लखनऊः उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR)-2026 के दौरान मतदाता सूची से नाम काटने के लिए 85,854 फॉर्म-7 ऑटो जनरेट होने के मामले में चुनाव आयोग ने पलटवार किया है. इसको लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित खबर और फिर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना द्वारा बिना कारण मतदाताओं के नाम काटने के आरोपों को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने भ्रामक और निराधार बताया है.
अपात्र मतदाताओं के लिए जनरेट हुए 85,854 फॉर्म-7
चुनाव आयोग के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची में करीब 12.55 करोड़ मतदाता शामिल थे. नो मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के चलते लगभग 3.26 करोड़ मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए थे. नोटिस की सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों ने मतदाताओं की पात्रता पर निर्णय लिया. पात्र पाए गए लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए गए. जबकि अपात्र पाए गए लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया के लिए 85,854 फॉर्म-7 जनरेट किए गए.
नाम हटाने की प्रक्रिया का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए की गई व्यवस्था
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के मुताबिक खबर में उल्लिखित 85,854 की संख्या उन्हीं मतदाताओं की है, जिनके बारे में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा स्वतः संज्ञान जांच की प्रक्रिया पूर्ण करते हुए यह निर्णय लिया गया कि वे अनर्ह (Ineligible) हैं. यह व्यवस्था इसलिए है कि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर यह पता चल सके कि किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से कब हटा और क्यों हटा. बिना फॉर्म-7 जनरेट किये यदि कोई नाम मतदाता सूची से सीधे हटा दिया जाये तो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर यह पता लगाना मुश्किल होगा कि इस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से कब और क्यों हटाया गया.
एक व्यक्ति द्वारा कई फॉर्म-7 भरने का मामला
UP CEO नवदीप रिणवा के मुताबिक तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में एक व्यक्ति की ओर से कई मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए फॉर्म-7 भरे गए थे. जिसके बाद उसके सभी संबंधित फॉर्म निरस्त कर दिए गए थे. एक व्यक्ति की ओर से 10 से अधिक फॉर्म भरने के 198 मामले सामने आए. इन मामलों में कुल 4,740 मतदाताओं के नाम कटवाने का असफल प्रयास किया गया था.
चुनाव आयोग ने UP SIR को बताया पारदर्शी-विधिसम्मत
चुनाव आयोग ने कहा कि उत्तर प्रदेश में SIR-2026 की प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 और भारत निर्वाचन आयोग के 27 अक्टूबर 2025 के निर्देशों के तहत पूरी की गई. पुनरीक्षण से जुड़े दिशा-निर्देश उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध हैं.
तीन घंटे में जवाब मांगने पर भी उठाए सवाल
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक UP में चल रही MLC निर्वाचन कि प्रक्रिया के दौरान 8 अक्टूबर 2026 को दोपहर 3:32 बजे ईमेल के जरिए सवाल भेजकर उसी दिन शाम 7 बजे तक महज 3 घंटे में विस्तृत जवाब मांगा गया था. और बिना पर्याप्त समय और चुनाव आयोग के जवाब के ही इसके अगले दिन 9 अक्टूबर को सुबह 8:30 बजे खबर सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर दी गई. जिससे स्पष्ट है कि ऐसा सिर्फ भारत निर्वाचन आयोग कि छवि धूमिल करने के लिए किया गया.
16 लाख नए वोटरों के विवरण ग़ायब होने और 85,854 फ़ॉर्म-7 पर उठाये थे गंभीर सवाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, नए मतदाताओं को जोड़ने के विवरण सार्वजनिक नहीं किए जाने और फ़ॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं. इन मामलों में निर्वाचन आयोग की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है. सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव किन आधारों पर किए गए और क्या पूरी प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन हुआ?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने माँगा था पूरा हिसाब
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना के मुताबिक उत्तर प्रदेश के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके नाम मतदाता सूची में सुरक्षित हैं या नहीं और सूची में किए गए बदलाव किन नियमों के तहत हुए हैं. जब करोड़ों नाम हटाए जाने, लाखों नए मतदाताओं के विवरण सार्वजनिक न होने और हज़ारों फ़ॉर्म-7 की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हों, तब निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे. आयोग को नाम हटाने के कारणवार आँकड़े, नए मतदाताओं से संबंधित निर्धारित सार्वजनिक विवरण और फ़ॉर्म-7 के इस्तेमाल का रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए. मताधिकार किसी भी नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है. मतदाता सूची में किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना लोकतंत्र के लिए गंभीर विषय है.