Falkland Islands : जुड़वा-भाइयों जैसी दिखने वाली जमीनें, पेट में छुपाए तेल-गैस का महा-खजाना, हड़पने को लड़े-मरे जा रहे 2 देश

Falkland Islands : जुड़वा-भाइयों जैसी दिखने वाली जमीनें, पेट में छुपाए तेल-गैस का महा-खजाना, हड़पने को लड़े-मरे जा रहे 2 देश


दक्षिण अटलांटिक महासागर के ठंडे पानी में तैरते द्वीप दूर से देखने पर बिल्कुल जुड़वा भाइयों जैसे नजर आते हैं. बाहर से बेहद शांत और खूबसूरत दिखने वाली इस जमीन के पेट में तेल और प्राकृतिक गैस का ऐसा महा-खजाना छुपा है, जिसे कब्जाने के लिए दुनिया के दो बड़े मुल्क आपस में भिड़ गए हैं. इस जमीन को हड़पने की जंग कोई नई नहीं, बल्कि दशकों पुरानी है जिसमें अब एक बार फिर से आग भड़क गई है. एक तरफ से खुलेआम धमकियां और तीखे बयान दिए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ समंदर की लहरों के बीच खतरनाक मिलिट्री ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है. ऐसा लग रहा है कि अटलांटिक का ये खूबसूरत कोना बहुत जल्द किसी बड़ी जंग की आग में झुलसने वाला है.

फॉकलैंड आइलैंड्स पर छिड़ी ब्रिटेन और अर्जेंटीना की जंग

दशकों पुराने इस विवाद के सेंटर में फॉकलैंड आइलैंड्स हैं, जहां ब्रिटेन और अर्जेंटीना आमने-सामने आ चुके हैं और दोनों देशों के बीच तनाव अचानक अपने चरम पर पहुंच गया है. जियोपॉलिटिक्स में आई इस बड़ी हलचल के पीछे अर्जेंटीना के नए राष्ट्रपति जेवियर माइली के वो तीखे बयान हैं, जिनके बाद ब्रिटेन तुरंत अलर्ट मोड में आ गया है. बिगड़ते माहौल को देखते हुए 100 से ज्यादा ब्रिटिश सैनिकों ने फॉकलैंड्स में री-कैप्चर की स्पेशल ट्रेनिंग शुरू कर दी है. ये पूरा घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि 1982 की जंग भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन दोनों मुल्कों के बीच सुलगती आग आज भी ठंडी नहीं हुई है.

क्या है पूरा मामला और क्यों हो रही है सीक्रेट मिलिट्री ट्रेनिंग?

रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के 100 से अधिक सैनिकों ने स्थानीय रिजर्व सैनिकों के साथ मिलकर फॉकलैंड द्वीप समूह पर 6 दिनों की एक तगड़ी मिलिट्री एक्सरसाइज पूरी की है. ये ट्रेनिंग ठीक उसी तर्ज पर डिजाइन की गई थी, जैसे साल 1982 में अर्जेंटीना के आक्रमण के समय जमीनी हालात बने थे. इस एक्सरसाइज में सैनिकों ने लगभग 32 किलोमीटर यानी 20 मील की लंबी रात की पैदल यात्रा की और समंदर के रास्ते से जमीन पर उतरने वाली एम्फिबियस असॉल्ट की खतरनाक ड्रिल को अंजाम दिया.

कंपनी के कमांडिंग ऑफिसर मेजर ननकूंसिंग ने मीडिया को बताया कि इस मिलिट्री ट्रेनिंग का मकसद सैनिकों को अपने पुरखों के नक्शेकदम पर चलना सिखाना था. इसके जरिए वो समझ सके कि 1982 की लड़ाई में ब्रिटिश जवानों ने किन परिस्थितियों का सामना करके जीत हासिल की थी. सैनिकों को उसी कठिन माहौल में ढालने के लिए ये एक्सरसाइज कराई गई है ताकि भविष्य में किसी भी अचानक हमले का जवाब दिया जा सके.

अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली की धमकियों से भड़का ब्रिटेन

ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच ये खटास अर्जेंटीना के नए राष्ट्रपति जेवियर माइली के उन बयानों के बाद आई है, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर फॉकलैंड द्वीप समूह को अवैध विदेशी कब्जा करार दिया था. माइली ने सार्वजनिक मंचों पर यहां तक कह दिया था कि वो इस मामले को अपने हाथ में लेने से पीछे नहीं हटेंगे और अपनी जमीन वापस लेकर रहेंगे.

बात सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही. अर्जेंटीना ने फॉकलैंड द्वीप के आसपास समुद्र में तेल की ड्रिलिंग करने पर भी कई पाबंदियां लगाने का ऐलान कर दिया है. इसके अलावा वहां काम कर रही एक इजरायली एनर्जी कंपनी पर आपराधिक मुकदमे दर्ज करने की खुली धमकी भी दी है. अर्जेंटीना के इस बेहद आक्रामक और सख्त रुख ने लंदन में बैठे हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है और कूटनीतिक तनाव को काफी बढ़ा दिया है.

ब्रिटिश विदेश कार्यालय की मंत्री उमा कुमारन ने अर्जेंटीना के इन भड़काऊ बयानों की कड़े शब्दों में आलोचना की है. उन्होंने दो टूक चेतावनी देते हुए कहा है कि ब्रिटेन अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और फॉकलैंड की रक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा. उन्होंने साफ किया कि ब्रिटेन अर्जेंटीना की उन धमकियों का कड़ा और तुरंत जवाब देगा, जिनका मकसद वहां काम कर रहे कारोबारियों और कंपनियों में डर पैदा करना है. अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो ब्रिटेन सख्त और कानूनी कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है.

1982 की वो भीषण जंग, जब 900 से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई

फॉकलैंड आइलैंड्स को लेकर दोनों देशों का इतिहास बेहद खूनखराबे वाला रहा है. साल 1982 में अर्जेंटीना की सेना ने अचानक इन द्वीपों पर धावा बोलकर कब्जा करने की कोशिश की थी. इसके जवाब में ब्रिटेन ने अपनी नौसेना और थलसेना को मैदान में उतारा, जिसके बाद दोनों देशों के बीच 74 दिनों तक चलने वाला भीषण युद्ध छिड़ गया था.

उस युद्ध में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. युद्ध के दौरान लगभग 650 अर्जेंटीना के सैनिक और 255 ब्रिटिश जवान अपनी जान गंवा बैठे थे. इसके अलावा कई निर्दोष नागरिक भी मारे गए थे. अंत में ब्रिटिश सेना के आगे अर्जेंटीना को आत्मसमर्पण करना पड़ा और तभी से ब्रिटेन इन द्वीपों पर अपना प्रशासनिक और मिलिट्री कंट्रोल मजबूती से बनाए हुए है.

साल 2013 में फॉकलैंड्स में एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह भी कराया गया था. इसमें यहां रहने वाले 99.8 प्रतिशत लोगों ने भारी बहुमत से ब्रिटेन के साथ ही रहने के पक्ष में मतदान किया था. चौंकाने वाली बात ये थी कि कुल पड़े वोटों में से सिर्फ 3 वोट ही ब्रिटेन के खिलाफ गए थे. यही वजह है कि ब्रिटेन बार-बार दुनिया के सामने ये दोहराता है कि वो फॉकलैंड के आम नागरिकों के फैसले के अधिकार के साथ मजबूती से खड़ा है और उनकी मर्जी के बिना ये जमीन अर्जेंटीना को नहीं दी जा सकती.

स्थानीय लोगों को डराने-धमकाने का आरोप, ब्रिटेन ने शुरू की जांच

कूटनीतिक तनाव बढ़ने के बीच, ब्रिटेन की डाउनिंग स्ट्रीट ने ये भी बड़ा खुलासा किया है कि फॉकलैंड के स्थानीय निवासियों को अर्जेंटीना की तरफ से लगातार डराने-धमकाने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की शिकायतें मिल रही हैं. वहां के नागरिकों को निशाना बनाकर कई तरह के दबाव बनाए जा रहे हैं.

इस सेंसेटिव मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने इन आरोपों की हाई-लेवल जांच के कड़े आदेश जारी कर दिए हैं. डाउनिंग स्ट्रीट के आधिकारिक प्रवक्ता ने साफ किया है कि फॉकलैंड के आम नागरिकों को डराने या धमकाने की कोई भी कोशिश पूरी तरह से अस्वीकार्य है. ब्रिटेन अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठाएगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को जोर-शोर से उठाएगा.

भौगोलिक स्थिति और कूटनीतिक रूप से क्यों अहम हैं ये द्वीप?

फॉकलैंड द्वीप समूह भौगोलिक रूप से अर्जेंटीना के तट से महज कुछ सौ मील की दूरी पर स्थित है, जबकि ब्रिटेन यहां से करीब 12,000 किलोमीटर दूर है. अर्जेंटीना का तर्क है कि स्पेन से आजादी मिलने के बाद ऐतिहासिक और भौगोलिक आधार पर ये द्वीप उसकी संप्रभुता का हिस्सा है. अर्जेंटीना इसे मालविनास आइलैंड्स कहकर बुलाता है और इसे अपने राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर देखता है.

दूसरी तरफ ब्रिटेन का मानना है कि उसने 1833 से इस द्वीप पर लगातार शासन किया है और वहां की लगभग पूरी आबादी ब्रिटिश मूल की है. फॉकलैंड्स के पास मौजूद तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार, साथ ही दक्षिण अटलांटिक और अंटार्कटिका के पास इसकी रणनीतिक स्थिति इसे और भी ज्यादा कीमती बना देती है. दोनों ही देश इस तेल के खजाने से भरी जमीन को गंवाना नहीं चाहते.



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