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Surguja News: सरगुजा के बंदना में बुजुर्ग सोभनाथ बकरियों के गले में पिपरेल की लकड़ी से बना घंटा बांधते हैं. जंगल में बकरियां गुम होने पर इसकी आवाज से उन्हें ढूंढना आसान होता है. पूर्वजों से सीखी यह परंपरा आज भी जिंदा है.
Wooden Bell For Goat: आपने बकरियों के गले में कई तरह की आधुनिक तकनीक से बनी घंटी तो कई बार देखी होंगी लेकिन क्या आपने पुरानी पद्धति से बनी लकड़ी का घंटा देखा है. अगर नहीं तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि लकड़ी की घंटी बकरियों के गले में क्यों बांधी जाती है. दरअसल, छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाका बंदना में बकरी पालन करने वाले बुर्जुग सौभनाथ अपने बकरी के गले में लकड़ी का घंटा बांधा करते है. यह अनोखा परम्परा पुराने समय से चली आ रही है जब जंगलों में बकरियां झुंड में लोग चराने जाते थे. उस वक्त अगर बकरियां गुम हो जाती थीं तब घंटी कि आवाज से झुंड बकरियों का पता आसानी से चल जाता था और समय बदलता गया. आधुनिकता के इस दौर में लोग लोहे पीतल के घंटे अपने बकरियों में डालते हैं. लेकिन सरगुजा में आज भी पुरानी परंपरा यादों में नही बल्की हकीकत में जिंदा है. पुरानी परंपरा के मुताबिक ही घंटे को चारकोर आकार दिया जाता, जिसमें छेद कर तरासने के बाद भीतर को खोखला किया जाता है, जिससे घंटे से एक सुंदर और साफ आवाज आती है जिससे सुनते ही आप अपनें बकरियों को पहचान लेंगे. देखिए लकड़ी घंटे की पीछे की कहानी…
पूर्वजों को देखकर सीखी लकड़ी का घंटा बनाने की कला
सोभनाथ ने लोकल 18 को बताया कि बकरी के गले में लटक रहा यह घंटा लकड़ी से बनाया गया है. इसके लिए पिपरेल की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. लकड़ी के टुकड़ों को काटकर और तराशकर घंटा तैयार किया जाता है. इसे बनाने में करीब दो से तीन दिन का समय लग जाता है. सोभनाथ बताते हैं कि उनके पूर्वज भी इसी तरह लकड़ी के घंटे बनाकर बकरियों के गले में बांधा करते थे. उन्हें देखकर ही उन्होंने इस पारंपरिक कला को सीखा है…
लकड़ी के घंटे का आकार और इसे बनाने का तरीका है खास
इस लकड़ी के घंटे का आकार चौकोर होता है. इसे बनाने के लिए लकड़ी को सही आकार में काटने के साथ उसमें छेद भी करना पड़ता है. सोभनाथ के मुताबिक, इसके लिए लकड़ी को भीतर से खोखला करने और उसे उचित आकार देने की जरूरत होती है. काफी मेहनत के बाद लकड़ी का घंटा तैयार होता है, जिसे बकरी के गले में बांधा जाता है.
जंगल में गुम न हो जाएं बकरियां, इसलिए पहनाते हैं लकड़ी का घंटा
सोभनाथ बताते हैं कि जब बकरियों को चराने के लिए जंगल ले जाया जाता है, तब उनके झुंड से अलग होने या गुम हो जाने की आशंका बनी रहती है, ऐसे में बकरी के गले में लकड़ी का घंटा बांधना मददगार होता है. फिलहाल, उन्होंने अपनी एक बकरी के गले में यह घंटा बांधा है. जंगल में बकरियों को ढूंढने के दौरान इससे मिलने वाली आवाज के सहारे उनका पता लगाने में मदद मिल सकती है.
आधुनिक दौर में भी परंपरा को संजोए हुए हैं ग्रामीण
आज बाजार में बकरियों के गले में बांधने के लिए कई तरह की धातु की घंटियां उपलब्ध हैं, लेकिन सोभनाथ आज भी अपने पूर्वजों के पारंपरिक तरीके को अपनाए हुए हैं. लकड़ी से घंटा बनाने की यह कला ग्रामीण जीवन के अनुभव और स्थानीय संसाधनों के उपयोग को दर्शाती है. सरगुजा की यह तस्वीर बताती है कि आधुनिक दौर में भी ग्रामीण इलाकों में पुरानी परंपराएं और उनसे जुड़ी यादें किस तरह सहेजकर रखी जा रही हैं.