Explainer: किसी जज, चुनाव आयुक्त या दूसरे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के रिटायर होने के बाद क्या वह तुरंत किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो सकता है? क्या वह चुनाव लड़ सकता है या सरकार में कोई नया पद संभाल सकता है? इन सवालों के जवाब में अक्सर ‘कूलिंग पीरियड’ यानी कुछ समय तक किसी खास पद या गतिविधि से दूर रहने की अनिवार्यता का जिक्र होता है लेकिन भारत में सभी संवैधानिक पदों के लिए एक जैसा नियम नहीं है. कुछ पदों के लिए संविधान में रिटायरमेंट के बाद दूसरी सरकारी नौकरी करने पर स्पष्ट रोक है, कुछ के लिए खास तरह की पाबंदियां हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के राजनीतिक पद स्वीकार करने पर कोई सामान्य, तय दो साल का कूलिंग पीरियड नहीं है.
केंद्र सरकार ने भी संसद में स्पष्ट किया है कि संविधान में रिटायरमेंट के बाद जजों की नियुक्ति के लिए कूलिंग पीरियड का कोई प्रावधान नहीं है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी रिटायर्ड जजों के राजनीतिक पद स्वीकार करने से पहले दो साल की अनिवार्य अवधि लागू करने की मांग वाली याचिका पर कानून बनाने का निर्देश देने से इनकार किया था.
कूलिंग पीरियड क्या होता है और इसकी जरूरत क्यों?
कूलिंग पीरियड का मतलब ऐसी निर्धारित अवधि से है जिसमें किसी व्यक्ति को अपनी पिछली जिम्मेदारी छोड़ने के बाद कोई खास नौकरी, पद या गतिविधि शुरू करने से रोका जाता है. इसका उद्देश्य हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकना और सरकारी संस्थाओं की निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा बनाए रखना है. उदाहरण के लिए अगर कोई अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान किसी कंपनी से जुड़े फैसले लेता है और रिटायर होने के तुरंत बाद उसी कंपनी में नौकरी करने लगता है तो सवाल उठ सकता है कि क्या उसने अपने कार्यकाल में उस कंपनी को कोई अनुचित फायदा पहुंचाया था. इसी तरह किसी जज के रिटायर होने के तुरंत बाद राजनीतिक या सरकारी पद स्वीकार करने पर भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर बहस होती है हालांकि यह समझना जरूरी है कि कूलिंग पीरियड हर पद के लिए अनिवार्य नहीं है. किसी पद पर क्या प्रतिबंध लागू होगा यह संविधान, संबंधित कानून और सेवा नियमों पर निर्भर करता है.
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के लिए क्या है नियम?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के मामले में सबसे ज्यादा चर्चा कूलिंग पीरियड को लेकर होती है. सवाल यह है कि क्या कोई जज रिटायर होने के तुरंत बाद राज्यपाल, सांसद या किसी अन्य राजनीतिक पद पर नियुक्त हो सकता है? इस मामले में भारतीय संविधान में रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक या कार्यकारी पद स्वीकार करने के लिए दो साल का कोई सामान्य अनिवार्य कूलिंग पीरियड तय नहीं किया गया है. दिसंबर 2024 में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में भी कहा था कि संविधान में जजों की रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति के लिए कूलिंग पीरियड का प्रावधान नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 124(7) में क्या है?
संविधान का अनुच्छेद 124(7) सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों के लिए एक खास प्रतिबंध लगाता है. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट का कोई रिटायर्ड जज भारत के किसी न्यायालय या प्राधिकरण के सामने वकालत या पैरवी नहीं कर सकता.इसी तरह अनुच्छेद 220 के तहत स्थायी हाई कोर्ट जज के रिटायर होने के बाद उसकी वकालत पर भी प्रतिबंध है. वह सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाई कोर्ट को छोड़कर भारत के दूसरे न्यायालयों या प्राधिकरणों के सामने वकालत या पैरवी नहीं कर सकता लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि ये प्रतिबंध राजनीतिक पद स्वीकार करने पर दो साल की रोक नहीं लगाते. वकालत पर लगी पाबंदी और राजनीतिक नियुक्ति पर कूलिंग पीरियड दो अलग-अलग विषय हैं.
रिटायर्ड जजों के लिए कूलिंग पीरियड लागू करने की मांग
साल 2023 में बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की थी कि संवैधानिक अदालतों के रिटायर्ड जजों को राजनीतिक पद या सरकार के विवेक पर मिलने वाले पद स्वीकार करने से पहले दो साल तक इंतजार करना चाहिए.इस मांग के पीछे तर्क था कि अगर कोई जज रिटायर होने के तुरंत बाद सरकार से जुड़ा पद स्वीकार करता है तो इससे उसकी पिछली न्यायिक भूमिका की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं हालांकि 6 सितंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि रिटायर्ड जज को कोई पद स्वीकार करना चाहिए या नहीं यह संबंधित जज के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए या इस विषय में कानून बनाया जाना चाहिए. अदालत ने इस मामले में खुद दो साल की अनिवार्य अवधि लागू करने का निर्देश नहीं दिया.इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि हर रिटायर्ड जज को राजनीतिक पद स्वीकार करने से पहले दो साल तक इंतजार करना ही पड़ता है.
CEC और EC के लिए क्या नियम है?
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्त (EC) स्वतंत्र संवैधानिक संस्था यानी चुनाव आयोग का हिस्सा होते हैं. उनकी जिम्मेदारी लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों की प्रक्रिया से जुड़े संवैधानिक कामों को संभालना है.चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है इनमें से जो पहले पूरा हो.
क्या चुनाव आयुक्त के लिए कूलिंग पीरियड है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए द चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर्स इलेक्शन कमिश्नर्स (अप्वाइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट 2023 लागू होता है. इस कानून में नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन, इस्तीफे और पद से हटाने जैसी व्यवस्थाएं दी गई हैं.इस कानून में रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक पार्टी में शामिल होने, चुनाव लड़ने या किसी राजनीतिक पद पर जाने से पहले अनिवार्य दो साल का सामान्य कूलिंग पीरियड निर्धारित नहीं किया गया है.इसका अर्थ यह है कि केवल चुनाव आयुक्त के पद पर रहने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि रिटायरमेंट के बाद वह दो साल तक राजनीति में नहीं आ सकता. हालांकि किसी विशेष पद या नियुक्ति के लिए लागू अन्य कानूनों और पात्रता संबंधी शर्तों की जांच अलग से करनी होगी.यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए. चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए चुनावी निष्पक्षता बनाए रखना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है जबकि रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक पद स्वीकार करने की पात्रता अलग कानूनी सवाल है.
CAG के लिए क्या है नियम?
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का काम केंद्र और राज्यों के सरकारी खातों तथा खर्चों की संवैधानिक व्यवस्था के तहत ऑडिट करना है. यह पद सरकारी खर्चों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है.संविधान के अनुच्छेद 148(4) में CAG के लिए रिटायरमेंट के बाद की स्पष्ट पाबंदी दी गई है. इसके अनुसार CAG पद छोड़ने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई अन्य पद नहीं संभाल सकता.इस नियम को समझना जरूरी है. यहां प्रतिबंध किसी तय अवधि जैसे छह महीने या दो साल तक सीमित नहीं है. यह सरकारी सेवा में दूसरे पद पर नियुक्ति को लेकर संवैधानिक रोक है हालांकि इस प्रावधान को यह कहने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए कि CAG के रिटायर होने के बाद उसकी हर तरह की राजनीतिक गतिविधि पर स्वतः प्रतिबंध लग जाता है. अनुच्छेद 148(4) में स्पष्ट रूप से भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन दूसरे पद पर नियुक्ति की बात कही गई है.
UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्षों के लिए क्या है नियम?
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष तथा सदस्यों के लिए भी संविधान में रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति से जुड़े विशेष प्रावधान हैं.संविधान के अनुच्छेद 319 में इन पदों को छोड़ने के बाद आगे सरकारी पद संभालने की पात्रता के बारे में नियम दिए गए हैं. ये नियम इस बात पर निर्भर करते हैं कि संबंधित व्यक्ति UPSC का अध्यक्ष था, सदस्य था या राज्य लोक सेवा आयोग में किस पद पर काम कर रहा था.UPSC के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार के लिए पात्र नहीं होते.UPSC के अध्यक्ष या सदस्य अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो सकते हैं.राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य UPSC के अध्यक्ष या सदस्य अथवा किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो सकते हैं.इसलिए इन पदों के मामले में भी केवल दिनों की संख्या गिनना सही तरीका नहीं है. संविधान कुछ पदों के लिए दूसरी सरकारी नियुक्तियों पर स्थायी प्रतिबंध लगाता है जबकि कुछ संवैधानिक पदों पर आगे नियुक्ति की अनुमति देता है.
लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए क्या नियम है?
लोकपाल एक वैधानिक संस्था है जिसका गठन भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच और संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था के लिए किया गया है.लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 में पद छोड़ने के बाद रोजगार को लेकर अलग प्रावधान दिया गया है. इस अधिनियम की धारा 8 में लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों के पद छोड़ने के बाद रोजगार से जुड़े प्रतिबंधों की व्यवस्था है.यह उदाहरण बताता है कि सभी संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं के लिए एक ही नियम लागू नहीं होता. किसी संस्था के अध्यक्ष या सदस्य के रिटायरमेंट के बाद क्या प्रतिबंध होंगे, इसके लिए उस संस्था को नियंत्रित करने वाले कानून की संबंधित धारा देखना जरूरी है इसलिए किसी भी पद के बारे में यह निष्कर्ष निकालने से पहले कि वहां एक साल, दो साल या पांच साल का कूलिंग पीरियड है, संबंधित कानून का सही प्रावधान देखना चाहिए.
IAS और दूसरे अधिकारियों के लिए क्या नियम है?
संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और सामान्य सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले अधिकारियों के नियमों में भी अंतर है.केंद्र सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद निजी व्यावसायिक रोजगार स्वीकार करने के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ सकती है. कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के नियमों और निर्देशों में रिटायरमेंट के बाद व्यावसायिक रोजगार से जुड़े मामलों की जांच की व्यवस्था दी गई है. इसमें यह देखा जाता है कि प्रस्तावित नौकरी से हितों का टकराव तो नहीं होगा, अधिकारी की सरकारी जानकारी का अनुचित इस्तेमाल तो नहीं हो सकता और क्या संबंधित अधिकारी ने सेवा के दौरान उस नियोक्ता को कोई अनुचित फायदा पहुंचाया था लेकिन इसे हर IAS, IPS या दूसरे सरकारी अधिकारी के लिए राजनीति में आने पर लागू होने वाली अनिवार्य एक या दो साल की रोक नहीं माना जा सकता.इसी तरह केंद्र सरकार की Central Staffing Scheme में कुछ अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के दो कार्यकालों के बीच कूलिंग पीरियड का अलग नियम है. DoPT के आधिकारिक FAQ के अनुसार इस योजना के तहत निदेशक/उप सचिव और संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों के दो प्रतिनियुक्ति कार्यकालों के बीच सामान्य रूप से तीन साल का कूलिंग पीरियड होता है. पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर कैडर के अधिकारियों के लिए यह अवधि दो साल बताई गई है.ध्यान रहे कि यह प्रतिनियुक्ति के दो कार्यकालों के बीच का नियम है, रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक पार्टी में शामिल होने पर लागू होने वाली रोक नहीं.
राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ सकते हैं?
इस सवाल का जवाब संबंधित पद और लागू कानून के अनुसार देना होगा. भारत में रिटायर्ड जजों और चुनाव आयुक्तों के लिए ऐसा कोई एक सामान्य संवैधानिक प्रावधान नहीं है जो सभी पर लागू होकर रिटायरमेंट के बाद दो साल तक राजनीति में प्रवेश पर रोक लगाता हो.सुप्रीम कोर्ट ने भी रिटायर्ड जजों के राजनीतिक पद स्वीकार करने से पहले दो साल का कूलिंग पीरियड लागू करने की मांग पर कानून बनाने का निर्देश देने से इनकार किया था. वहीं चुनाव आयुक्तों के 2023 के कानून में भी ऐसी सामान्य दो साल की रोक का प्रावधान नहीं है हालांकि किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने या किसी पद पर नियुक्त होने की अनुमति है या नहीं, यह दूसरे लागू कानूनों, उस पद की पात्रता और संबंधित संवैधानिक प्रतिबंधों पर निर्भर करेगा. इसलिए किसी खास व्यक्ति के मामले में केवल उसके पुराने पद के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है.
राजनीतिक नियुक्तियों पर सवाल क्यों उठते हैं?
रिटायरमेंट के तुरंत बाद राजनीतिक या सरकारी पद स्वीकार करने को लेकर बहस मुख्य रूप से संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़ी है.मसलन कोई जज अपने कार्यकाल के दौरान सरकार से जुड़े संवेदनशील मामलों पर फैसले देता है. अगर रिटायरमेंट के कुछ समय बाद उसे सरकार की ओर से कोई बड़ा पद मिल जाता है तो लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भविष्य में मिलने वाले पद का उसके फैसलों पर कोई प्रभाव था. ऐसा सवाल उठना अपने आप में किसी व्यक्ति के पक्षपात का प्रमाण नहीं है लेकिन यह संस्थागत भरोसे से जुड़ा विषय जरूर है.इसी तरह चुनाव आयोग जैसे संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी राजनीतिक दलों के प्रति निष्पक्ष रहे. रिटायरमेंट के बाद किसी राजनीतिक पद पर जाने की संभावना को लेकर बहस इसी व्यापक चिंता से जुड़ती है.
किसके क्या है तर्क?
इस मुद्दे पर दो अलग विचार सामने आते हैं. एक पक्ष का तर्क है कि रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक नियुक्तियों पर कुछ समय की रोक होने से संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर भरोसा बढ़ सकता है. दूसरा पक्ष यह मानता है कि योग्य और अनुभवी लोगों की सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें संबंधित पदों पर नियुक्त करने की व्यवस्था भी जरूरी है. रिटायर्ड जजों की नियुक्तियों के संबंध में सरकार ने भी संसद में यह तर्क दिया था कि कई वैधानिक निकायों और ट्रिब्यूनल को अनुभवी जजों की जरूरत होती है.
सबसे अहम बात किसी जज या चुनाव आयुक्त के रिटायर होने के बाद राजनीतिक पद स्वीकार करने पर दो साल की रोक को देश का सामान्य और अनिवार्य नियम बताना सही नहीं है. जहां संविधान या किसी कानून ने स्पष्ट प्रतिबंध लगाया है वहां उसका पालन जरूरी है. जहां ऐसी अवधि तय नहीं है वहां किसी प्रस्तावित कूलिंग पीरियड को मौजूदा कानूनी नियम की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए.