दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शुमार एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक को लेकर भारत की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं. भारत में दूरदराज के इलाकों तक तेज इंटरनेट पहुंचाने की क्षमता रखने वाली यह तकनीक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान संचार व्यवस्था बहाल करने में मददगार हो सकती है, लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में इस पर आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है? क्या जरूरत पड़ने पर भारत सरकार इसके इंटरनेट नेटवर्क को अपनी शर्तों के मुताबिक बंद या चालू करा सकेगी? और क्या इससे भारतीय यूजर्स का संवेदनशील डेटा पूरी तरह देश के नियंत्रण में रह सकेगा?
थिंक टैंक द तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की अप्रैल 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘स्टारलिंक एंड रिस्क्स फॉर इंडिया’ ने इन्हीं सवालों को उठाते हुए चेतावनी दी है कि स्टारलिंक पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है. अश्विन प्रसाद राव, आदित्य रामनाथन और रिटायर्ड कर्नल दास की इस रिपोर्ट का तर्क है कि भारत ने सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए कड़े नियम तो बनाए हैं, लेकिन इन नियमों के बावजूद नेटवर्क के संचालन पर अंतिम नियंत्रण स्पेसएक्स के पास रहता है. यही भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है.
स्टारलिंक आखिर है क्या?
स्टारलिंक पृथ्वी की कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में मौजूद कम ऊंचाई वाली सैटेलाइट के नेटवर्क के जरिये इंटरनेट उपलब्ध कराती है. पारंपरिक सैटेलाइट इंटरनेट सर्विसेज के मुकाबले में यह तकनीक कम विलंबता यानी लेटेंसी और तेज इंटरनेट कनेक्टिविटी देने के लिए विकसित की गई है. इसकी मदद से उन दूरदराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है, जहां मोबाइल नेटवर्क या फाइबर ब्रॉडबैंड उपलब्ध कराना मुश्किल और महंगा है.
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 के आकलन में स्टारलिंक के नेटवर्क में 10,000 से अधिक एक्टिव सैटेलाइट थे. उस समय ये पृथ्वी की कक्षा में मौजूद कुल एक्टिव सैटेलाइट का लगभग दो-तिहाई हिस्सा थे. कंपनी भविष्य में अपने नेटवर्क को 42,000 तक सैटेलाइट तक बढ़ाने की योजना भी रखती है.
इस विशाल नेटवर्क के कारण स्टारलिंक की तकनीकी बढ़त उसके प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले काफी मजबूत है. रिपोर्ट कहती है कि स्पेसएक्स की रॉकेट लॉन्च क्षमता और बड़े पैमाने पर सैटेलाइट बनाने की व्यवस्था उसे तेजी से अपना नेटवर्क बढ़ाने में मदद करती है.
Elon Musk ने इस साल अब तक अपनी संपत्ति में करीब 103 अरब डॉलर का इजाफा किया है. उनकी दौलत में हुई यह बढ़ोतरी दुनिया के कई बड़े अरबपतियों की कुल नेटवर्थ से भी ज्यादा मानी जा रही है. टेक और AI सेक्टर में तेजी, साथ ही Tesla और SpaceX के मजबूत प्रदर्शन ने उनकी संपत्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
भारत के लिए इस तकनीक का आकर्षण साफ है. दुर्गम पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित स्थानों में यह संचार का वैकल्पिक माध्यम बन सकती है. लेकिन किसी विदेशी कंपनी की तकनीक पर निर्भरता बढ़ने के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जरूरत पड़ने पर भारत अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप उसका इस्तेमाल नियंत्रित कर सके.
स्टारलिंक को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्या?
रिपोर्ट ने स्टारलिंक से जुड़े जोखिमों को समझाते हुए एक बेहद अहम सवाल उठाया है. सवाल यह कि अगर भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण किसी इलाके में इंटरनेट सेवा रोकना चाहे, तो क्या स्टारलिंक को तत्काल और प्रभावी ढंग से ऐसा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है?
रिपोर्ट के अनुसार, खतरा दोतरफा है. पहला, सरकार किसी क्षेत्र में सुरक्षा कारणों से इंटरनेट बंद करना चाहे, लेकिन स्टारलिंक की सेवा वहां चालू रह जाए. दूसरा, भारत को किसी संकट, युद्ध या प्राकृतिक आपदा के दौरान संचार की सबसे ज्यादा जरूरत हो और कंपनी अपने स्तर पर सेवा बंद कर दे या उसकी उपलब्धता सीमित कर दे.
यह चिंता केवल इंटरनेट कनेक्शन तक सीमित नहीं है. अगर सेना, सुरक्षा एजेंसियां या आपदा प्रबंधन तंत्र किसी महत्वपूर्ण काम के लिए एक ही विदेशी नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भर हो जाएं, तो उस नेटवर्क में आई रुकावट उनके कामकाज को प्रभावित कर सकती है.
रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत सरकार के पास लाइसेंस रद्द करने जैसे नियामकीय विकल्प तो हैं, लेकिन इनसे यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि कंपनी संकट के समय सेवा जारी रखेगी. इसी तरह, नियमों के बावजूद किसी नेटवर्क को हर परिस्थिति में तत्काल बंद करवा पाना भी आसान नहीं है.
इसका अर्थ यह नहीं है कि स्टारलिंक निश्चित तौर पर भारत में ऐसा करेगी. रिपोर्ट का मूल तर्क यह है कि भारत को ऐसी स्थिति के लिए पहले से तैयार रहना चाहिए, जिसमें नेटवर्क के संचालन का फैसला किसी विदेशी कंपनी के हाथ में हो.
यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक ने खड़ी की मुश्किल
स्टारलिंक को लेकर रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में से एक यूक्रेन युद्ध से जुड़ी है. फरवरी 2022 में रूस के हमले के बाद यूक्रेन में स्टारलिंक की सेवाएं शुरू हुईं. धीरे-धीरे यह नेटवर्क यूक्रेनी सरकार और सेना के संचार के लिए बेहद अहम बन गया.
रिपोर्ट में पूर्व प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया है कि एलन मस्क ने कई बार भौगोलिक प्रतिबंधों यानी जियोफेंसिंग के जरिए यूक्रेन में स्टारलिंक की उपलब्धता सीमित की. जियोफेंसिंग ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में सेवा को चालू या बंद किया जा सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, क्रीमिया के पास स्टारलिंक सेवा चालू करने के यूक्रेनी सैन्य अनुरोध को भी मस्क ने स्वीकार नहीं किया था. मार्च 2025 में मस्क ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि यूक्रेनी सेना का संचार स्टारलिंक पर बहुत अधिक निर्भर है और सेवा बंद होने पर मोर्चे पर गंभीर असर पड़ सकता है.
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन ने इसी उदाहरण के जरिए आशंका जताई कि अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद उसके इस्तेमाल की अंतिम शर्तें सेवा प्रदाता के हाथ में रह सकती हैं. किसी देश की सेना या सरकार अगर एक निजी विदेशी कंपनी के नेटवर्क पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाए, तो उस कंपनी के फैसले रणनीतिक महत्व हासिल कर सकते हैं.
भारत के संदर्भ में चिंता की बात यही है कि युद्ध या सीमावर्ती तनाव के दौरान संचार का नियंत्रण किसी बाहरी कंपनी के हाथ में होना जोखिम पैदा कर सकता है.
ईरान में भी स्टारलिंक ने किया था खेल
इस रिपोर्ट में ईरान का भी उदाहरण देकर बताया गया है कि किसी देश में इंटरनेट पर प्रतिबंध होने के बावजूद स्टारलिंक को पूरी तरह रोकना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में ईरान में तस्करी के जरिए पहुंचे लगभग 50,000 स्टारलिंक टर्मिनल इस्तेमाल किए जा रहे थे. दिसंबर 2025 के आखिर में शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के जनवरी 2026 में तेज होने के दौरान वहां की सरकार ने पारंपरिक इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी थीं. इसके बाद प्रदर्शनकारियों के लिए स्टारलिंक बाहरी दुनिया से संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया.
रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने GPS सिग्नल और सैटेलाइट संचार में इस्तेमाल होने वाले Ku और Ka बैंड को बाधित करने की कोशिश की. इन प्रयासों से कुछ क्षेत्रों में अस्थायी रुकावटें आईं, लेकिन सेवा को पूरी तरह निष्क्रिय करना कठिन रहा.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के समक्ष स्टारलिंक की गतिविधियों को लेकर शिकायत की थी. ITU के रेडियो रेगुलेशन बोर्ड ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि कंपनी ने अनधिकृत टर्मिनलों को पूरी तरह निष्क्रिय करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए थे, जबकि उसके पास भौगोलिक आधार पर बड़ी संख्या में टर्मिनल बंद करने की तकनीकी क्षमता होने की बात सामने आई थी.
एलन मस्क के स्टारलिंक से भारत को बड़ा खतरा! (AI Generated Image)
भारत के लिए यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियमों का पालन तकनीकी रूप से सत्यापित किया जा सके और उल्लंघन की स्थिति में प्रभावी कार्रवाई हो.
मणिपुर में उग्रवादियों के पास मिला स्टारलिंक डिवाइस
भारत में स्टारलिंक से जुड़े सुरक्षा सवाल केवल भविष्य की आशंकाओं तक सीमित नहीं हैं. रिपोर्ट ने दिसंबर 2024 की उस घटना का जिक्र किया है, जब मणिपुर में सुरक्षा बलों को एक उग्रवादी समूह के पास स्टारलिंक उपकरण मिला था.
इस घटना के बाद एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर कहा था कि भारत के ऊपर स्टारलिंक के सैटेलाइट बीम बंद हैं. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा के पास जियोफेंसिंग व्यवस्था की सीमाओं के कारण कुछ इलाकों में उपकरण के काम करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. रिपोर्ट इस घटना को भौगोलिक प्रतिबंधों की प्रभावशीलता से जुड़ी चिंता के रूप में देखती है. इसमें यह भी सवाल उठाया गया है कि अगर किसी क्षेत्र में सेवा प्रतिबंधित है, तो क्या कंपनी की तकनीकी व्यवस्था वास्तव में उन प्रतिबंधों को हर परिस्थिति में लागू कर सकती है?
सीमावर्ती इलाकों में यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वहां संचार का इस्तेमाल नागरिकों के साथ-साथ तस्कर, उग्रवादी या अन्य अवैध गतिविधियों में शामिल लोग भी कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में सरकार को यह भरोसा होना चाहिए कि सेवा की उपलब्धता और उसके इस्तेमाल पर लागू सुरक्षा प्रतिबंध प्रभावी हैं.
अंडमान-निकोबार में तस्करी के मामले ने भी बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट में दिसंबर 2024 में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में सामने आए एक अन्य मामले का भी जिक्र है. अधिकारियों को तस्करों द्वारा स्टारलिंक उपकरण इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिली थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों ने कंपनी से इन उपकरणों के यूजर्स की पहचान और उनके इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड मांगे थे. स्टारलिंक ने यह जानकारी सीधे उपलब्ध कराने से इनकार करते हुए कहा था कि भारतीय अधिकारियों को अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों या निर्धारित अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं के जरिए अनुरोध करना चाहिए.
रिपोर्ट में इस घटना को डेटा तक पहुंच और कानून प्रवर्तन अधिकारों से जुड़ी समस्या बताया गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में भारतीय एजेंसियों को यह जानना जरूरी हो सकता है कि किसी संदिग्ध उपकरण का इस्तेमाल किसने किया, वह कहां सक्रिय था और उसका उपयोग किस उद्देश्य से हुआ.
अगर ऐसी जानकारी प्राप्त करने के लिए विदेशी कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर रहना पड़े, तो जांच में देरी हो सकती है. हालांकि, किसी कंपनी का डेटा साझा करने से इनकार करना अपने आप में अवैध गतिविधि में उसकी संलिप्तता साबित नहीं करता. इस मामले में रिपोर्ट की चिंता यह है कि भारत में काम करने वाली विदेशी सैटेलाइट सेवा और भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग की व्यवस्था कितनी प्रभावी है.
डेटा की गोपनीयता पर सवाल
स्टारलिंक से जुड़ा दूसरा बड़ा जोखिम यूजर्स के डेटा की सुरक्षा है. रिपोर्ट के अनुसार, किसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के जरिये कंपनी को यूजर्स की लोकेशन, इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) एड्रेस और संचार से संबंधित कुछ जानकारी तक पहुंच मिल सकती है.
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की रिपोर्ट में स्टारलिंक की 15 जनवरी 2026 को अपडेट की गई वैश्विक गोपनीयता नीति का खास तौर से जिक्र है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस नीति में ग्राहक डेटा का इस्तेमाल मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए करने की अनुमति दी गई है. इसमें लोकेशन संबंधी जानकारी, IP एड्रेस और कंपनी द्वारा ‘कम्युनिकेशन इन्फॉर्मेशन’ के रूप में वर्णित ऑडियो, इलेक्ट्रॉनिक या दृश्य जानकारी का जिक्र है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि ऐसी जानकारी AI प्रशिक्षण के लिए कुछ अज्ञात तीसरे पक्षों के साथ साझा की जा सकती है और यूजर्स को डिफॉल्ट रूप से डेटा शेयरिंग में शामिल रखा गया है.
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्पेसएक्स का AI से जुड़ा कारोबार भी है. रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में स्पेसएक्स और एलन मस्क के AI उद्यम xAI के विलय की घोषणा हुई थी. xAI ग्रोक चैटबॉट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X से जुड़ा है.
रिपोर्ट का तर्क है कि सैटेलाइट इंटरनेट से जुड़े संचार डेटा का AI प्रशिक्षण में इस्तेमाल और तीसरे पक्षों के साथ संभावित साझाकरण डेटा गोपनीयता को लेकर नए सवाल खड़े करता है. संवेदनशील सरकारी या रणनीतिक उपयोगों में ऐसी चिंताएं और गंभीर हो सकती हैं.