नई दिल्ली: सांप का काटना यानी स्नेकबाइट एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट है. हर सांप के काटने पर शरीर में जहर नहीं पहुंचता, लेकिन जब जहर शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है, तो यह ‘स्नेक एनवेमनिंग’ यानी गंभीर रूप से विषैली स्थिति पैदा कर देता है. यह एक जानलेवा स्थिति है जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गरीब ग्रामीण समुदायों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, जहां लोगों के पास समय पर चिकित्सा सुविधा तक आसानी से पहुंच नहीं होती है. दशकों के अनुभव वाले ट्रॉपिकल डिसीज एपिडेमियोलॉजी के रिसर्चर्स ने पाया है कि स्नेकबाइट के आंकड़े एक बड़े डेटा संकट से जूझ रहे हैं. दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में इस बात का कोई पुख्ता रिकॉर्ड ही नहीं है कि हर साल कितने लोगों को सांप काटता है और कितनों की जान जाती है.
सब-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया के ग्रामीण इलाकों में स्थिति क्यों है इतनी भयावह?
ग्रामीण उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया में स्थिति यह है कि कई पीड़ित नजदीकी क्लिनिक से मीलों दूर रहते हैं. उनके पास अस्पताल जाने के लिए वाहन नहीं होते या फिर वे इलाज के लिए पारंपरिक ओझा-वैद्यों के चक्कर में पड़ जाते हैं. यही वजह है कि उनके मामले कभी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं.
इस खाई को पाटने के लिए वैज्ञानिकों ने स्नेकबाइट के वैश्विक बोझ और इससे होने वाली मौतों का नया नक्शा तैयार करने के लिए एक विस्तृत अध्ययन किया है.
रिसर्चर्स ने 31 मार्च 2025 तक पब्लिश हुई स्टडीज की समीक्षा करके 79 देशों के डेटा की जांच की. इस डेटा को साल 2008 की ग्लोबल बर्डन स्टडी के साथ अपडेट किया गया. डेटा की बची हुई कमियों को दूर करने के लिए एक जियोस्टैटिस्काइल मॉडल तैयार किया गया, जिसमें वास्तविक दुनिया के डेटा को स्थानीय पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक कारकों के साथ जोड़ा गया.
ग्लोबल स्टडी में स्नेकबाइट के मामलों और मौतों को लेकर क्या चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए?
इस मॉडलिंग और डेटा एनालिसिस से यह निष्कर्ष निकला है कि स्नेकबाइट एक ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है जो आधिकारिक आंकड़ों से कहीं बड़े पैमाने पर तबाही मचा रहा है. नतीजे बताते हैं कि अकेले सब-सहारा अफ्रीका इस बोझ का सबसे बड़ा शिकार है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने 2030 तक स्नेकबाइट से होने वाली मौतों और विकलांगता को आधा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, और देश स्तर पर इस समस्या की मैपिंग करना पहला कदम है.
इस मॉडल के जरिए रिसर्चर्स ने अनुमान लगाया है कि दुनिया भर में हर साल कम से कम 2.1 मिलियन लोग स्नेकबाइट का शिकार होते हैं, और यह असली आंकड़ा 7 मिलियन यानी 70 लाख तक पहुंच सकता है.
ग्लोबल मैपिंग में उजागर हुआ छुपा हुआ स्वास्थ्य संकट. (File Photo : Reuters)
इसके अलावा, अंडररिपोर्टिंग यानी आंकड़ों के छुपने को एडजस्ट करने के बाद सालाना मौतें 274,000 से लेकर 513,000 तक हो सकती हैं.
सब-सहारा अफ्रीका में दुनिया के मुकाबले तीन गुना ज्यादा मौतें क्यों हो रही हैं?
सब-सहारा अफ्रीका में इस संकट के पीछे संरचनात्मक कारण जिम्मेदार हैं.
- पहला कारण यह है कि इस महाद्वीप में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण और बेहद जहरीले सांपों की भारी विविधता पाई जाती है. इनमें सॉ-स्केल्ड वाइपर, पफ एडर, अफ्रीकी कोबरा और मांबा जैसे खतरनाक सांप शामिल हैं जो महाद्वीप भर में भारी मौतों और बीमारियों की वजह बनते हैं.
- दूसरा कारण यह है कि लाखों ग्रामीण किसान बिना सुरक्षात्मक जूतों के खुले खेतों में काम करते हैं और रात के वक्त अंधेरे रास्तों पर चलते हैं. जब किसी को सांप काटता है, तो कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, दूरदराज के अस्पताल और एंटीवेनम की भारी कमी या अनुपलब्धता के कारण एक इलाज योग्य मेडिकल इमरजेंसी तुरंत जानलेवा बन जाती है.
नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया जैसे देशों में घनी ग्रामीण आबादी और कृषि क्षेत्रों में ज्यादा जोखिम के चलते स्थिति बेहद गंभीर है.
लाखों लोग हो रहे हैं विकलांग, भविष्य की रणनीतियों को लेकर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
अनुमान है कि हर साल 800,000 से ज्यादा सर्वाइवर यानी पीड़ित लंबे समय तक रहने वाली शारीरिक विकलांगता का शिकार हो जाते हैं, जिनमें अंगों को काटना यानी एम्प्यूटेशन और अन्य स्थायी उपाय शामिल हैं. इन विकलांगता के कारण परिवारों की आय कम हो जाती है, मेडिकल खर्च बढ़ जाता है और पहले से संघर्ष कर रहे किसान परिवार और ज्यादा गरीबी के दलदल में फंस जाते हैं.
डब्ल्यूएचओ के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सिर्फ अनुमान लगाने के बजाय स्थानिक जोखिम डेटा का उपयोग करके वास्तविक नीतियों को लागू करना होगा. सरकारों और वैश्विक स्वास्थ्य भागीदारों को उच्च जोखिम वाले हॉटस्पॉट की पहचान करके सबसे ज्यादा जरूरत वाली जगहों पर एंटीवेनम का स्टॉक करना चाहिए, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए और बेहतर परिवहन बुनियादी ढांचा विकसित करना चाहिए ताकि समय पर मरीज अस्पताल पहुंच सकें.