WhatsApp Group Story: क्या किसी की मदद के लिए सिर्फ मैसेज पढ़ लेना काफी है? भोपाल की एक सोसाइटी में 16 साल की अनन्या ने अपने दादाजी की तबीयत बिगड़ने पर व्हाट्सऐप ग्रुप में मदद मांगी. 47 लोगों ने मैसेज देखा, लेकिन कोई उसके घर नहीं पहुंचा. फिर एक पड़ोसी ने आगे बढ़कर मदद की. पढ़िए आज की यह कहानी, जो याद दिलाती है कि मुश्किल वक्त में इमोजी नहीं, इंसान का साथ मायने रखता है.
रात के 9 बजकर 12 मिनट हुए थे. भोपाल की एक सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप में अचानक मैसेज आया.
“क्या बिल्डिंग में कोई है जो थोड़ी देर के लिए मेरे घर आ सकता है? पापा की तबीयत ठीक नहीं लग रही. मैं घर पर अकेली हूं.”
मैसेज 16 साल की अनन्या ने किया था. उसके पिता दूसरे शहर में नौकरी करते थे और मां एक शादी में गई थीं. घर में वह अपने दादाजी के साथ थी.
मैसेज के नीचे कुछ ही मिनटों में 47 लोगों ने ग्रुप देख लिया. किसी ने चिंता जताने वाला इमोजी भेजा, किसी ने लिखा, “ओह, टेक केयर.” एक पड़ोसी ने पूछा, “क्या हुआ?” और फिर ग्रुप में चुप्पी छा गई.
अनन्या ने दोबारा लिखा, “दादाजी को चक्कर आ रहे हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूं.”
इस बार तीन लोगों ने मैसेज पर दिल वाला इमोजी भेज दिया.
उसी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर रहने वाले राघव ने भी मैसेज पढ़ा. वह 28 साल का था और घर से काम करता था. उसने सोचा कि शायद किसी और ने मदद कर दी होगी. उसकी मीटिंग भी शुरू होने वाली थी.
पहली मंजिल पर रहने वाली मिसेज मेहरा ने मैसेज देखा, लेकिन उन्हें लगा कि बच्ची के घर कोई रिश्तेदार आ गया होगा. पांचवीं मंजिल पर रहने वाले एक अंकल ने लिखा, “जरूरत हो तो बताना.”
जरूरत तो बता दी गई थी, लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि मदद के लिए कौन आ रहा है.
करीब दस मिनट बाद सोसाइटी के गार्ड ने राघव के दरवाजे की घंटी बजाई.
“सर, दूसरी मंजिल वाली बच्ची ने मुझे फोन किया था. उसके दादाजी की तबीयत खराब है. आप डॉक्टर को जानते हैं क्या?”
राघव ने लैपटॉप बंद किया और तुरंत अनन्या के घर पहुंचा. दादाजी को कमजोरी महसूस हो रही थी और वे ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे. राघव ने अनन्या की मदद से एंबुलेंस बुलाई और उसके पिता को फोन किया. कुछ देर में मेडिकल टीम पहुंच गई.
डॉक्टर ने जांच के बाद दादाजी को अस्पताल ले जाने की सलाह दी. राघव उनके साथ अस्पताल गया और अनन्या के पिता के आने तक वहीं रुका रहा.
रात करीब एक बजे वह घर लौटा. फोन खोला तो सोसाइटी ग्रुप में नए मैसेज थे.
“अब कैसे हैं अंकल?”
“कोई अपडेट है?”
“भगवान सब ठीक करें.”
राघव ने कुछ देर स्क्रीन देखी. फिर उसने ग्रुप में लिखा, “अंकल अब डॉक्टर की देखरेख में हैं. एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूं. आज 47 लोगों ने मैसेज पढ़ा था. अगर उनमें से कोई एक भी दरवाजा खटखटा देता, तो अनन्या को दस मिनट तक अकेले इंतजार नहीं करना पड़ता.”
कुछ देर तक किसी का जवाब नहीं आया.
अगली सुबह सोसाइटी के ग्रुप में एक नया मैसेज था. इस बार मिसेज मेहरा ने लिखा था, “मैं तीसरी मंजिल पर रहती हूं. अगर किसी बुजुर्ग या बच्चे को अचानक मदद चाहिए, तो मेरे दरवाजे पर आ सकते हैं. मैं घर पर रहती हूं.”
इसके बाद दो और लोगों ने अपने फ्लैट नंबर और फोन नंबर साझा किए. गार्ड ने भी अपनी ड्यूटी के समय की जानकारी दी, ताकि जरूरत पड़ने पर लोग उसे बुला सकें.
कुछ दिनों बाद अनन्या के दादाजी घर लौट आए. वे ठीक हो रहे थे. अनन्या ने राघव को धन्यवाद कहा तो वह हंसकर बोला, “मुझे धन्यवाद मत दो. अगली बार ग्रुप में किसी को मदद मांगते देखो, तो यह मत सोचना कि कोई दूसरा पहुंच जाएगा.”
अनन्या ने सिर हिलाया.
उस रात सोसाइटी के ग्रुप में फिर एक मैसेज आया. किसी ने लिखा था, “आज मेरे घर में थोड़ी ज्यादा खिचड़ी बन गई है. किसी को चाहिए?”
इस बार जवाब इमोजी से शुरू नहीं हुए. सबसे पहले दो लोगों ने दरवाजे की घंटी बजाई.
और अनन्या को पहली बार लगा कि इतने सारे फ्लैटों वाली इस बिल्डिंग में सचमुच पड़ोसी भी रहते हैं.
कहानी की आखिरी बात
हमने लोगों तक पहुंचने के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया बनाए थे. लेकिन कभी-कभी हम स्क्रीन पर मौजूद रहकर भी एक-दूसरे की जिंदगी से दूर हो जाते हैं. मदद का मैसेज पढ़ लेना और मदद के लिए आगे बढ़ना, दो अलग बातें हैं.
किसी दिन आपके पास भी किसी की मदद करने का मौका आए, तो सिर्फ मैसेज का जवाब मत दीजिए. हो सके तो दरवाजा भी खटखटा दीजिए.