आरक्षण पर हाईकोर्ट का वार, 3 दिन में 2 बड़े फैसले.. आखिर कब सुधरेंगी सरकारें

आरक्षण पर हाईकोर्ट का वार, 3 दिन में 2 बड़े फैसले.. आखिर कब सुधरेंगी सरकारें


रिजर्वेशन पर पिछले 3 दिन में हाईकोर्ट के दो बड़े फैसलों ने एक बार फिर सरकारों की मनमानी पर अंकुश लगाया है. सोमवार को ही कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति SC और अनुसूचित जनजाति ST आरक्षण की सीमा को बढ़ाने के सरकार के फैसले को रद्द कर दिया. इस बढ़ोतरी के बाद राज्य में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की कैप को पार कर गई थी. इससे 2 दिन पहले ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग कोटा में की गई बढ़ोतरी को 27 से घटाकर वापस 14 प्रतिशत कर दिया.

आरक्षण को लेकर अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का आधार एक ही रहा. दोनों ही अदालतों ने संबंधित सरकारों का ये फैसला इसलिए रद्द किया क्योंकि वे आरक्षण बढ़ाने का पर्याप्त कारण नहीं बता पाए. दरअसल सुप्रीम कोर्ट के 1992 में आए इंदिरा साहनी फैसले के मुताबिक आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक ही रहनी चाहिए. इसमें बढ़ोतरी तभी की जा सकती है जब कोई असाधारण स्थिति हो. दोनों राज्य सरकारें ये साबित नहीं कर पाईं. यह पहला मौका नहीं है जब सरकारों ने आरक्षण को बढ़ाने का प्रयास किया और कोर्ट ने सख्ती दिखाई. इससे पहले महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मामलों में भी कोर्ट यही रुख दिखा चुकी है, मगर सरकारें सुधरने का नाम नहीं लेतीं.

कर्नाटक में क्या हुआ?

कर्नाटक में अक्टूबर 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार ने SC आरक्षण को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST आरक्षण को 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया था. यहां ओबीसी के लिए पहले से ही 32 प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय है. ऐसे में राज्य में आरक्षण की सीमा 56 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र मित्र, एच आर सागर ने इसके खिलाफ याचिका दायर की थी.

कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के एस हेमलेखा की खंडपीठ ने इस बढ़ोतरी को असंवैधानिक घोषित किया. फैसले में इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन बताया गया. कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस आरक्षण को लागू करने से पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से परामर्श ही नहीं किया था, जबकि संविधान के अनुच्छेद 338(9) और 338A(9) के तहत ऐसा करना अनिवार्य है.

मध्य प्रदेश में हाईकोर्ट क्यों हुआ सख्त

हाईकोर्ट में आरक्षण की सीमा 2019 में तत्कालीन कमलनाथ की कांग्रेस सरकार ने बढ़ाई थी. इसमें ओबीसी कोटा को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया गया था. इससे राज्य में आरक्षण का कोटा बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया था. एमपी हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया. जस्टिस आनंद पाठक और विनय सराफ ने कहा कि ओबीसी निश्चित तौर पर 14 प्रतिशत आरक्षण पाने के हकदार हैं.

इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का कोई आधार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी फैसले को आधार देते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार कोई असाधारण स्थिति या आपातकालीन परिस्थिति साबित नहीं कर पाई है. अदालत ने यहां भी ये पाया कि सरकार ने आरक्षण का नया कानून बनाने में जल्दबाजी की और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग से परामर्श नहीं किया.

सरकारें करती हैं मनमानी, कोर्ट दिखाते हैं आईना

आरक्षण की सीमा को सरकारें लगातार मनमानी कर बढ़ाती रही हैं और हर बार कोर्ट ने इन्हें आईना दिखाया है. कर्नाटक और मध्य प्रदेश से पहले महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान और आंध्रप्रदेश में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं. महाराष्ट्र में 2021 में मराठा आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था. इसमें मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में 12 से बढ़ाकर 13 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया गया था.

इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने 2012 में कानून बनाकर ST का कोटा 32 प्रतिशत कर दिया था. इससे कुल आरक्षण 58 प्रतिशत हो गया था. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2022 में इसे खारिज कर दिया था. आंध्रप्रदेश में पिछड़ा वर्ग के लिए बढ़ाए गए 34 प्रतिशत आरक्षण को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर 50 प्रतिशत सीमा के अंदर लाने के आदेश दिए थे. राजस्थान में विशेष पिछड़ा वर्ग के तहत गुर्जर सहित पांच जातियों के लिए कई बार 5 प्रतिशत अलग से आरक्षण देने के प्रयास हुए, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सरकार के पास 50 प्रतिशत की सीमा लांघने का उचित आधार नहीं है.

सरकारें आखिर क्यों नहीं सुधरती?

अदालतों की लगातार सख्ती और आरक्षण पर 50 प्रतिशत कैप के बावजूद आए दिन राज्य सरकारें आरक्षण की सीमा पार करने के लिए नए कानून बना देती हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा कई बार चुनावी लाभ लेने के लिए होता है तो तो कई बार लोगों के गुस्से और आंदोलनों को शांत करने के लिए इस तरह के कदम उठाए जाते हैं. कुछ सरकारें कानून बनाकर तात्कालिक लाभ लेती हैं, क्योंकि वे खुद भी जानती हैं कोर्ट में आरक्षण की ये सीमा नहीं टिकेगी. कई बार राज्य सरकारें केंद्र से भी ये मांग करती रही हैं कि संविधान में संशोधन लाकर 50 प्रतिशत की सीमा को हमेशा के लिए हटा दिया जाए.

क्या था इंदिरा साहनी मामला, जिसे माना जाता है आधार

1990 में जब मंडल आयोग की सिफारिशों को आधार बनाकर ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत किया गया तो इससे कोटा 50 प्रतिशत की सीमा को पार कर गया. इसे कोर्ट में चुनौती दी गई. उस वक्त 9 जजों की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. फैसले में 6-3 से बहुमत के आधार पर कोर्ट ने फैसला सुनाया कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में समानता के अधिकार की बात कही गई है. ऐसे में संतुलन होना चाहिए. इसीलिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक ही रहनी चाहिए. हालांकि इस फैसले में उत्तर पूर्वी राज्य व मुख्य धारा से छूटे इलाकों को असाधारण परिस्थितियों में इस सीमा को पार करने की छूट दी गई थी.



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