पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसके लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बिहार के गया जी जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में भी एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां पितरों का पिंडदान करने की मान्यता है? यह जगह खंडवा जिले के ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर स्थित गया शिला है. इसे एमपी का ‘गया जी’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से गया जी के समान पुण्य प्राप्त होता है. यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान यहां मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.
अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और तर्पण करने का विशेष महत्व माना जाता है. आमतौर पर इसके लिए लोग बिहार के गया जी जाते हैं, लेकिन दूरी या दूसरी वजहों से वहां नहीं पहुंच पाने वाले श्रद्धालु ओंकारेश्वर की गया शिला पर भी पितृ कर्म कर रहे हैं. नर्मदा नदी के पवित्र तट पर स्थित इस स्थान पर श्रद्धालु स्नान करने के बाद विधि-विधान से पूजा करते हैं. पंडितों के अनुसार, यहां पिंडदान और तर्पण करने की धार्मिक मान्यता है कि गया जी के समान पुण्य मिलता है. हालांकि, यह धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ी मान्यता है.
पांडवों से जुड़ी है गया शिला की मान्यता
पंडित सुधीर अत्रे के अनुसार, महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आए थे. मान्यता है कि श्राद्ध के लिए गया जी नहीं जा पाने के कारण उन्होंने नर्मदा के उत्तर तट पर गया शिला की स्थापना की और यहीं अपने पितरों का श्राद्ध व तर्पण किया. इसी मान्यता के चलते इस स्थान को पितृ कर्म के लिए विशेष माना जाता है. पंडित दीपक अत्रे के अनुसार, यहां केवल पितृ पक्ष में ही नहीं, बल्कि अमावस्या और पंचमी या उसके अलावा भी जैसी तिथियों पर भी श्रद्धालु पितरों के निमित्त पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. पितृ पक्ष के 16 दिनों में यहां विशेष पूजन और अभिषेक भी किया जाता है. कुछ श्रद्धालु संकल्प लेकर पूरे पितृ पक्ष में पितृ कर्म करते हैं.
महर्षि मार्कंडेय की तपस्थली भी माना जाता है यह स्थान
पंडित उमेश अत्रे के अनुसार, गया शिला का क्षेत्र महर्षि मार्कंडेय की तपस्थली भी माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि महर्षि मार्कंडेय ने यहां अपने माता-पिता का तर्पण किया था या पिंड दान इसी वजह से इस स्थान को पितरों से जुड़े धार्मिक कर्मकांड के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु नर्मदा स्नान के बाद अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ और तर्पण करते हैं.
कुश, जौ, काले तिल और चावल से करते हैं पिंडदान गया शिला पर पितृ कर्म करने के लिए श्रद्धालु नर्मदा स्नान के बाद पूजन करते हैं. यहां कुश, पवित्री, जौ, काले तिल, चावल, दूध, शहद और पुष्प जैसी पूजन सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. पंडितों के मार्गदर्शन में विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण किया जाता है. पितृ पक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और स्थानीय लोग भी पूजन सामग्री उपलब्ध कराने में मदद करते हैं.
ओंकारेश्वर से नाव और सड़क, दोनों रास्तों से पहुंच सकते हैं
ओंकारेश्वर से गया शिला तक पहुंचने के लिए सड़क और जल मार्ग, दोनों विकल्प बताए जाते हैं. स्थानीय जानकारी के अनुसार, यह स्थान ओंकारेश्वर से सड़क मार्ग से करीब 5 किलोमीटर और नर्मदा के जल मार्ग से लगभग एक किलोमीटर दूर है. श्रद्धालु नाव के जरिए भी यहां पहुंच सकते हैं, जबकि सड़क मार्ग से ओंकारेश्वर डैम की ओर से रास्ता जाता है. हालांकि, सुरक्षा कारणों से कुछ हिस्सों में आवाजाही प्रतिबंधित हो सकती है. इसलिए जाने से पहले स्थानीय प्रशासन या नाव संचालकों से रास्ते और पहुंच की स्थिति की जानकारी लेना बेहतर रहेगा.
5 फीट लंबी और डेढ़ फीट चौड़ी है गया शिला
स्थानीय जानकारी के मुताबिक, गया शिला करीब 5 फीट लंबी और डेढ़ फीट चौड़ी है. इसका ऊपरी हिस्सा खुरदरा है और इस पर कोई स्पष्ट आकृति दिखाई नहीं देती. इसके पास पत्थरों से बना भगवान शिव का मंदिर भी है, जिसका परिसर करीब 15×50 फीट में फैला हुआ बताया जाता है. यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से संबंधित एक बोर्ड भी लगा है, जिस पर इसके निर्माण या स्थापना का समय 8वीं-9वीं शताब्दी ईस्वी दर्ज बताया गया है. मंदिर परिसर में कुछ मूर्तियां जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं और श्रद्धालुओं के लिए टीन शेड जैसी सुविधाओं का अभाव भी बताया जाता है.
रोजाना पहुंच रहे 45 से 50 श्रद्धालु
स्थानीय निवासी मनोज धोपे के मुताबिक, वह पिछले 10 से 12 साल से यहां लोगों को पिंडदान के लिए आते देख रहे हैं. इन दिनों रोजाना करीब 45 से 50 श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं. पितृ पक्ष में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है. स्थानीय लोग पूजा के लिए जरूरी सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं, जिससे बाहर से आने वाले लोगों को सुविधा मिलती है. ओंकारेश्वर की गया शिला धार्मिक आस्था, नर्मदा तट और पितरों से जुड़ी परंपराओं का खास संगम है. अगर आप पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान या तर्पण करना चाहते हैं और गया जी नहीं जा पा रहे हैं, तो इस स्थान के बारे में जानकारी ले सकते हैं. यहां जाने से पहले रास्ते, नाव की उपलब्धता और सुरक्षा संबंधी निर्देशों की जानकारी जरूर ले.