सुबह बालिका, दोपहर में युवती और शाम को वृद्धा! खरगोन के इस मंदिर में नवरात्रि पर उमड़ती है भक्तों की भीड़

सुबह बालिका, दोपहर में युवती और शाम को वृद्धा! खरगोन के इस मंदिर में नवरात्रि पर उमड़ती है भक्तों की भीड़


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शारदीय नवरात्रि में देवी आराधना के साथ मंदिरों में दर्शन करने का विशेष महत्व है. नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के लिए भक्त देवी मंदिरों में पहुंचते हैं. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में भी कई प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं. आइए जानते हैं जिले के ऐसे पांच मंदिरों के बारे में…

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खरगोन जिले के अंतिम छोर पर विंध्याचल पर्वत के शिखर पर स्थित पार्वती माता मंदिर अपनी प्राचीनता और मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. मां विंध्यवासिनी का यह मंदिर पार्वती माता के नाम से भी प्रसिद्ध है. पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचने वाले भक्त माता के प्रति अपनी गहरी आस्था रखते हैं. शारदीय नवरात्रि में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं.

मान्यता है कि मंदिर में विराजित माता के सामने सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है. नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां नवचंडी महायज्ञ का आयोजन किया जाता है, जिसका समापन महानवमी पर होता है. इसके साथ विशाल भंडारा और गरबा भी आयोजित किए जाते हैं. आसपास के गांवों से भक्त चुनरी लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं.

नर्मदा किनारे बसी ऐतिहासिक नगरी महेश्वर में स्थित भवानी माता मंदिर शारदीय नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता है. यह मंदिर भवानी चौक में स्थित है और मां भगवती के प्रति भक्तों की गहरी आस्था से जुड़ा हुआ है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महेश्वरी देवी को 108 सिद्धपीठों में शामिल माना जाता है. नवरात्रि के दौरान यहां सुबह से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है. स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी लोग माता के दर्शन करने आते हैं.

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मंदिर में मां भवानी की लगभग तीन फीट ऊंची प्रतिमा काले पाषाण से निर्मित है. यहां मां के श्रृंगार के लिए करीब 16 हाथ यानी लगभग नौ मीटर लंबी साड़ी लगती है. शारदीय नवरात्रि में माता के विशेष पूजन और श्रृंगार के दौरान मंदिर में भक्तिमय माहौल रहता है. मंदिर में विराजित देवी को विंध्यवासिनी स्वाहा महेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है. मत्स्य पुराण में वर्णित 108 सिद्धपीठों में इस मंदिर को शामिल माना जाता है.

जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर प्राचीन नगरी ऊन में स्थित महालक्ष्मी माता मंदिर अपनी इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. शारदीय नवरात्रि में यहां माता के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. मान्यता के अनुसार, देश के प्रमुख प्राचीन महालक्ष्मी मंदिरों में ऊन का यह मंदिर भी शामिल है. इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में राजा बल्लाल द्वारा कराया गया था. प्राचीन स्थापत्य और देवी के प्रति लोगों की आस्था के कारण यह मंदिर धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी खास है.

मंदिर में देवी कमल पुष्प पर विराजमान है. माता के छः हाथ है. सभा मंडप में पिलर पर सवारी उल्लू की प्रतिमाएं अंकित है. मान्यता है कि, यहां माता के तीन स्वरूपों में दर्शन होते है. सुबह माता बाल अवस्था में, दोपहर में युवा अवस्था में और शाम को वृद्ध अवस्था में दर्शन देती हैं. नवरात्रि के नौ दिनों में माता के पूजन और दर्शन का अलग ही माहौल देखने को मिलता है.

बड़वाह से करीब चार किलोमीटर दूर चोरल नदी के किनारे विंध्याचल पर्वत के घने जंगलों में स्थित जयंती माता मंदिर अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है. पुजारी रामस्वरूप शर्मा के अनुसार, यहां माता की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है. इस मंदिर का संबंध महाभारत काल से है और मां भगवती को पांडवों की कुलदेवी माना जाता है. शारदीय नवरात्रि में यहां दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

यहां माता एक छोटी गुफा में विराजमान है. कहते है कि, महाभारत युद्ध से पहले युधिष्ठिर ने यहां मां भगवती की आराधना की थी. माता ने प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था. मंदिर में दर्शन करने आने वाले कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की उम्मीद से जाली में धागा बांधते हैं और स्वास्तिक बनाते हैं. मन्नत पूरी होने पर वे दोबारा माता के दरबार में पहुंचकर आभार जताते हैं.

जिले के आशापुर गांव में स्थित आशापुरी माता का प्राचीन मंदिर नवरात्रि में श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि द्वापर काल में अर्जुन ने इसी स्थान पर तपस्या कर देवी का आशीर्वाद प्राप्त किया था. यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है. लेकिन अब यहां एक विशाल मंदिर बन चुका है. मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के कई समुदायों के लोग मां आशापुरी को अपनी कुलदेवी मानते हैं और दर्शन पूजन के लिए आते है.

शारदीय नवरात्रि के दौरान आशापुर माता मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. नौ दिनों तक चलने वाले शतचंडी महायज्ञ में श्रद्धालु भाग लेते हैं. क्षेत्र के 20 से अधिक गांवों से भक्त चुनरी यात्रा लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं. सुबह से ही मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है. बताते है कि इस मंदिर से पृथ्वीराज सिंह चौहान और आल्हा ऊदल का भी गहरा नाता रहा है. उनके वंशज भी यहां पूजा के आते है.



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