जहां पहुंचना मुश्किल, वहां भी पहुंचेगी तकनीक, ड्रोन और सैटेलाइट से उत्तराखंड के पहाड़ों पर रखी जाएगी नजर

जहां पहुंचना मुश्किल, वहां भी पहुंचेगी तकनीक, ड्रोन और सैटेलाइट से उत्तराखंड के पहाड़ों पर रखी जाएगी नजर


बागेश्वर: उत्तराखंड में कई ऐसे पहाड़ी इलाके हैं, जहां पहुंचना आज भी आसान नहीं है. कहीं ऊंचे पहाड़ हैं, तो कहीं गहरी घाटियां और बर्फ से ढके ग्लेशियर. ऐसे इलाकों में क्या बदलाव हो रहे हैं, जंगलों की स्थिति कैसी है और कहां भूस्खलन का खतरा हो सकता है, इसकी जानकारी जुटाने में अब आधुनिक तकनीक मदद कर रही है. ड्रोन, सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल नक्शों के जरिए उन जगहों पर भी नजर रखी जा सकती है, जहां पहुंचना मुश्किल होता है.

इस काम में उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूएसएसी) की अहम भूमिका है. केंद्र से जुड़ी मन्नू बेलवाल ने बताया कि अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल राज्य के विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए किया जा रहा है. इससे पहाड़ी क्षेत्रों की स्थिति समझने, पर्यावरण में होने वाले बदलावों पर नजर रखने और आपदा के समय जरूरी जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है.

ड्रोन और सैटेलाइट से मिलेगी दुर्गम क्षेत्रों की जानकारी

उत्तराखंड का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है. यहां कई जगह सड़क से पहुंचना मुश्किल होता है. ऐसे में ड्रोन की मदद से किसी क्षेत्र की हवाई तस्वीरें और वीडियो लिए जा सकते हैं. वहीं, सैटेलाइट से बड़े इलाकों की तस्वीरें मिलती हैं. इन तस्वीरों की अलग-अलग समय के आंकड़ों से तुलना करके यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किसी जगह पर क्या बदलाव हुए हैं. रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए जमीन, वनस्पति और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है. इसके बाद भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी GIS की मदद से इस जानकारी को डिजिटल नक्शों पर दिखाया जाता है और उसका विश्लेषण किया जाता है. होशियार सिंह ने बताया कि इन तकनीकों से पहाड़ों में सड़क निर्माण, भूमि के इस्तेमाल, वन क्षेत्रों और जल स्रोतों से जुड़ी योजनाओं के लिए उपयोगी जानकारी मिल सकती है. इससे अधिकारियों और विशेषज्ञों को किसी इलाके की स्थिति समझने और विकास कार्यों की योजना बनाने में आसानी होती है.

भूस्खलन और ग्लेशियरों में होने वाले बदलावों पर नजर

पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बना रहता है. इसके अलावा जंगलों, नदियों और ग्लेशियरों की स्थिति में होने वाले बदलावों पर नजर रखना भी जरूरी है. अंतरिक्ष तकनीक की मदद से इन क्षेत्रों का अध्ययन किया जा सकता है. हिमालय में ग्लेशियरों और नदियों की निगरानी खास तौर पर महत्वपूर्ण है. मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में होने वाले बदलावों का असर पर्यावरण और लोगों के जीवन पर पड़ सकता है. सैटेलाइट से मिली तस्वीरों की अलग-अलग समय के आंकड़ों से तुलना करके ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, वनस्पति और जमीन की स्थिति में आए बदलावों को समझने में मदद मिलती है. हालांकि, केवल सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर हर बदलाव की पूरी जानकारी नहीं मिल सकती. इसके लिए वैज्ञानिक विश्लेषण और जरूरत पड़ने पर मौके पर जाकर सर्वे करना भी जरूरी है.

आपदा के समय राहत-बचाव में मिलेगी मदद

उत्तराखंड में बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण कई बार सड़कें बंद हो जाती हैं. कुछ गांवों का संपर्क भी दूसरे इलाकों से कट जाता है. ऐसी स्थिति में प्रभावित जगहों तक पहुंचना और नुकसान का पता लगाना मुश्किल हो सकता है. ड्रोन और सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का आकलन किया जा सकता है. इससे क्षतिग्रस्त सड़कों, बंद रास्तों और प्रभावित बस्तियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है. इस जानकारी के आधार पर राहत और बचाव कार्यों की योजना तैयार करना आसान हो सकता है. कुल मिलाकर, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल कई तरह से उपयोगी हो सकता है. इससे प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी करने, पर्यावरण में होने वाले बदलावों को समझने और आपदाओं से निपटने की तैयारी में मदद मिल सकती है. इसके लिए जरूरी है कि तकनीक से मिलने वाली जानकारी का नियमित अध्ययन किया जाए और उसे समय पर संबंधित विभागों तक पहुंचाया जाए.



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