पुणे की 33 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ऐसे भंवर जाल में फंसी हुई है कि कानून से भी उसे कोई मदद नहीं मिल पा रही है. वजह है उसको गर्भपात का कानून होने के बावजूद गर्भपात की अनुमति का न मिल पाना. यही वजह है कि वह पेट में 24 हफ्ते का गर्भ लेकर कोर्टों के चक्कर काट रही है. यहां तक कि हाईकोर्ट ने भी उसकी स्थिति पर सहानुभूति जताई लेकिन कानूनी राहत देने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि भारत के कानून में इसका प्रावधान ही नहीं है.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर के अनुसार पुणे की रहने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर को इसी जुलाई की शुरुआत में पता चला कि उनका पति, जिससे उन्होंने 2025 में शादी की थी, पहले से शादीशुदा है और उसका पहला तलाक अभी तक पूरा नहीं हुआ है. उसने झूठ बोलकर उससे शादी की थी. दोनों की मुलाकात मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर हुई थी, जहां पति ने खुद को “कभी शादी नहीं की” बताया था. फरवरी 2025 में दोनों की शादी भी हो गई, लेकिन कुछ हफ्तों बाद जब महिला को इस बात का पता चला तो वह करीब 13 हफ्ते की गर्भवती थी.
उसने पुणे के कई क्लीनिकों में गर्भपात के लिए संपर्क किया. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम 1971 के तहत 12 हफ्तों के बाद गर्भपात के लिए कम से कम दो डॉक्टरों की मंजूरी जरूरी होती है, लेकिन चूंकि इसका समय ज्यादा हो गया तो क्लीनिकों ने कोर्ट का आदेश मांगा. लिहाजा अगस्त में महिला ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
उसने दलील दी कि कानून बलात्कार और यौन हिंसा पीड़िताओं के लिए अपवाद देता है. उसने पति और ससुराल वालों पर मानसिक उत्पीड़न, जातिवादी गालियां और धोखा देने का आरोप लगाया. उसने कहा कि इन हालात में वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती. गर्भावस्था और परिस्थितियों के कारण उसे नौकरी भी छोड़नी पड़ी. अकेले बच्चे को पालने का कोई सहारा नहीं है. लिहाजा उसे गर्भपात की अनुमति दी जाए.
लेकिन पिछले हफ्ते हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी. जस्टिस भारती डांगरे और आशीष चावन की बेंच ने कहा कि महिला एमटीपी अधिनियम के तहत उन सात श्रेणियों में नहीं आती, जिनमें मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है. कोर्ट ने सहानुभूति जरूर जताई, लेकिन कानूनी राहत देने से इनकार कर दिया.
महिला ने सुनाई आपबीती
महिला ने बताया कि जब वह हाईकोर्ट गई थी तब वह 15 हफ्ते की गर्भवती थी. लेकिन सुनवाई में देरी के कारण अब गर्भावस्था 24 हफ्तों से आगे निकल गई है. “देरी मेरी गलती नहीं थी, लेकिन सजा मुझे भुगतनी पड़ रही है,” उसने कहा.
कानून की श्रेणियों में फिट नहीं बैठता मामला
अब उसके वकील सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. कानून में बलात्कार, सगे-संबंधियों से संबंध या शादीशुदा स्थिति में बदलाव (तलाक या विधवा होने) के मामलों में 24 हफ्तों के बाद भी मेडिकल बोर्ड के जरिए गर्भपात की अनुमति का प्रावधान है. लेकिन इस महिला का मामला इन श्रेणियों में फिट नहीं बैठता.
क्या हुआ था?
महिला ने बताया कि उसकी अपने पति से 2023 में वेबसाइट पर मुलाकात हुई. दोनों एक ही उम्र के थे, लेकिन अलग जाति और क्षेत्र से थे, फिर भी दोनों ने शादी कर ली. 2025 में एक गर्भपात के बाद पति और सास का व्यवहार अचानक उसके प्रति बदल गया. जातिवादी गालियां शुरू हो गईं. संदेह बढ़ने पर उसने पति का फोन चेक किया तो इंस्टाग्राम पर ब्लॉक किए गए अकाउंट मिले. जांच करने पर पता चला कि पति की पहली पत्नी उसके खिलाफ मुंबई में तलाक और घरेलू हिंसा का केस लड़ रही है. लिहाजा 20 जुलाई 2026 को उसने पुणे के कालेपाडल थाने में द्विविवाह और एससी/एसटी अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराई. हालांकि उस दौरान वह गर्भवती निकली.
धोखा खाई महिला के लिए नहीं कानून में छूट
स्त्री रोग विशेषज्ञ और चिकित्सा कार्यकर्ताओं का कहना है कि एमटीपी अधिनियम में कई श्रेणियां छूट गई हैं. तलाकशुदा या विधवा महिला के लिए अपवाद है, लेकिन धोखा खाई महिला या लिव-इन में रहने वाली महिला के लिए गर्भपात का अधिकार नहीं दिया गया है. “20वें हफ्ते तक गर्भनिरोधक फेल होने पर गर्भपात मिल सकता है, फिर 21वें हफ्ते में यह अधिकार क्यों बदल जाता है?” यही वजह है कि वह अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है.