.

रतनबाई जैन का यह मामला इस बात का गवाह है कि जघन्य अपराधों में कानून लिंग के आधार पर भेद नहीं करता. हालांकि वर्तमान सीनेरियो में भले ही निचली अदालतें शबनम या अन्य कुख्यात मामलों में महिलाओं को मौत की सजा सुनाती रही हैं, पर कानूनी दांव-पेच, लंबी दया याचिकाओं और मानवाधिकारों की बहसों के कारण 1955 के बाद से आज तक किसी अन्य महिला को वास्तविक रूप से फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचाया जा सका है. अब नजरें मुस्कान रस्तोगी केस पर टिकी है.



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