नई दिल्ली (NEET UG Fake Disability Certificate). डॉक्टर बनने का सपना देख रहे युवाओं के लिए नीट यूजी परीक्षा किसी महाकुंभ से कम नहीं है. इसमें सफल होने के बाद MBBS की एक-एक सीट के लिए कड़ी जंग होती है. जनरल या अन्य श्रेणियों में तगड़े मुकाबले के कारण कई अभ्यर्थी मेडिकल या दिव्यांग (PwD) कोटा से नीट यूजी देते हैं. यह आरक्षण काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान मिलता है. शारीरिक रूप से किसी चुनौती का सामना कर रहे जरूरतमंद और मेधावी छात्रों को इससे मदद मिल जाती है.
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से आए एक मामले ने मेडिकल काउंसलिंग की ट्रांसपेरेंसी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, नीट यूजी की दिव्यांग कोटे की सीट हथियाने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र से कुछ ऐसे अभ्यर्थी देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज पहुंचे, जिन्होंने फर्जी डॉक्यूमेंट के दम पर खुद को दिव्यांग साबित करने की कोशिश की थी. लेकिन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की तरफ से नामित विशेषज्ञ डॉक्टर के मेडिकल बोर्ड की जांच में फर्जीवाड़ा बेनकाब हो गया.
दून मेडिकल कॉलेज में हुआ खुलासा: जांच में फिट निकले ‘दिव्यांग’
नीट यूजी काउंसलिंग के तहत दिव्यांग श्रेणी की MBBS सीट पर दावा ठोकने वाले अभ्यर्थी देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल पहुंचे. हॉस्पिटल में MS डॉ. आरएस बिष्ट की अध्यक्षता में विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था. इसमें नेत्र रोग, हड्डी रोग और अन्य विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल थे. यूपी, उत्तराखंड, बिहार और महाराष्ट्र से 18 अभ्यर्थी जांच के लिए आए थे. नेत्र रोग और ऑर्थो विभाग की जांच में कई ऐसे छात्र पकड़े गए जो खुद को 40-50% तक दिव्यांग बता रहे थे, जबकि असल में वे फिट थे.
आंखें बिल्कुल ठीक, फिर भी खुद को बताया दृष्टिबाधित
नेत्र रोग विभाग (Ophthalmology Department) में आए मामले ने डॉक्टरों को भी हैरान कर दिया. इस विभाग में जांच के लिए पहुंचे 3 अभ्यर्थियों (उत्तराखंड के 2 छात्र और बिहार की 1 छात्रा) ने अपने डॉक्यूमेंट में खुद को 40-50% तक दृष्टिबाधित (Blind/Visually Impaired) बताया था. लेकिन जब डॉक्टर ने उनकी आंखों की क्लिनिकल और मशीनी जांच की तो उन्हें बोर्ड पर लिखे छोटे अक्षर और चार्ट पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मशीनों की रिपोर्ट में भी उनकी आंखों में किसी भी तरह की दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हुई.
पैरों की दिव्यांगता निकली सिर्फ 12%, सख्ती देख भागे अभ्यर्थी
हड्डी रोग विभाग की जांच में भी चौंकाने वाला मामला आया. महाराष्ट्र से आई छात्रा ने पैरों की दिव्यांगता 40% दर्शाई थी. जांच में उसकी दिव्यांगता सिर्फ 12% ही निकली. यह नीट काउंसलिंग के तय मानकों (न्यूनतम 40%) से बहुत कम थी. उत्तर प्रदेश से आई एक छात्रा ने 45% दिव्यांगता का दावा किया था. जब डॉक्टरों ने उससे सख्ती से पूछताछ शुरू की और दस्तावेजों पर सवाल उठाए तो वह बिना जांच पूरी कराए ही गायब हो गई. कई अन्य अभ्यर्थी भी सख्ती देखकर चले गए और दोबारा मेडिकल बोर्ड के सामने नहीं लौटे.
फर्जी प्रमाणपत्र जारी करने वालों पर उठे सवाल
अभ्यर्थियों को फर्जी आंकड़ों वाला दिव्यांगता प्रमाण पत्र इश्यू करने वाले मेडिकल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं. बिना वास्तविक विकलांगता के ये सर्टिफिकेट कैसे जारी हो गए? दून मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड ने जांच में पात्र पाए गए 13 असली अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र अपलोड कर दिए हैं. इस तरह के फर्जीवाड़े ने देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की पारदर्शिता पर काला धब्बा लगा दिया है. अगर ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो हकदार दिव्यांग छात्र अपनी सीटों से वंचित रह जाएंगे.