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Pithoragarh News: बर्फीली चोटियों, सशस्त्र बलों की मुस्तैदी और भारत-नेपाल के बीच सामरिक संवेदनशीलता के बीच बसा ‘कालापानी’ आज धार्मिक पर्यटन के एक नए स्वर्णिम अध्याय की इबारत लिख रहा है. महर्षि व्यास की गुफा, पवित्र काली नदी का उद्गम और आदि कैलाश मार्ग की दिव्यता पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए इस दुर्गम स्थल को आस्था का जीवंत केंद्र बना रही है.
Pithoragarh News: कालापानी भले ही भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद का केंद्र हो, लेकिन यह इलाका धार्मिक पर्यटन का केंद्र भी है. तकरीबन 12 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद इस क्षेत्र में जहां काली मंदिर है, वहीं महर्षि व्यास की वह गुफा भी यहीं मौजूद है, जहां उन्होंने कड़ी तपस्या की थी. कालापानी नेपाल बॉर्डर के साथ ही चीन के भी काफी करीब है.
सामरिक महत्व और सुरक्षा बलों की तैनाती
इस इलाके को नेपाल अपना बता रहा है, लेकिन 1956 से ही यहां पर भारतीय सुरक्षा बल मौजूद हैं. वर्तमान में भी इस जगह पर सेना, आईटीबीपी और एसएसबी मौजूद हैं. यहीं से भारत और नेपाल को बांटने वाली काली नदी भी निकलती है, लेकिन नेपाल का दावा है कि काली नदी लिम्पियाधुरा से निकलती है. 34 वर्ग किलोमीटर का यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है ही, साथ ही इसका धार्मिक महत्व भी है.
पीएम मोदी के दौरे के बाद बढ़ा पर्यटन
पीएम नरेंद्र मोदी ने 2023 में आदि कैलाश की यात्रा की थी. पीएम के दौरे के बाद यह इलाका धार्मिक पर्यटन के केंद्र में आ चुका है. आदि कैलाश के साथ ही ॐ पर्वत के दर्शनों के लिए आने वाले यात्री भी कालापानी पहुंच रहे हैं. इस साल भारी संख्या में सैलानी कालापानी पहुंचे हैं.
श्रद्धालुओं के अनुभव और सुगम दर्शन
महाराष्ट्र के संजीव पूरे परिवार के साथ आदि कैलाश यात्रा पर पहुंचे, साथ ही वे पूरे परिवार के साथ कालापानी भी गए. संजीव का कहना है कि कालापानी के बारे में उन्हें जानकारी थी, लेकिन आंखों से जब देखा तभी इस स्थान के महत्व को वह समझ पाए. कालापानी से लिपुलेख दर्रे की दूरी सिर्फ 20 किलोमीटर है.
ऐसे में कैलाश-मानसरोवर जाने वाले यात्री भी कालापानी से ही अपना आगे का सफर तय करते हैं. सुरक्षा के लिहाज से कालापानी के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल मौजूद हैं, लेकिन व्यास गुफा और काली मंदिर के दर्शनों के लिए कोई रोक नहीं है. कालापानी और व्यास गुफा आमने-सामने मौजूद हैं.