क्या कोई भी CJI से मिल सकता है, क्या हैं नियम, राहुल गांधी की मांग क्यों खारिज
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राहुल गांधी ने CJI सूर्यकांत से मुलाकात की मांग की थी, जिसे खारिज कर दिया गया है. दरअसल भारत में CJI का काम अदालत में मामलों की सुनवाई करना है. ऐसे में आम नागरिक अपनी बात CJI तक आसानी से पहुंचा सकते हैं, मगर उन्हें मुलाकात का अधिकार नहीं है. इसके लिए 1997 में सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने सर्वसम्मति से कुछ नियम बनाए थे. इन्हें रीस्टेटमेंट ऑफ वैल्यू ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ नाम दिया गया था.
CJI सूर्यकांत किसी से भी मुलाकात के लिए बाध्य नहीं हैं. (फाइल फोटो)
CJI सूर्यकांत से मुलाकात इतनी आसान नहीं है. हालांकि अगर कोई व्यक्ति सीजेआई से मिलना चाहता है तो वह इसकी मांग कर सकता है, लेकिन संवैधानिक पद और न्याय पालिका का प्रमुख होने के नाते वह उस मुलाकात के लिए बाध्य नहीं है. ऐसा इसलिए ताकि न्याय प्रणाली की शुचिता बरकरार रहे. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मुलाकात की मांग खारिज करते हुए CJI कार्यालय से जो ईमेल भेजा गया है, उसमें भी विचाराधीन मामलों का जिक्र किया गया है. इसमें लिखा गया हे कि अगर ऐसे में नेताओं से मुलाकात होती है तो ये सेपरेशन ऑफ पावर्स के सिद्धांत का उल्लंघन होगा.
सेपरेशन ऑफ पावर्स दरअसल भारतीय संविधान का मूल सिद्धांत है. इसके तहत भारत में शक्तियों को तीन हिस्सों में बांटा गया है. इसका पहला हिस्सा विधायिका है, दूसरा कार्यपालिका और तीसरा और महत्वपूर्ण हिस्सा नयायपालिका. तीनों में शक्तियों का बंटवारा इस लिहाज से किया गया है ताकि ये संवैधानिक शक्तियां निरंकुश न हों. राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को भेजे गए पत्र में न मिलने का प्रमुख कारण यही बताया गया है. ईमेल में कहा गया है कि कांग्रेस के नेता अपनी शिकायतों के आधार पर याचिका दायर कर सकते हैं. अदालत उस पर सुनवाई के लिए बाध्य है.
क्या है सेपरेशन ऑफ पावर्स?
संविधान के अनुच्छेद 50 में इसका जिक्र किया गया है. इसमें न्यायपालिका के काम को कार्यपालिका से बिल्कुल अलग बताया गया है. दरअसल सेपरेशन ऑफ पावर्स का अर्थ ये है कि सरकार की सारी शक्तियां किसी एक संस्था या व्यक्ति के हाथ में नहीं हैं. शासन चलाने, कानून लागू कराने और उसके हिसाब से न्याय करने की जिम्मेदारी अलग-अलग संस्थाओं में बांट दी गई है. इसका पहला अंग विधायिका है, जिसके अंतर्गत संसद और राज्य की विधानसभाएं आती हैं, जिनका काम कानून बनाना है. दूसरा अंग कार्यपालिका है. प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, राज्यों के मुख्यमंत्री इसके अंतर्गत आते हैं जिनका काम कानून और नीतियों का पालन कराना है. तीसरा हिस्सा न्यायपालिका है. सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट अन्य अदालतें जो विवादों का निपटारा और लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती हैं.
क्या आम नागरिक CJI से मिल सकते हैं?
सीजेआई की ओर से कांग्रेस नेताओं को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खुले हैं. दरअसल भारत में CJI का काम अदालत में मामलों की सुनवाई और उन पर फैसला देना है. ऐसे में आम नागरिक अपनी बात सीजेआई तक पहुंचा तो सकते हैं, मगर उन्हें मुलाकात का अधिकार नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में CJI ऑफिस से संपर्क करने के बारे में बताया गया है. यहां कोई भी नागरिक अपनी बात रख सकता है. हालांकि मुलाकात के बारे में किसी भी प्रक्रिया का जिक्र नहीं है. अगर सीजेआई को ऐसा लगता है कि मुलाकात की जा सकती है और उससे न्याय प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा तो वह खुद मुलाकात कर सकते हैं, मगर इसके लिए वे बाध्य नहीं हैं.
CJI से मिलना मुश्किल क्यों?
सीजेआई एक संवैधानिक पद है. अगर कोई ऐसा व्यक्ति सीजेआई से मिलने का अनुरोध करता है जिसका मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और उसकी मुलाकात हो जाती है तो ये दूसरे पक्ष के साथ अन्याय होगा. इससे निष्पक्षता प्रभावित होने का खतरा है. हालांकि इसका ये मतलब नहीं कि CJI नागरिकों की समस्याओं में रुचि नहीं लेते. कोई भी व्यक्ति चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया तक अपनी शिकायत भेज सकता है. सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, जनहित से जुड़े मामलों में नागरिक याचिका दायर कर सकते हैं और कुछ मामलों में CJI को पत्र लिखकर भी मुद्दा उठा सकते हैं.
जजों के लिए मुलाकात के क्या हैं नियम ?
सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की एक बैठक में सर्वसम्मति से कुछ नियम बनाए गए थे. 7 मई 1997 को लागू इन नियमों को रीस्टेटमेंट ऑफ वैल्यू ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ नाम दिया गया है. इसमें सामाजिक मेलजोल को लेकर स्पष्ट नैतिक नियम बनाए गए हैं. इसमें किसी बाहरी व्यक्ति से मुलाकात से इंकार नहीं किया गया है, लेकिन कुछ खास नियमों का ध्यान रखने को कहा गया है.
- उचित दूरी: एक जज को अपने पद की गरिमा के अनुरूप समाज और बाहरी लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रखनी चाहिए, ताकि जनता में न्यायपालिका की निष्पक्षता मजबूत हो.
- वकीलों से मेलजोल पर रोक: जजों को बार के सदस्यों खासतौर से उन वकीलों के साथ नजदीकी संबंध या व्यक्तिगत मुलाकातें टालने की सलाह दी गई है जो उसी अदालत में प्रैक्टिस करते हैं.
- कार्यपालिका से संबंध : नियमों में कार्यपालिका के बीच सिर्फ औपचारिक संबंध रखने की सलाह दी गई है, ताकि सरकार से जुड़े मामलों की सुनवाई में व्यक्तिगत प्रभाव न दिखे.
- उपहार और मेहमाननवाजी: नियम के तहत जज अपने परिवार, करीबी रिश्तेदारों और दोस्तों के अलावा किसी भी बाहरी व्यक्ति से किसी तरह का उपहार या मेहमाननवाजी स्वीकार नहीं करेंगे.
- पारिवारिक सदस्यों के नियम : यदि जज का कोई करीबी पारवारिक व्यक्ति वकील है तो वह जज के आधिकारिक आवास या सुविधाओं का उपयोग अपने पेशेवर काम के लिए नहीं कर सकता.