‘अपनी तेल की टंकियां और इमरजेंसी टैंक तुरंत फुल कर लो, क्योंकि आने वाला वक्त बेहद भयावह हो सकता है.’ पश्चिम एशिया वाली जंग की आग अब पूरी दुनिया की रसोई से लेकर गाड़ियों की टंकियों पर भारी पड़ने वाली है. एशियाई देशों के सामने ईंधन का एक ऐसा संकट खड़ा होने जा रहा है, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी. कच्चे तेल की सप्लाई चेन पर मंडरा रहे काले बादलों को देखते हुए हाल ही में दुनिया के एक बड़े तेल आयातक देश ने सीधे ‘रेड बटन’ दबा दिया है. चेतावनी जारी कर दी गई है कि अगर इमरजेंसी स्टॉक फुल नहीं किया गया, तो पेट्रोल-डीजल पूरा देश ले डूबेंगे.
एशिया के तेल मार्केट में क्या होने वाला है?
ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल के गिरते-चढ़ते दामों और जंग के माहौल ने एनर्जी एक्सपर्ट्स की नींद उड़ा दी है. पश्चिम एशिया में जिस तरह तनाव बढ़ रहा है, उससे अब सिर्फ कच्चा तेल मिलने पर ही नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित अपने देश तक लाने पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.
एशियाई देशों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वो अपनी जरूरत के तेल के लिए दूसरे देशों से होने वाले आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं. ऐसे में अगर तेल आने वाला रास्ता कुछ दिनों के लिए भी बंद हो जाता है, तो कई देशों के पास बैकअप के लिए जरूरी तेल भी नहीं बचेगा. इसी बड़े खतरे को देखते हुए अब बड़े-बड़े मंचों से ये आवाज उठने लगी है कि बिना एक भी पल गंवाए एशिया के देशों को अपना इमरजेंसी ऑयल रिजर्व तैयार कर लेना चाहिए.
जापान ने दबाया ‘रेड बटन’, दुनिया को दी सीधी चेतावनी
ईंधन संकट के इस भयावह खतरे को देखते हुए जापान ने सीधे ‘रेड बटन’ दबा दिया है. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा मंच की वर्चुअल बैठक के दौरान जापान के ट्रेड मिनिस्टर र्योसेई अकाजावा ने एशिया के सभी देशों से अपने तेल भंडार को तुरंत बढ़ाने की जोरदार अपील की. जापान ने कहा है कि इस नाजुक मोड़ पर मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों और एशिया के आयातक देशों के बीच एक मजबूत कड़ी बनने की जरूरत है. जापान ने खुद को इन दोनों पक्षों के बीच एक ‘पुल’ के रूप में पेश करने की पेशकश की है, ताकि दुनिया भर में ऊर्जा की सप्लाई को बिना किसी बाधा के स्थिर बनाए रखा जा सके.
- एनर्जी सिक्योरिटी पहली प्राथमिकता: जापान का मानना है कि इस समय ग्लोबल लेवल पर सबसे बड़ा और पहला काम अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना बन चुका है.
- ग्रीन एनर्जी के अभियानों पर ब्रेक: मौजूदा हालात ऐसे हो चुके हैं कि पर्यावरण सुधार, कार्बन उत्सर्जन घटाने और ग्रीन एनर्जी की तरफ बढ़ने के सारे बड़े-बड़े अभियानों को फिलहाल के लिए पीछे छोड़ दिया गया है.
- तेल बिना टारगेट बेकार: सीधी सी बात है कि जब कारखाने चलाने और गाड़ियों में डालने के लिए तेल ही नहीं होगा, तो ग्रीन एनर्जी का कोई भी टारगेट पूरा नहीं हो पाएगा.
- पारंपरिक ईंधन बचाने की होड़: यही वजह है कि आज विकसित और विकासशील दोनों तरह के देश सबसे पहले अपनी पुरानी यानी पारंपरिक ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने में जुट गए हैं.
पश्चिम एशिया का संकट और कई देशों की भारी मजबूरी
ईरान-अमेरिका की जंग और पॉलिटिकल उथल-पुथल ने पूरी दुनिया की सप्लाई चेन की सांसें अटका दी हैं. जापान जैसे देश, जिसके पास अपने खुद के नेचुरल रिसोर्सेस नाममात्र के हैं, उनके लिए ये स्थिति सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है. जापान की मजबूरी ये है कि उसका 90 प्रतिशत से भी ज्यादा कच्चा तेल सीधे मिडिल ईस्ट के देशों से आता है.
अगर मिडिल ईस्ट में तनाव जरा सा भी और बढ़ता है या फिर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते में किसी भी तरह की सैन्य रुकावट आती है, तो पूरा एशियाई बाजार ईंधन की भारी किल्लत से पल भर में चरमरा सकता है. भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे बड़े आयातक देश इस खतरे को सबसे करीब से महसूस कर रहे हैं. यही वजह है कि जापान अब किसी भी आपातकाल से निपटने के लिए दूसरे रास्तों, नए सहयोगियों और गैर-मिडिल ईस्टर्न सोर्सेस से कच्चा तेल जुटाने की हर संभव कोशिश में दिन-रात एक कर रहा है.
ग्रीन एनर्जी से ध्यान हटाकर अब तेल पर टिका पूरा फोकस
ग्लोबल डिप्लोमेसी में इस समय एनर्जी सिक्योरिटी का मुद्दा इतना बड़ा हो चुका है कि जापान की अगुवाई वाली ‘एशिया जीरो एमिशन कम्युनिटी’ ने भी अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल दी हैं.
- बदल गया संगठन का मुख्य मकसद: ये संगठन पहले एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने, क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकें लागू करने के लिए बनाया गया था, लेकिन युद्ध के संकट ने इसके पूरे फोकस को मोड़ दिया है.
- अब सिर्फ तेल आपूर्ति पर ध्यान: संस्था का पूरा ध्यान अब इस बात पर आ टिका है कि एशियाई देशों तक कच्चे तेल की बिना रुकावट सप्लाई कैसे सुनिश्चित की जाए.
- इमरजेंसी ऑयल इन्वेंट्री पर सहमति: संगठन की हालिया मीटिंग में सभी देशों के बीच यह सहमति बनी है कि एशियाई देश आपस में मिलकर तेल का एक बहुत बड़ा और मजबूत इमरजेंसी रिजर्व तैयार करेंगे.
- संकट में साझा मदद का प्लान: ये भी तय हुआ है कि भविष्य में किसी युद्ध या सप्लाई बाधित होने पर सभी देश तालमेल बनाकर अपने-अपने रिजर्व से तेल जारी करेंगे, ताकि बाजार में अचानक दाम न बढ़ें और आम जनता को महंगाई का झटका न लगे.
चीन के पास है सबसे बड़ा तेल रिजर्व
वैश्विक स्तर पर रणनीतिक तेल भंडार के आंकड़े देखें तो तस्वीर काफी चौंकाने वाली और दिलचस्प नजर आती है. किस देश के पास कितना खजाना है?
- चीन नंबर वन: दुनिया में सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार इस समय चीन के पास है. चीन ने अपने पास लगभग 1.397 अरब बैरल कच्चे तेल का विशालकाय स्टॉक जमा कर रखा है.
- अमेरिका दूसरे नंबर पर: इस लिस्ट में दूसरा नाम अमेरिका का आता है. अमेरिका के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) में इस वक्त लगभग 413 मिलियन बैरल कच्चा तेल सुरक्षित रखा हुआ है.
- जापान तीसरे पायदान पर: अपने देश में प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी होने के बावजूद जापान ने इस मामले में बड़ा दम दिखाया है. जापान दुनिया में तीसरे नंबर पर है और उसके पास लगभग 263 मिलियन बैरल कच्चे तेल का मजबूत रणनीतिक भंडार मौजूद है.