धान की कटाई के बाद पराली को बेकार समझने की न करें गलती, पहाड़ी किसानों की तरह आप भी उठाएं जबरदस्त फायदा

धान की कटाई के बाद पराली को बेकार समझने की न करें गलती, पहाड़ी किसानों की तरह आप भी उठाएं जबरदस्त फायदा


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धान की कटाई के बाद पराली को बेकार न समझें, पहाड़ी किसानों की तरह उठाएं फायदा

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How to Store Paddy Straw: पहाड़ों में सर्दियों के दौरान हरे चारे की कमी पशुपालकों के लिए परेशानी बन जाती है. ऐसे में धान की कटाई के बाद बचने वाली पराली गाय, भैंस और बैलों के चारे के काम आती है. उत्तराखंड के बागेश्वर में किसान पराली को फेंकने या जलाने के बजाय उसे सुखाकर गठरियों में रखते हैं. वहीं, कुछ जगहों पर इसे शंकु के आकार के लूटे बनाकर सुरक्षित किया जाता है, ताकि बारिश और जमीन की नमी से इसे बचाया जा सके. स्थानीय किसान रमेश कृषक पांडे ने पराली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के पारंपरिक तरीकों के बारे में बताया है, जिनसे सर्दियों में पशुओं के लिए सूखे चारे का इंतजाम किया जा सकता है.

How to Store Paddy Straw: पहाड़ों में सर्दियां शुरू होते ही पशुओं के लिए हरे चारे का इंतजाम करना किसानों के लिए मुश्किल हो जाता है. कई गांवों में ठंड के मौसम में हरी घास कम मिलती है. ऐसे में किसान धान की कटाई के बाद बचने वाली पराली को संभालकर रखते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर इसे पशुओं को खिलाया जा सके. इसके लिए पहाड़ों में किसान आज भी पुराने तरीके अपनाते हैं. कहीं पराली को सुखाकर गठरियां बनाई जाती हैं, तो कहीं इसे खास आकार में जमा करके रखा जाता है.

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में खेती के साथ पशुपालन भी ग्रामीणों की आजीविका का अहम हिस्सा है. ऐसे में पशुओं के लिए पूरे साल चारे का इंतजाम करना जरूरी होता है. पराली को बेकार समझकर फेंकने या जलाने के बजाय सही तरीके से सुरक्षित रखा जाए, तो इसका इस्तेमाल सूखे चारे के रूप में किया जा सकता है. इससे फसल के अवशेष भी काम आते हैं और पशुओं के लिए चारे का इंतजाम करने में मदद मिलती है.

पराली को सुखाकर गठरियों में करते हैं सुरक्षित
स्थानीय किसान रमेश कृषक पांडे बताते हैं कि पहाड़ों में मौसम जल्दी बदलता है. बारिश, ओस और जमीन की नमी के कारण पराली के खराब होने का खतरा रहता है. इसलिए धान की कटाई के बाद पराली को अच्छी तरह सुखाया जाता है. इसके बाद इसकी गठरियां बनाकर किसी सूखी और हवादार जगह पर रख दिया जाता है. इसके लिए किसान टिनशेड, छत वाले बरामदे या ऐसी जगह का इस्तेमाल करते हैं, जहां बारिश का पानी सीधे न पहुंचे. पराली को जमीन पर रखने के बजाय लकड़ी के तख्तों या किसी ऊंचे सूखे आधार पर रखना बेहतर होता है. इससे जमीन की नमी से बचाव होता है. जरूरत पड़ने पर इसे तिरपाल से भी ढका जा सकता है, लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि अंदर नमी जमा न हो. अगर पराली में फफूंद लग जाए या सड़न दिखाई दे, तो उसे पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए.

शंकु के आकार में बनाते हैं पराली के लूटे
पहाड़ के गांवों में पराली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का एक पारंपरिक तरीका लूटे बनाना भी है. इसमें सूखी पराली को एक जगह शंकु के आकार में जमाया जाता है. इसे इस तरह बनाया जाता है कि बारिश का पानी ऊपर से नीचे बह जाए और पराली के अंदर न पहुंचे. इसके लिए ऐसी जगह चुनी जाती है, जहां पानी जमा होने की आशंका कम हो. साथ ही, पराली को जमीन की नमी से बचाना भी जरूरी है. सही तरीके से रखी गई पराली को जरूरत के हिसाब से निकालकर पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

हरी घास में मिलाकर भी खिलाते हैं पराली
पशुपालक सूखी पराली को कई बार हरी घास के साथ मिलाकर भी पशुओं को खिलाते हैं. इससे उपलब्ध चारे का इस्तेमाल करने में मदद मिलती है. हालांकि, पराली को पशुओं के आहार का एकमात्र हिस्सा नहीं बनाना चाहिए. पशुओं की जरूरत के हिसाब से संतुलित आहार देना जरूरी है. इस तरह पहाड़ों में अपनाए जाने वाले ये पारंपरिक तरीके सर्दियों के लिए चारा बचाकर रखने में मदद करते हैं. पराली को जलाने या फेंकने के बजाय सुरक्षित रखने से फसल के अवशेषों का इस्तेमाल भी हो जाता है और पशुओं के लिए सूखे चारे का इंतजाम भी किया जा सकता है.



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